आवश्यक रक्षा सेवा कानून

September 11, 2021 0 By admin

उद्योगों में हड़ताल को अवैध घोषित करने का एक बड़ा षडयंत्र

सरकार के मजदूर विरोधी निर्णयों का विरोध करने वालों पर बढ़ा जेल, जुर्माना तथा बर्खास्तगी का खतरा

संपादकीय अगस्त 2021

मजदूर वर्ग सदैव ही मोदी सरकार के ताबड़तोड़ पूंजीपक्षीय हमलों के निशाने पर रहा है। इसने एक बार फिर से एक बड़ा हमला किया है। सरकार ने इस बार ‘एस्मा’ (एसेंसियल सर्विसेज मेंटनेंस एक्ट, 1968) की तर्ज पर लेकिन इससे काफी ज्यादा खतरनाक ‘आवश्यक रक्षा सेवा विधेयक’ के हथियार से मजदूर वर्ग के ऊपर हमला किया है। यह विधेयक संसद से पारित भी हो चुका है और जल्द ही कानून का रूप ले लेगा जो दायरे और सजा के मामले में एस्मा से बहुत ज्यादा व्यापक और खतरनाक साबित होगा। एस्मा के तहत स्वास्थ्य, बिजली, रेलवे, डाक आदि को आवश्यक सेवा मानकर इन सार्वजनिक उपक्रमों में हड़ताल करने पर प्रतिबंध लगाया गया था। बाद में स्पेशल इकोनॉमिक जोन को पब्लिक यूटिलिटी सर्विस मानते हुए इसमें हड़ताल व रैली, धरना, प्रदर्शन आदि करने पर प्रतिबंध लगाया गया था। लेकिन नया कानून रक्षा उद्योग में हडताल को तो प्रतिबंधित करता ही है, लेकिन इसके द्वारा ‘‘आवश्यक रक्षा सेवा’’ को जिस तरह से परिभाषित किया गया है वह किसी भी उद्योग को इस कानून के दायरे में लाना आसान बनाता है। दरअसल यह कानून केंद्र सरकार को किसी भी तरह की सेवा को ‘‘आवश्यक रक्षा सेवा’’ के रूप में परिभाषित करने तथा उन कारखानों में हड़ताल पर रोक लगाने का अधिकार देता है। इसके दायरे में ऐसा कोई भी प्रतिष्ठान या उपक्रम शामिल है जो ‘‘रक्षा से जुड़े किसी भी उद्देश्य के लिए आवश्यक वस्तुओं या उपकरणों के उत्पादन से संबंधित है।’’ जाहिर है यह केवल रक्षा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अन्य क्षे़त्रों के उद्योगों को अपने दायरे में लेगा। मोदी सरकार के चरित्र को देखते हुए इस कानून के पीछे की मंशा को समझना कठिन नहीं है। सरकार इसके दायरे में हर उस को ले लेगी जहां के मजूदर हड़ताल करने की ओर बढ़ेंगे या जहां के मजदूरों को सरकार सबक सिखाना चाहेगी। इस कानून में निहित प्रावधानो के अनुसार ‘‘आवश्यक रक्षा सेवा’’ के रूप में चिन्हित उद्योगों के मजदूर ‘‘ओवरटाइम’’ करने से इनकार नहीं कर सकते हैं।

