संताल हुल: एक अशेष विद्रोह

संताल हुल: एक अशेष विद्रोह

September 11, 2021 0 By admin

  अमिता कुमारी

जब तक संतालों को ‘विकास’ की आड़ में विस्थापित और बेदखल किया जाता रहेगा, और जब तक उन्हें अपने ‘विकास’ की प्रक्रिया में हिस्सेदार नहीं बनाया जाता, तब तक हुल की गूंज प्रतिध्वनित होती रहेगी।

1855 का संताल हुल आदिवासियों के साहस और प्रतिशोध की गाथा है; शोषण के प्रतिकार और अपने अस्तित्व को बचाने की कहानी है। इतिहास के पन्नों में हुल को एक ऐसी घटना के रूप में अंकित किया जाता है जिसकी एक निश्चित शुरुआत हुई और फिर एक निश्चित अंत हुआ। प्रस्तुत लेख का मानना है कि हुल की शुरुआत तो हुई, लेकिन उसका अंत नहीं हुआ। हुल-विद्रोह 1855 के बाद भी कई रूपों में, कई बार किया गया और यह पुन: प्रदर्शन आज तक हो रहा है। हुल संतालों की स्मृति में, उनके वार्तालापों, गीतों और नाटकों में, और उनके रोज़मर्रा के जीवन में बार-बार अभिव्यक्त होता है – और इस तरह यह अशेष बना हुआ है। संतालों की सामूहिक चेतना में 1855 के इस विद्रोह का अंत नहीं हुआ। अतीत और वर्तमान के विभिन्न कालखंडों में हुल की निरंतरता को इस लेख में अंकित करने की कोशिश की गयी है। साथ, इसके कारणों को पूंजीवाद के गहराते शोषण में ढूँढने का प्रयास किया गया है।

यह लेख हुल के एक संक्षिप्त अवलोकन के साथ शुरू होता है जिसमें इसके मूल कारणों तथा संतालों के अदम्य संघर्ष को रेखांकित किया गया है। दूसरा भाग यह देखता है कि हुल की औपचारिक समाप्ति के बाद भी किस तरह यह औपनिवेशिक और उत्तर औपनिवेशिक कालों में गूँजता रहा। तीसरा तथा अंतिम खंड हुल की गूंज और अशेषता के भौतिक कारणों को खोजने का प्रयास करता है।

हुल: संक्षिप्त इतिहास

संतालों का अतीत मातृभूमि की खोज में भटकने की कथा है। उनकी पारंपरिक किंवदंतियाँ और गीत उनके एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रवास की कहानी कहते हैं। एक स्थायी घर की लंबी खोज उन्हें अंततः उनके वर्तमान निवास, संताल परगना (झारखंड में स्थित) तक पहुंचाती है।

संताल परगना में बसने के बाद संताल औपनिवेशिक शोषण में फँसते चले गए। संतालों ने जंगलें काटकर कृषि योग्य ज़मीन तैयार की। जल्द ही पश्चिम बंगाल के बर्दवान और बीरभूम के आस-पास के क्षेत्रों और बिहार के आरा, छपरा, बेतिया और शाहाबाद जिलों के व्यापारी और महाजन (साहूकार) भी इस क्षेत्र में आकर बसने लगे। ये महाजन और व्यापारी संतालों से उनकी उपज खरीदते और उन्हें कलकत्ते में बेचते। बदले में संतालों को पैसे, नमक, तंबाकू और कपड़े के रूप में भुगतान किया जाता था। इस व्यावसायिक लेन-देन के दौरान भोले-भाले संताल महाजनों और व्यापारियों के छल-कपट और चालाकी से रूबरू हुए। संतालों को जो पैसा दिया जाता था या बदले में जो सामान भी दिया जाता था, वह उनसे खरीदी गई वास्तविक उपज से बहुत कम हुआ करता था। महाजनों और व्यापारियों ने तराजू के दो अलग-अलग सेटों के उपयोग के माध्यम से संतालों को धोखा दिया – “केनाराम” या बड़ा बाउ वह पैमाना था जिसका वजन वास्तविक माप से थोड़ा अधिक होता था और इसका उपयोग उन फसलों को तौलने के लिए किया जाता था जो वे वहां से खरीदते थे। “बेचाराम” या छोटा बाउ वह पैमाना था जिसका वजन वास्तविक माप से कम होता था और इसका इस्तेमाल संतालों को बेची या उधार दी गई वस्तुओं को तौलने के लिए किया जाता था। इस तरह संतालों को छला गया और महाजनों और व्यापारियों ने अपार धन इकट्ठा किया।

महाजन संतालों को  कुछ रुपये भी उधार दिया करते थे और फसल के मौसम के दौरान वे उधार दिए गए धन या वस्तु को एकत्र करते थे। यह भी पूरी चालबाजी के साथ किया जाता था। विद्रोह का व्यापक अध्ययन करने वाले पहले और एकमात्र इतिहासकार, कलिकिंकर दत्ता (1940) बताते हैं:

उन्होंने [व्यापारी और महाजन] रास्ते में एक पत्थर उठाया और अपने वजन की शुद्धता दिखाने के लिए इसे सिंदूर से रंग दिया, अपने देनदारों के खेतों में पहुंचे, जिन्हें तब अपने लेनदारों की पार्टियों के आने-जाने के खर्चों को भी चुकाना होता था। उक्त पत्थर के टुकड़े की मदद से वजन करके, महाजनों ने अपने देनदारों से उनकी भूमि की लगभग पूरी उपज को ले लिया, फिर भी उन्हें कर्ज के बोझ से दबा दिया।

अपने लेनदारों के टेढ़े-मेढ़े तरीकों से अनभिज्ञ, सरल दिमाग वाले संताल जाल में फंसते चले गए। कर्ज की राशि या ब्याज की दरों का लिखित रिकॉर्ड रखना ज़रूरी है, ऐसा संताल जानते भी नहीं थे। जब महाजन अत्यधिक मांगों के साथ पहुंचते तो संतालों के पास उत्तर नहीं होता था। संताल भुगतान करने में हमेशा नाकाम होते और इस प्रकार पूरी फसल, मवेशी, बर्तन और यहां तक ​​​​कि महिलाओं के लोहे के गहने भी छीन लिए जाते। संतालों को देनदार के बंधुआ मजदूर के रूप में कार्य करने के लिए मजबूर होना होता और यह पीढ़ियों तक जारी रहता। इस व्यवस्था को ‘कमियोती’ के नाम से जाना जाता था। उत्पीड़ित संतालों को पुलिस अधिकारियों से कभी कोई राहत नहीं मिली क्योंकि वे व्यापारियों और महाजनों के साथ होते। संतालों के लिए न्यायपालिका और अदालतें बहुत दूर थीं। मजिस्ट्रेट भागलपुर में बैठते थे और केवल एक ही स्थानीय मजिस्ट्रेट था जिसे देवघर में रखा गया था, जो कि 70 किलोमीटर से अधिक दूर था – एक ऐसा फासला जो उन दिनों के पिछड़े संचार व्यवस्था में अनजान परदेस सा था। डब्ल्यू डब्ल्यू हंटर (1868) नामक एक ब्रिटिश प्रशासक लिखते हैं:

समाधान का सवाल ही नहीं था – अदालत शायद सौ मील दूर सिविल स्टेशन में बैठी थी। राजस्व के संग्रह में तल्लीन अंग्रेज न्यायाधीश के पास अपने लोगों की छोटी-छोटी शिकायतों के लिए समय नहीं था। देशी मातहतों ने, सभी ने, उत्पीड़क से अपनी तनख्वाह ली थी : पुलिस ने लूट में हिस्सा लिया था। संतालों ने कहा, ‘ईश्वर महान है, लेकिन वह बहुत दूर है।

इस प्रकार, औपनिवेशिक शासन के तहत संताल आजीविका के संकट से गुज़र रहे थे। जीवित रहने के अपने पारंपरिक साधनों से वंचित उनमें से कई को रेलवे निर्माण स्थलों में मजदूरों के रूप में काम करना पड़ा, जहां यूरोपीय लोगों द्वारा संताल महिलाओं और बच्चों का जबरन अपहरण कर लिया जाता, जिससे संतालों की परेशानी बढ़ गई।

इन परिस्थितियों में संतालों के पास अन्यायपूर्ण व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। दिलचस्प बात यह है कि अंग्रेज़ इतिहासकारों द्वारा यह तर्क दिया गया कि विद्रोह का मुख्य कारण ब्रिटिश शोषण नहीं था। उनके अनुसार संताल औपनिवेशिक शासकों द्वारा वसूले गए लगान से क्षुब्ध नहीं थे बल्कि वे महाजन, व्यापारी व नायाब सुजवालों द्वारा असल मायने में शोषित थे।