लोकसभा और राज्यसभा में यह विधेयक बिना किसी विरोध के हंगामे के बीच पारित हो गया! किसी विपक्षी पार्टी ने इसके खिलाफ आवाज उठाने की जहमत नहीं उठाई। न तो संसद में, और न ही संसद के बाहर। सभी ऐसे चुप हैं जैसे कुछ हुआ ही नहीं है। हम पहले भी देख चुके हैं कि मजदूरों के सवालों पर विपक्ष सरकार के साथ खड़ा रहता है। यह दिखाता है कि विपक्षी पार्टियां और सरकार के बीच मजदूरों को पूंजीपतियों के गुलाम बनाने के सवाल पर पूरी एकता है। हम पाते हैं कि जहां विपक्षी पार्टियां किसानों की लड़ाई या मुद्दे के साथ खुलकर एकजुटता दिखाने व खड़ा होने का कोई मामूली मौका भी नहीं छोड़ती हैं, वहीं मजदूर वर्ग के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ दिखाने के लिए भी उनका मुंह नहीं खुलता है। हां, चुनावों के माहौल में मजदूरों के लिए कुछ घड़ियाली आंसू बहाते नेता दिख जाते हैं चाहे वे सरकार के पक्ष के हों या विपक्ष के। अभी कल ही दिल्ली के सिंघु बॉर्डर जाकर राहुल गांधी के नेतृत्व में 14 पार्टियां के नेताओं ने किसानों के साथ एकजुटता दिखाई, लेकिन इसी लोकसभा सत्र में चंद दिनों पहले पारित ‘आवश्यक रक्षा सेवा विधेयक, 2021 के विरोध में एक शब्द तक नहीं कहा। किसानों के साथ खड़ा होना भी इनका दिखावा ही है। लेकिन मजदूरों के साथ तो ये दिखावा भी नहीं करते। चार श्रम कोड को पारित करने में भी कोई विभेद नहीं दिखा था।


मजदूर वर्ग के बुनियादी सवालों पर विपक्ष के खुले सरकारपक्षी तथा पूंजीपक्षी व्यवहार के मर्म को हम भलिभांति समझते हैं। ये सभी पूंजीवाद के तावेदार हैं और इन पार्टियों व नेताओं में से कोई नहीं चाहता कि पूंजी और मुनाफा का पहिया एक क्षण के लिए भी रूके। फिर भला ये मजदूरों को हड़ताल करने के अधिकार के पक्षधर क्यों होंगे? आज जब मोदी सरकार 2014 से लगातार मजदूर वर्ग पर हमला कर रही है तो इन्हें इससे कोई गुरेज नहीं है, भले ही जब ये शासन में थे तो इनमें इतनी तेजी से मजदूरों पर हमला करने की हिम्मत और ताकत नहीं थी। मोदी को इसीलिए तो पूंजीपति वर्ग ने देश के शासन की जिम्मेवारी सौंपी थी।


यहां किसानों के आंदोलन और मजदूरों के आंदोलन के बीच के फर्क को समझने का मौका भी है।ं किसानों और मजदूरों के बीच शासक पूंजीपति वर्ग की नजर में क्या फर्क है इस एक उदाहरण के माध्यम से समझा जा सकता है। यह साफ है पूंजीपतियों का मुनाफा उजरती श्रम के शोषण का परिणाम है। इसलिए किसान नहीं, पूंजीपतियों के लिए पूंजी का निर्माण मजदूर अपनी श्रमशक्ति बेचकर करते हैं, जबकि मजदूर को इसके बदले जो मजदूरी या वेतन मिलता है वह उन्हें दूसरे दिन फिर से काम पर लग जाने के लिए सक्षम बनाने और मजदूरों की अगली पीढ़ी को तैयार करने भर के लिए होता है। इसलिए मजदूरों के संघर्ष का अर्थ पूंजी के निर्माण की प्रक्रिया में बाधा खड़ा करना है, जबकि किसान आंदोलन से पूंजी निर्माण की इस प्रक्रिया में कोई प्रत्यक्ष बाधा पैदा नहीं होती है। इसलिए मजदूर आंदोलन के वर्ग-संघर्ष में तब्दील होने की संभावना पहले दिन से मौजूद रहती है। आंदोलन जितना लंबा होगा उसके वर्ग-संघर्ष में तब्दील होने की संभावना उसी अनुपात में बढ़ती जाती है। इसलिए जब कुछ लोग किसानों के लंबे आंदोलन को देखते हुए मजदूर वर्ग से भी आनन-फानन में ऐसी ही लड़ाई में उतरने की उम्मीद और इसके लिए आह्वान करने लगते हैं तो स्पष्ट है कि वे दोनों आंदोलनों के बीच के अंतर्य तथा गतिकी के इस फर्क को शायद नहीं समझते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि किसानों की तरह मजदूर इतने लंबे समय तक धरना नहीं दे सकते हैं। उनके पास संसाधन के अभाव का होना इसका एक कारण है, लेकिन मूल कारण है मजदूर वर्ग की हड़ताल से पूंजीपति वर्ग को होने वाला विशाल घाटा और पूंजी के निर्माण का रूक जाना है। मजदूरों के संघर्ष और खासकर हड़ताल का अर्थ पूंजीपति वर्ग के मुनाफा के पहिया का पूरी तरह थम जाना, पूंजी संचय यानी पूंजी के सतत रूप से बढ़ते जाने की प्रक्रिया का ठहर जाना होता है। इसलिए मजदूर वर्ग का इतना लंबा हड़ताल व संघर्ष तभी हो सकता है जब मेहनतकशों ने अंतिम निर्णायक लड़ाई की ठान ली हो या इसके अंतिम परिणामों के बारे में पर विचार कर लिया है। मजदूर वर्ग के आंदोलन का इतिहास बताता है कि अक्सर शासक वर्ग (पूंजीपति वर्ग) मौके का फायदा उठाते हुए तथा मजदूर वर्ग को सबक सिखाने के उद्देश्य से बिना समुचित तैयारी के शुरू कर दिये गये इतने बड़े आंदोलनों को गृहयुद्ध में तब्दील कर खून-खराबा पर उतर जाते हैं और भयंकर दमनचक्र चलाते हैं। जाहिर है, माकूल तैयारी के बिना मजदूर वर्ग की हार होगी और मजदूर वर्ग को इसकी सजा के रूप में भयंकर दमनचक्र का सामना करना पड़ता है।