1838 और 1851 के बीच के वर्षों में इस क्षेत्र से लगान कई गुना बढे (1838 में 2000 रुपये से 1851 में लगभग 45,000)। लेकिन इतिहासकारों का तर्क है कि यह वृद्धि संतालों द्वारा बसाए गए गांवों में वृद्धि के अनुरूप है (गांवों की संख्या 1838 में 40 से बढ़कर 1851 में 1,473 हो गई थी)। इसलिए, हुल के विद्वान आम तौर पर सहमत हैं कि लगान का बोझ अन्यायपूर्ण नहीं था। यह भी दिखाया गया है कि लगान संग्राहकों ने बलपूर्वक किराए के रूप में अधिक राशि वसूल की और अतिरिक्त धन को जेब में रखा और इसलिए संतालों को वास्तविक किराए के साथ-साथ लगान-संग्राहकों की वसूली का दोहरा बोझ उठाना पड़ा। इसलिए यह तर्क दिया गया कि विद्रोह के कारणों को लगान लेने वाले नायब सुज़वालों, महाजनों के उत्पीड़न और पुलिस और अदालत कर्मियों के बीच व्याप्त भ्रष्टाचार में ढूंडा जाना चाहिए। परंतु, क्या यह सब लोग इसी औपनिवेशिक व्यवस्था की देन नहीं थे? इसके अलावा, ब्रिटिश प्रणाली के तहत, चूंकि भूमि का किराया नकद में एकत्र किया जाता था, संतालों को फसल के तुरंत बाद बाजारों में भागना पड़ता था और व्यापारी और अनाज डीलर द्वारा फिर से वे ठगे  जाते थे। व्यापारी, महाजन और नायब-सुज़वाल प्रत्यक्ष शोषक के रूप में दिखाई तो ज़रूर देते हैं, परंतु यह औपनिवेशिक व्यवस्था थी जिसने वास्तव में उत्पीड़कों के इस वर्ग का निर्माण किया और शोषण के ढांचे को निर्धारित किया। इसलिए जैसे ही संतालों को इसका एहसास हुआ उन्होंने ब्रिटिश राज को खुली चुनौती दे दी। हुल के दौरान शुरू में महाजनों और निचले स्तर के औपनिवेशिक अधिकारियों (ज्यादातर भारतीय) को निशाना बनाने वाले संतालों ने आगे चल कर अंग्रेजों पर भी हमले शुरू कर दिए थे।

हुल-विद्रोह संताल आक्रोश की एक स्वतःस्फूर्त, नासमझ अभिव्यक्ति नहीं थी। बल्कि, 30 जून 1855 की सभा (जिसे हुल की शुरुआत के रूप में चिन्हित किया जाता है) के बाद और उससे पहले भी, संतालों ने सरकारी अधिकारियों को अपनी शिकायतों संबंधी याचिकाएँ सौंपी थीं। लेकिन जब यह महसूस किया गया कि ये बहरे कानों तक नहीं पहुँच रहे तब ही संतालों ने विद्रोह का बिगुल बजाया।

पहला वार जमींदारों व महाजनों पर हुआ; पुलिस अधिकारी और सरकारी अधिकारी अगले थे। विद्रोहियों के हाथों पहली हत्याएं पंचकटिया बाजार के पांच महाजनों – माणिक चौधरी, गोराचंद सेन, सार्थक रक्षित, निमाई दत्ता और हीरू दत्ता – की थीं। इन हत्याओं का जायजा लेने वाले दिघी के दरोगा महेश लाल दत्ता को भी उनके आदमियों के साथ बेरहमी से मार दिया गया था। करहर्रिया (गोड्डा) के नायब सुजवाल भी मारे गए। संताल सैकड़ों के समूह में तलवार, कुल्हाड़ी, धनुष, विषैला तीर और ढोल बजाते हुए चलते थे। यह नजारा गैर-संतालों और अंग्रेजी अधिकारियों को डराने के लिए काफी था।

संताल क्रोध ने यूरोपीय पुरुषों और महिलाओं, रेलवे अधिकारियों और यहां तक ​​कि सैनिकों को भी नहीं बख़्शा। और यह लगातार उग्र होता रहा। संताल समुदाय की एक विशेषता जो इन दिनों सबसे अधिक दिखाई देने लगी, वह थी उनकी एकता और आपसी समर्थन की भावना। भागलपुर के आयुक्त का बंगाल सरकार के सचिव को लिखा पत्र इस एकता की एक झलक देता है: “हम सुनते हैं कि विद्रोही बहुत छोटे दलों में घूमते हैं, लेकिन उनके ड्रम बजने पर, वे इस उद्देश्य के लिए 1000 पुरुष पार्टियों में इकट्ठा हो जाते हैं।” मेजर जर्विस ने इस एकजुटता को इस प्रकार चित्रित किया:

यह युद्ध नहीं था; वे हारना नहीं जानते थे। जब तक उनका राष्ट्रीय ढोल बजता रहेगा, पूरी पार्टी खड़ी रहेगी, और खुद गोली खाने के लिए तैयार रहेगी। उनके बाणों ने अक्सर हमारे आदमियों को मार डाला, और जब तक वे खड़े रहे, हमें उन पर गोलियां चलानी पड़ीं… युद्ध में ऐसा कोई सैनिक नहीं था जिसे खुद पर शर्म न आई हो।