ज्ञातव्य है कि सरकार आयुध निर्माण बोर्ड (ओएफबी) के निगमीकरण व निजीकरण की घोषणा कर चुकी है। यह स्वाभाविक है कि इसमें कार्यरत कर्मचारियों व मजदूरों का भविष्य अधर में लटक गया है। इसलिए इसके विरोध में रक्षा उद्योग में कार्यरत मान्यता प्राप्त मजदूर फेडरेशनों व संघों ने अनिश्चितकालीन हड़ताल की घोषणा कर रखी थी। आश्वासन से उन्हें मनाने की कोशिश की गयी, लेकिन बात नहीं और संघ व मजदूर-कर्मचारी उक्त फेसले पर डटे रहे। 22 जून को ही रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को फेडरोशनों ने इसके संबंध में लिखित सूचना दे दी थी कि वे ओएफबी के निजीकरण व निगमीकरण करने के खिलाफ हैं तथा सरकारी फैसले के विरोध में अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाएंगे। 8 जुलाई को हड़ताल की नोटिस दी जानी थी, लेकिन इसके पहले ही 30 जून को भारत के राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से मोदी सरकार ने ‘द एसेंशियल डिफेंस सर्विसेज ऑर्डिनेंस, 2021’ जारी करने हुए आनन-फानन में इसकी गजट अधिसूचना भी जारी कर दी। बाद में इसे पूर्ण कानून का दर्जा देने के लिए संसद में इससे संबंधित एक विधेयक भी पेश किया गया जिसे दोनों सदनों से पारित कर दिया गया है और संसद के बाहर या भीतर किसी विपक्षी पार्टी ने इसके खिलाफ अब तक मुंह नहीं खोला है। इसका तात्कालिक उद्देश्य सरकारी आयुध कराखानों में कार्यरत हजारों कर्मचारियों व मजदूरों को हड़ताल पर जाने से रोकना है, लेकिन दूरगामी लक्ष्य निश्चय ही अन्य सभी उदयोगों के कर्मचारियों को भी धीरे-धीरे तथा एक-एक करके इसकी चपेट में लेकर पूरे देश में हड़ताल को प्रतिबंधित करने का है, ताकि मजदूर वर्ग के हाथ-पैर बांध दिये जाएं तथा मुंह पर ताला लगा दिया जाएं और जब उनकी श्रमशक्ति को और भी सख्ती से निचोड़ा जाये तो वे न छटपटा सकें, न ही चिल्ला सकें।
पूरा देश फासीवादी हमलों का शिकार है, तो जाहिर है देश का शासक पूंजीपति वर्ग मजदूर वर्ग को अपना गुलाम बनाना चाहता है। यही उसका मुख्य उद्देश्य है, क्योंकि बिना मजदूर वर्ग के श्रम की अंतहीन लूट के फासीवाद का लक्ष्य पूरा नहीं होता है। आखिर फासीवाद इसीलिए तो थोपा जाता है कि बड़े एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग की पूंजी का विशाल महल और विशाल तथा गगनचुंबी बनता जाये। इसीलिए जब हम फासीवाद के खतरे की बात करते हैं तो जाहिर है इसकी सबसे कठोर मार मजदूर वर्ग को ही सहना होता है और उसे गुलाम लद्दु जानवर बना दिया जाता है। ‘आवश्यक रक्षा सेवा कानन’ इसी उद्देश्य के लिए लाया गया है। यह कानून रक्षा क्षेत्र के औद्योगिक प्रतिष्ठानों में मजदूरों व कर्मचारियों की हड़ताल को प्रतिबंधित करने, उसे अवैध घोषित करने और फिर इसकी तैयारी में लगे व संलग्न अगुआ मजदूरों के ऊपर जुर्माना थोपने, जेल में बंद करने और अंततः उन्हें बिना किसी जांच-पड़ताल के बर्खास्त करने करने का अधिकार देता है। ‘‘बिना जांच पड़ताल के बर्खास्त करने का अधिकार’’ का अर्थ ही है कि प्रबंधन अथवा मालिक के द्वारा आरोप लगाना ही काफी होगा, भले ही हड़ताल की तैयारी में कोई मजदूर लगा हो या नहीं लगा हो। हड़ताल पर रोक लगाना तो इसका उद्देश्य है ही, लेकिन इसके पीछे का छुपा हुआ असली मकसद इस कानून के जरिये मजदूर वर्ग के भीतर इतना अधिक डर पैदा कर देना है ताकि संघर्षशील अगुआ मजदूर मालिकों व सरकार की मनमानी के खिलाफ आवाज न उठा सकें और संघर्ष की कोई पहल नहीं ले सकें।