हालाँकि, इस एकता और निडरता को अंततः झुकना पड़ा। 10 नवंबर 1855 को इस क्षेत्र में मार्शल लॉ की घोषणा की गई। कान्हू, भैरव और चाँद सहित अधिकांश नेताओं को पकड़ लिया गया और जल्द ही विद्रोह दबा दिया गया। अंततः 3 जनवरी 1856 को मार्शल लॉ निलंबित किया गया।

इस प्रकार, 1855 में शुरू हुआ एक विद्रोह इतिहास के पन्नों में एक घटना के रूप अंकित हो गया। लेकिन क्या यह घटना 1856 में समाप्त हो गई, जैसा कि इतिहासकारों का दावा है? बाद की घटनाओं से पता चलता है कि हुल न केवल संतालों की स्मृति में जीवित है, बल्कि विभिन्न अवसरों पर इसकी गूंज सुनाई देती रही है। अगला भाग इस स्मृति और निरंतरता पर एक नज़र डालने का प्रयास करता है।

हुल : स्मृति और निरंतरता

हुल के दमन के बावजूद अधिकारियों और बाहरी लोगों के मन में हुल संबंधी डर और डरावनी तस्वीरें आती रहीं। इस प्रकार, हुल शोषकों की स्मृतियों में भी जीवित रहा। उदाहरण के लिए, 1861 में  संताल परगना के संतालों के बीच अशांति के स्पष्ट संकेत दिखाई दे रहे थे। समकालीन प्रशासनिक पत्राचार “क्रोधित बैठकें” “साल की शाखाएं भेजने” और संतालों की “धमकी” के बारे में ज़िक्र करते है। ऐसा लगता है कि इसने तत्कालीन सहायक आयुक्त को हिंसक, सशस्त्र संतालों की भयावह छवियों की याद दिला दी थी। वह लिखता है:

उपरोक्त सुनकर मुझे याद आया कि सोंथाल लोग लगान और अपने पुराने ऋणों से असंतुष्ट थे, कि उनके कुछ प्रमुख व्यक्ति नदिया के अशांत जिले से गुजरे थे। पिछले विद्रोह में उनके नेता कान्हू ने फांसी से पहले ही बता दिया था कि छह वर्षों में वह फिर से संथालों को विद्रोह और विजय की ओर ले जाता हुआ दिखाई देगा। और मुझे लगा कि यह बहुत संभव है कि वे गड़बड़ी कर सकते हैं …

इस तरह हुल, उसके नेता और उनके वादों ने 1855 के बाद भी हुल को मरने नहीं दिया और चूंकि संताल ‘वापसी के वादे’ में विश्वास करते थे, इसलिए ब्रिटिश अधिकारी एक और हुल के प्रदर्शन से डरते दिखे।

1871 में सुल्तानाबाद परगना के हाथीमारा नामक गाँव में, एक बाघ ने एक बैल को मार डाला था और बड़ी संख्या में संताल बाघ को डराने के लिए ढोल पीट रहे थे। ढोल की आवाज क्षेत्र के गैर-संताल बाहरी लोगों को डराने के लिए काफी थी। हंटर इस घटना का वर्णन इस प्रकार करता है:

केतली-ड्रम (kettle-drums) की आवाज सुन, जो 1855 में एक सशस्त्र सभा के लिए सामान्य आह्वान था, जिसे बंगालियों द्वारा प्रकोप का पहला संकेत माना जाता था, वे 500-600 बंगाली अपने परिवार, मवेशियों और सामानों के साथ भाग गए। ईस्ट इंडियन रेलवे के मुरारई स्टेशन पर वे यह घोषणा कर रहे थे कि संताल फिर उठ खड़े हुए हैं और गाँव को लूटने के उद्देश्य से उनका पीछा कर रहे हैं।

इस प्रकार, हुल औपनिवेशिक अधिकारियों और गैर-संतालों की यादों में एक जीवित इकाई बना रहा। संतालों की स्मृति और रोज़मर्रा के जीवन में भी इसी तरह हुल जीवित रहा। हम देखते हैं कि 1855 के बाद संतालों के बीच लगभग हर लामबंदी में, 1861 की अशांति या उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और २०वीं सदी की शुरुआत के बाद के खेरवार आंदोलन में, हुल एक अंतर्धारा के रूप में मौजूद रहा। इसका एक ज्वलंत उदाहरण 1881 में खेरवार आंदोलन की चर्चा करने वाली एक सरकारी रिपोर्ट में पाया जा सकता है- “[एक खेरवार नेता] ने बताया कि उनका संताल विद्रोह के नेताओं सिदो और कानू की आत्माओं के साथ संपर्क था।” कई खेरवार नेताओं को हुल और उसके नेताओं का आह्वान करते हुए तथा हुल के अधूरे कार्य को पूरा करने जैसे भाषण देते हुए पाया गया था।