पूरी प्रक्रिया को देखें तो आश्चर्य होगा कि सरकार इतनी चुस्ती से भी काम कर सकती है! सरकार अध्यादेश लाने के बाद तुरंत बाद संसद में एक विधेयक लेकर आती है और फिर उसे आनन-फानन में पारित भी करा लेती है। उधर विपक्ष अन्य मुद्दों पर हंगामा करता रहा और इस बहाने इसे सुगमता से दोनों सदनों में पारित होने दिया। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि यह विधेयक लोकसभा में ठीक उस समय लाया गया जब ‘‘ऑर्डिनेंस फैक्टरी बोर्ड’’ के निजीकरण के विरोध में पूरे देश के रक्षा उद्योग में कार्यरत 80000 मजदूरों-कर्मचारियों ने हड़ताल पर जाने की घोषणा कर रखी थी और नोटिस भेजी जानी थी। इसलिए स्पष्ट है कि इस हड़ताल से सरकार पूरी तरह भयभीत थी और इसे रोकने के लिए पूरी बेशर्मी से लग गई। मोदी सरकार इजारेदार पूंजीपतियों के कहने पर मजदूर वर्ग के सभी जनवादी अधिकारों पर एक-एक कर हमला कर रही है हम यह देख रहे हैं। हम जानते हैं कि 44 श्रम कानूनों को 4 श्रम कोडों में बदलकर मोदी सरकार ने पहले ही मजदूरों पर बड़ा हमला बोला है। 4 श्रमकोड में ऐसे श्रम कानून शामिल किये गये हैं जो मजदूरों के लिए पूंजीपतियों के फायदे के लिए हैं और जो नये सिरे से पूंजी की खुली-नंगी दासता मजदूर वर्ग पर थोपने में सक्षम हैं।