स्वतन्त्रता के बाद भी संतालों की अभिव्यक्ति में हुल एक अंतर्धारा के रूप में जारी है। आदिवानी के एक प्रकाशन का निम्नलिखित उद्धरण संतालों में हुल को जीवित रखने की गहरी इच्छा को दर्शाता है।

संताली में हुल का अर्थ है विद्रोह। हमने 1855-56 के संताल विद्रोह के उपलक्ष्य में हुल कैलेंडर तैयार किया। दिनांक 30 जून, 2013 से शुरू होकर 30 जून, 2014 तक चलते हैं। हमने समय का अपना माप चुना।

हमें समय बदलने की जरूरत है। हमें अपनी सामूहिक स्मृति का पुनर्निर्माण करने, अपने इतिहास को जानने और अपनाने की जरूरत है क्योंकि यह हमारी पहचान की विशेषताओं को परिभाषित करता है।

हम भूलाए गए लोग होने से इनकार करते हैं।

इसी तरह  ‘हुल सेंगेल’ नामक एक वृत्तचित्र, जो औपनिवेशिक पुलिस द्वारा विद्रोही सिदो की ‘पुन: हत्या’ की घटना का वर्णन करता है,  भी हुल की निरंतरता का एक उदाहरण है। इस वृत्तचित्र में सिदो की छठी पीढ़ी के वंशज रूपचंद कहते हैं:

भले ही अंग्रेजों ने उन्हें फांसी पर लटका दिया था, लेकिन अंग्रेजों को विश्वास नहीं हुआ कि सिदो और कान्हू की मृत्यु हो गई है। पुलिस अधिकारियों में से एक ने सिदो और कान्हू के शवों की राख को ले लिया और उन्हें अपनी मेज पर रख दिया। उन्होंने राख पर बंदूक तान दी। तब राख से खून बह निकला, और उन्हें पता चला कि सिदो और कान्हू मरे नहीं थे और देवता बन गए थे। हम भी यही मानते हैं…

इस वृत्तचित्र को बनाने वाले डैनियल राइक्रॉफ्ट (2012)  का मानना है कि हुल के नेताओं को देवता बनाकर, संताल “एक उग्र निरंतरता को बनाए रखना चुनते हैं जिसमें जीवित संताल अपने विद्रोही पूर्वजों के साथ सह-अस्तित्व में रहते हैं।”

एक अधूरे अतीत की यह धारणा, एक अतीत जो सह-अस्तित्व में है और संतालों के जीवन के समसामयिक है,  यह निरंतरता संताल लोक गीतों और उनके अतीत के आख्यानों में बखूबी व्यक्त किया गया है। प्रथमा बनर्जी (2006) बताती है कि जब कोलियन हड़ाम नामक एक संताल अपने पूर्वजों की कहानी सुना रहा था, तो वह इसे भूतकाल में बता रहा था – ‘हम चंपा में रह रहे थे’, ‘उसे फिर छोड़ दिया’। लेकिन जब हुल-गीत संतालों द्वारा गाए जाते हैं तो उनमें वर्तमान का बोध रहता है, ऐसा लगता है मानो रोजमर्रा की घटना हो:

सिदो तुम खून से क्यों नहाए हुए हो?

कान्हू तुम हुल, हुलक्यों रोते हो?

अपने लोगों के लिए हमने खून से नहाया है,

जब से व्यापारी-चोरों ने हमें, हमारी जमीन को,

लूटा है।

अतीत (हुल) के नहीं खत्म होने के इस “हठ”/“ज़िद्द” के कारणों को समझना आवश्यक है और अगला भाग यही प्रयास करता है।

पूंजीवाद : संतालों के शोषण और बेदखली की कहानी

हुल को जीवित और निरंतर बनाए रखने की ज़िद्द को वर्तमान की बिखरती हुई परिस्थितियों व भविष्य में मौजूद ना-उम्मीदी से जोड़ कर देखे जाने की ज़रूरत है। जब वर्तमान और भविष्य उस ‘यूटोपिया’ की गारंटी देने में विफल हो जाते हैं जिसकी अतीत ने कल्पना की थी और लगातार संघर्ष किया था, तब बार-बार अतीत की ओर लौटना ही राहत और उम्मीद देता है। संतालों की वर्तमान भौतिक परिस्थितियां ऐसी हैं कि हुल के “ऐतिहासिक घाव” को जीवित रखकर ही वे वैकल्पिक भविष्य का सपना देख पाते हैं।

उपन्यासकार संजय बहादुर, जिन्होंने ‘हुल-क्राई रिबेल’ (Hul-Cry Rebel) उपन्यास लिखा है, कहते है:

जब मैंने अपना प्रारंभिक शोध किया, तो मैंने महसूस किया कि पिछले 200 वर्षों में, समान भौगोलिक क्षेत्र में हर 30-40 वर्षों के बाद इसी तरह के “विद्रोह” हो रहे हैं, लगभग उन्हीं कारणों से – विस्थापन, शहरीकरण, औद्योगीकरण, व्यावसायीकरण आदि। स्थानीय लोग जिस तरह से प्रतिक्रिया देते हैं, उनके द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली तकनीकें भी बहुत समान हैं-राजनीति और प्रौद्योगिकी में बदलाव के बावजूद।

संताल परगना का क्षेत्र पूंजीवादी ताकतों के शोषण से जूझ रहा है। इसने न केवल क्षेत्र के पर्यावरण को नष्ट किया है बल्कि संतालों को उनकी आजीविका से भी वंचित कर दिया है। इस क्षेत्र के पहाड़ी पत्थर उत्खनन और कोयला खनन गतिविधियों के लिए आकर्षक अवसर प्रदान करते हैं, जिनमें से अधिकांश अवैध रूप से होते रहे हैं। इन गतिविधियों ने इस क्षेत्र में तबाही मचा रखी है। इस क्षेत्र में पत्थर खनन के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं, एक पाकुड़-साहेबगंज क्षेत्र में स्थित है, जबकि अन्य दो दुमका के शिकारीपारा ब्लॉक में स्थित हैं। हसरत अर्जुमंद (2005) और नित्या राव (2005) पत्थर उत्खनन/खनन व्यवसाय में अवैधता और अनियमितताओं पर प्रकाश डालते हैं। अर्जुमंद का ब्यौरा चौंकाने वाला है:

क्षेत्र के अवलोकन से पता चलता है कि आदिवासियों की भूमि पर खनन के लिए पट्टे देने की प्रक्रिया में स्थानीय राज्य ने अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर उपलब्ध वैधानिक प्रावधानों का पूरी तरह से उल्लंघन किया है और दुमका के उपायुक्तों ने और संताल परगना में अन्य क्षेत्रों में भी, आदिवासी भूमि अधिकारों की रक्षा के बजाय, संताल परगना काश्तकारी (पूरक प्रावधान) अधिनियम 1949 की धारा –20 के तहत सख्त कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन किया है …

तमाम अनियमितताओं के बावजूद, उत्खनन जारी है क्योंकि यह सरकार के लिए राजस्व का एक आकर्षक स्रोत है। स्पष्ट नज़र आने वाले पर्यावरणीय और स्वास्थ्य खतरों, भूमि और आजीविका के नुकसान तथा संतालों व अन्य स्थानीय लोगों के विरोध के बावजूद ये जारी हैं। इस साल अप्रैल (2021) में साहेबगंज से अवैध पत्थर खनन के विरोध में संतालों द्वारा सड़कों को जाम करने की खबरें आई थीं। विरोध करने वाले संतालों के कुछ बयानों को उद्धृत करना उचित होगा। रवि टुडू कहते हैं: “विस्फोटों की गगनभेदी आवाज़ हमारे लिए यहाँ रहना मुश्किल कर देती है। यह इलाका अक्सर धूल की चादर से ढका रहता है।” माया टुडू कहती हैं: “हम अक्सर अपने पीने के पानी और भोजन पर धूल की परतें पाते हैं। हमारी फसलें खराब हो रही हैं और इन दिनों शायद ही कोई पेड़ फलता है।”

नित्या राव और हसरत अर्जुमंद, दोनों ही, स्थानीय निवासियों पर खनन के प्रतिकूल प्रभाव को रेखांकित करते हैं, जिसमें प्रदूषण और बीमारियों के अलावा, गंभीर आजीविका संबंधी समस्याएं शामिल हैं। खनन भूमि के लिए चरागाहों का नुकसान उनमें से एक है। अर्जुमंद के अध्ययन के तहत एक गाँव में संताल पहले प्रति परिवार 40 से 45 गायों का पालन-पोषण किया करते थे, जो खनन के कारण अब कम होकर 10 रह गया। इसके अलावा, खान-मालिक खदानों से खोदी गई मिट्टी को सार्वजनिक चराई वाली भूमि में फेंक देते हैं, जिससे क्षेत्र पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो जाता है। आस-पास की कृषि भूमि अपनी उत्पादकता खो रही है क्योंकि बारिश के दौरान खदान का मलबा भूमि पर चला जाता है और इस प्रकार उपजाऊ ऊपरी परत को नुकसान पहुंचता है। भू-जल को भी भारी नुकसान हो रहा है।