सबसे बड़ी बात यह है कि इस अध्यादेश के माध्यम से भविष्य में किसी भी उद्योग को सरकार रक्षा के लिए आवश्यक बताकर उस उद्योग में हड़ताल को कभी भी प्रतिबंधित कर सकती है और मजदूरों पर अन्य तरह की पांबदियां लाद सकती है। ओवरटाइम के लिए जबर्दस्ती करना उनमें से एक प्रमुख है। इसी तरह इस कानून में फंसाने का भय दिखाकर यूनियनों को पंगु बनाया जा सकता है। अगुआ मजदूरों को डराया जा सकता है और जो नहीं डरेंगे उन्हें इस कानून में निहित दंड के प्रावधानों के तहत झूठे तौर पर फंसाया जा सकता है।
जिस तरह मजदूर वर्ग को गुलाम बनाने की मोदी सरकार लगातार कोशिश कर रही है उससे एक बात तो साफ है कि मजदूर आज न कल आंदोलन में उतरेंगे, चाहे सरकार इससे भी ज्यादा खतरनाक कानून क्यों न बना ले और ले आये। सरकार यह जानती है कि मजदूरों के दिलो-दिमाग में गुस्सा उबल रहा है और मजदूर पूंजीपति वर्ग व सरकार से नफरत करने लगे हैं। इसलिए यह स्वाभाविक है कि मजदूर वर्ग को किसी देशव्यापी संघर्ष में उतरने से रोकने लिए सरकार इससे भी कड़े कानून लेकर आये। हमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए जब एकाएक किसी दिन मोदी सरकार पूरे देश में औद्योगिक हड़ताल पर पूरी तरह रोक लगाने की घोषणा कर दे। इसका मतलब है कि सरकार मजदूर वर्ग पर पूरी तरह खुली-नंगी फासीवादी तानाशाही थोपने पर आमादा है और वह मजदूरों से बुरी तरह डरी हुई है। खास इस कानून की बात करें तो उसे पता था कि एस्मा से काम नहीं चलने वाला है और व्यापक प्रावधान वाले एक ऐसे कानून की जरूरत है जिसका उपयोग मनमाने तरीके से करते हुए पूरे देश के उद्योगों में हड़ताल को प्रतिबंधित किया जा सके। यह अध्यादेश व कानून इसी का परिणाम है जिसमें जेल, जुर्माना और बर्खास्तगी ही नहीं जबर्दस्ती ओवरटाइम करवाने तक के प्रावधान हैं।

कानून के दायरे की बात करें तो यह रक्षा उपकरणों के उत्पादन, सेवाओं और संचालन, या सेना से जुड़े किसी औद्योगिक प्रतिष्ठान के रखरखाव में शामिल कर्मचारी व मजदूर, साथ ही रक्षा उत्पादों की मरम्मत तथा रखरखाव में संलग्न कर्मचारी व मजदूर आदि इसके दायरे में आयेंगे। मुख्य बात यह है कि इसके दायरे को इस तरह परिभाषित किया गया है कि देश के कुल 41 आयुध कारखानों में 80000 कार्यरत मजदूरों व कर्मचारियों के अतिरिक्त सरकार जिस भी उद्योग के कर्मचारियों व मजदूरों को चाहेगी उन्हें या उस प्रतिष्ठान को इस कानून के दायरे में ला सकती है। इसलिए इस कानून का उपयोग रक्षा उद्योग के अलावे और कहां होगा यह सरकार और पूंजीपति वर्ग की मर्जी से तय होगा। जिस तरह यूएपीए को इतने अधिक व्यापक दायरे वाला कानून बना दिया गया है कि इसके तहत किसी को भी पकड़कर पुलिस फंसा सकती है, ठीक वैसे ही किसी भी प्रतिष्ठान को इस कानून के दायरे में सरकार की मर्जी से लाया जा सकता है। ऐसे देखा जाए तो सभी कोर उद्योगों में हो रहा उत्पादन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रक्षा उपकरणों, सेवाओं व उनके संचालन या उनके रखरखाव से ही जुड़ा हुआ है। इस आधार पर कोयला, स्टील, पेट्रोलियम, बिजली, उर्जा क्षे़त्र के अन्य प्रतिष्ठान आदि सभी उद्योग इस कानून के दायरे में आसानी से लाये जा सकते हैं।
सजा के प्रावधानों को देखें तो कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि यह देश में श्रमिक संगठनों को हड़ताल तथा विरोध के अधिकार से वंचित करने का एक ऐसा डरावना दस्तावेज कि इसके बाद कोर उद्योगों में कानूनी तौर पर ट्रेड यूनियन हड़ताल करना नामुमकिन हो जाएगा। यह अब तक का सबसे कठोर व खतरनाक कानून है। इस कानून के प्रावधानों के मुताबिक ‘‘कोई भी व्यक्ति, जो ‘‘अवैध हड़ताल शुरू करता है या ऐसे किसी भी हड़ताल में भाग लेता है, तो उसे एक वर्ष की जेल की सजा या फिर 10 हजार रुपये जुर्माना या दोनों तरह की सजा से दंडित किया जा सकता है।’’ यही नहीं, ‘‘अवैध घोषित हड़ताल में भाग लेने वाले, या इस तरह के कार्यों के लिए वित्तीय सहायत प्रदान करने वाले, और इसके लिए उकसाने वाले भी दंडित किये जाएंगे।’’


‘‘आवश्यक रक्षा सेवाओं के उत्पादन प्रक्रिया, सुरक्षा व रखरखाव’’ को सुनिश्चित रूप से चलाने के नाम पर यह कानून बिना किसी कठिनाई के प्रबंधन को पुलिस बल के इस्तेमाल तथा बिना किसी घरेलू जांच-पड़ताल के ही हड़ताल में भाग लेन वाले कर्मचारियों को सीधे बर्खास्त करने का अधिकार देता है। यही नहीं, इस कानून के प्रावधनों के अनुसार इस कानून द्वारा चिन्हित उद्योगों में मजदूर ‘‘ओवरटाइम करने से मना नहीं कर सकेंगे।’’


इस तरह हम बहुत ही जल्द देखेंगे कि इसके दायरे में तमाम महत्वपूर्ण आधारभूत उद्योगों कों ले लिया गया है।
लेकिन पूरी परिस्थिति का एक दूसरा पक्ष भी है। जैसे हर नकारात्मक चीज में सकारात्मक चीज भी होती है, इन खतरनाक कानूनों का भी कुछ उज्ज्वल पक्ष है। जैसे, इन कानूनों के लागू होने के चंद दिनों बाद ही मजदूर वर्ग के अंदर का असली दुश्मन सुधारवाद, अवसरवाद और इसी व्यवस्था में किसी तरह मर-खप कर अपने लिए खुशहाली तलाशने के भ्रम का तथा संघर्ष से कतराने की मौजूदा प्रवृति का अंत होना निश्चित है। यही इसका उज्ज्वल पक्ष है। ट्रेड यूनियन आंदोलन के अंदर क्रांतिकारी प्रचार व भंडाफोड़ अभियानों का यहां से देशव्यापी श्रीगणेश हो सकता है और मजदूर आंदोलन में पड़ी फूट की जगह एकता के स्वर मजबूत हो सकते हैं। इसका मतलब यह है कि ये कानून जहां तात्कालिक तौर पर मजदूर आंदोलन के अंदर कई तरह की बाधायें खड़ा कर रहे हैं और करेंगे, वहीं दूरगामी तौर पर मजदूर आंदोलन की क्रांतिकारी जमीन को भी ये सिंचित तथा पुष्ट कर रहे हैं। जरूरत है कि मजदूर वर्गीय ताकतें ‘तात्कालिक’ में ‘दूरगामी’ के बीज बोने में सक्षम हों और मोदी सरकार हमें मजदूर आंदोलन में इसके लिए (तात्कालिक से दूरगामी को जोड़ने के लिए) जो उत्तम अवसर दे रही है उसे दोनों हाथों से थाम लेने की है। जाहिर है, हम अगर पूरे परिदृश्य को तात्कालिकता की नजर से नहीं, समग्रता में देखना शुरू कर देते हैं तो हम जल्द ही देखेंगे कि आज की मायूसी खत्म हो रही है, मजदूर आंदोलन का नया सूर्य चमक रहा है और इससे पूरे समाज में एक नया ज्वारभांटा उठ रहा है। हमें पूरी उम्मीद है, हम ये जरूर देखेंगे।