उत्खनन के साथ पेड़ों की अवैध कटाई ने इस क्षेत्र में गंभीर पारिस्थितिक असंतुलन पैदा कर दिया है। हाल में कोविड के कारण लगे लॉकडाउन के दौरान पेड़ों की अंधाधुंध कटाई की खबरें आई थीं। झारखंड पुलिस की एक विशेष शाखा द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट में बताया गया है कि महामारी के दौरान लकड़ी तस्करों ने झारखंड के कई जिलों में हजारों पेड़ों को काट दिया है। इन जिलों में संताल परगना के दुमका, जामताड़ा और गोड्डा शामिल हैं। इस क्षेत्र के संकट को बढ़ाने के लिए बड़े कॉरपोरेट्स द्वारा बिजली संयंत्रों की स्थापना भी की जा रही है। इन महत्वाकांक्षी योजनाओं का स्थानीय समुदायों द्वारा जोरदार विरोध किया जा रहा है क्योंकि उनमें भूमि अधिग्रहण संबंधी अनियमितताएं तो है हीं, साथ  विस्थापन, जंगल की हानि, चराई भूमि, जल निकायों और इसी तरह के पारिस्थितिक विनाश का खतरा भी है।

उदाहरण के लिए, गोड्डा में प्रस्तावित अडानी पावर प्लांट (जिसका उद्देश्य बांग्लादेश की बिजली की जरूरतों को पूरा करना है) के तहत  120 किलोमीटर की ट्रांसमिशन लाइन स्थापित करने के लिए उस क्षेत्र के जंगलों को काटना होगा। इसके अलावा, कई सौ एकड़ भूमि जो ग्रामीणों से अधिग्रहित की गई है, वे भूमि अधिग्रहण और उचित मुआवजे के अधिकार से संबंधित सभी वैधताओं का उल्लंघन करके की गई है। 2018 में गोड्डा के कई गांवों के संताल पुरुषों और महिलाओं द्वारा अडानी कर्मियों से अपनी जमीन छोड़ने की भीख मांगने की खबरें आईं। संताल महिलाओं के रोने और अडानी के आदमियों के पैरों में गिरने के वीडियो भी वायरल हुए थे। पीड़ित ग्रामीणों में से एक रमेश बेसरा बताते हैं: “उन्होंने ज़मीन डकैतों की तरह ले लिया”। इसी तरह, गोड्डा में प्रस्तावित जिंदल बिजली संयंत्र में जितपुर कोयला खदानों से कोयले और सुंदर बांध, गुमानी व जालहरा नदियों से पानी का उपयोग किया जाएगा। सुंदर बांध बनने के दौरान पहले भी इस क्षेत्र के ग्रामीणों को विस्थापित किया गया था। नया बिजली संयंत्र फिर से विस्थापन के खतरे लेकर आता है। ये भूमि अधिग्रहण प्रक्रियाएं न केवल 2013 के भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास अधिनियम (एलएआरआर अधिनियम), 2013 में उचित मुआवजे और पारदर्शिता के अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन करती हैं, बल्कि वे संताल परगना काश्तकारी अधिनियम (एसपीटी) 1949 का भी उल्लंघन करती हैं जो संताल परगना क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ विशेष सुरक्षा उपाय प्रदान करता है।

2015 में मोदी सरकार ने एलएआरआर अधिनियम में संशोधन करने का असफल प्रयास किया और 2017 में झारखंड में पूर्ववर्ती भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार एसपीटी अधिनियम 1949 में संशोधन करने में विफल रही क्योंकि संतालों द्वारा संशोधनों का जोरदार विरोध किया गया। एसपीटी अधिनियम में भूमि के अलगाव के खिलाफ सुरक्षा उपायों के बावजूद, संतालों को उनकी भूमि से लगातार बेदखल किया जाता रहा है । नित्या राव, जिन्होंने संताल परगना पर व्यापक शोध किया है, ने यह बताया है कि पचवाड़ा कोयला खनन परियोजना में भूमि अधिग्रहण के दौरान ग्राम सभा के साथ परामर्श के अनिवार्य प्रावधान का पालन नहीं किया गया। वह उन कई उदाहरणों को सामने लाती हैं जिनमें अवैध स्थानान्तरण सुनिश्चित करने के लिए एसपीटी अधिनियम की धारा 20 का उल्लंघन किया गया था। आदिवासी अध्ययन के एक अन्य विशेषज्ञ रमेश शरन झारखंड में आदिवासी कानूनों की अक्षमता पर प्रकाश डालते हैं: “आदिवासियों की रक्षा करने वाले कानूनों के कार्यान्वयन का इतिहास उल्लंघनों से भरा है। अलगाव को रोकने के लिए किए गए हर संशोधन के परिणामस्वरूप नई खामियां सामने आई हैं। भूमि के हस्तांतरण के लिए नए तरीके अपनाए गए हैं।” इस प्रकार, केवल कानूनी सुरक्षा के उपाय, विशेष रूप से आदिवासियों के मामले में, अतिक्रमण और अलगाव से बचाव नहीं करते। अनुसूचित क्षेत्र विनियमन न्यायालयों में अवैध भूमि हस्तांतरण के हजारों मामले भरे पड़े हैं। आदिवासियों पर विभिन्न अध्ययन और रिपोर्टें इस बात की याद दिलाती हैं कि कैसे लाखों आदिवासियों के विस्थापन की कीमत पर भारत में “विकास” हुआ है। जनजातीय मामलों के मंत्रालय की 2016 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि कुल 85 लाख आदिवासी विकास परियोजनाओं और प्राकृतिक आपदाओं के कारण विस्थापित हुए हैं और इनमें से केवल 21 लाख का पुनर्वास किया गया है।

2014 में आदिवासी समाजों के प्रसिद्ध विशेषज्ञ वर्जिनियस खाखा की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति ने प्रधानमंत्री कार्यालय को आदिवासी समुदायों की वर्तमान स्थिति पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। इस रिपोर्ट में भूमि से बेदखली और विस्थापन के मुद्दों की गंभीरता को उजागर करते हुए कुछ सुझाव भी दिये गए। जैसे, आदिवासियों को भूमि अधिग्रहण से इनकार करने का अधिकार होना चाहिए और अनुसूचित क्षेत्रों में खनिजों के खनन पर उनका पहला अधिकार होना चाहिए। उन्होंने ग्राम सभा और जनजातीय सलाहकार परिषद के और अधिक सशक्तिकरण की सिफारिश भी की थी।

झारखंड और संताल परगना में आदिवासी कल्याण कानूनों को कमजोर करने और उनके उल्लंघन का एक लंबा इतिहास रहा है। “विकास परियोजनाओं” के नाम पर भूमि हड़प ली गई है – एक ऐसा विकास जो वास्तविक हितधारकों यानि आदिवासियों और संतालों को बाहर करता है, और पूंजीवादी एजेंडे को पूरा करता है।

भूमि से बेदखली के लगातार जारी रहने से कृषि उत्पादन कम हो रहा है और वन घट रहे हैं। और इस तरह आदिवासियों की पारंपरिक आत्मनिर्भर कृषि-वन अर्थव्यवस्था नष्ट होने के कगार पर है। औपनिवेशिक काल से शुरू हुई इस प्रक्रिया ने वर्तमान में पूरे समुदाय की आजीविका को पटरी से उतार दिया है। दिहाड़ी मजदूरी की तलाश के लिए प्रवास, इसलिए, संताल समाज का एक अनचाहा हिस्सा बन चुका है। नारायण बनर्जी द्वारा 1987 में किए गए एक अध्ययन का तर्क है कि संतालों के बीच मौसमी प्रवास लगभग एक “पारंपरिक प्रथा” बन गया है। ऐसा उन्होने 35 वर्ष पहले कहा था; आज श्रम प्रवास आदिवासी समाज का कितना बिखराव कर चुका है हम बस कल्पना ही कर सकते हैं। हाल ही में महामारी ने हजारों प्रवासी कामगारों को लंबी पैदल यात्रा के लिए मजबूर किया था। इनमें बड़ी संख्या आदिवासियों और संतालों की थी। कई संताल महिला मजदूरों के प्रवास के दौरान यौन शोषण की घटनाएँ भी इसी दौरान उजागर हुई थीं।

संक्षेप में, यह स्पष्ट है कि पूंजीवाद की गहरी पैठ के बीच संतालों का जीवन गहरे संकट से गुज़र रहा है। पारंपरिक सामुदायिक जीवन और आजीविका, पर्यावरण के साथ उनका सहजीवी संबंध, पूरी तरह से बिखर गया है। संतालों की रोजमर्रा की स्मृति और जीवन में हुल की निरंतरता के कारणों को अगर ढूँढना है, तो इसी अव्यवस्था और बिखराव में ढूँढना होगा। संताल एक ऐसे वर्तमान में जीने क मजबूर हैं जो हुल की भौतिक परिस्थितियों से बिलकुल अलग नहीं है – वही शोषण, वही बेदखली, वही संकट। जब भौतिक आधार ही शेष नहीं हुए, तो हुल की निरंतरता, उसका पुनः प्रदर्शन कैसे शेष हो? हुल तब तक जारी रहेगा जब तक हुल जैसी परिस्थितियाँ बनी रहेंगी। जब तक संतालों को ‘विकास’ की आड़ में विस्थापित और बेदखल किया जाता रहेगा, और जब तक उन्हें अपने ‘विकास’ की प्रक्रिया में हिस्सेदार नहीं बनाया जाता, तब तक हुल की गूंज प्रतिध्वनित होती रहेगी।