कॉर्पोरेट स्वार्थों के लिए बने कृषि कानूनों का विरोध करें

कॉर्पोरेट स्वार्थों के लिए बने कृषि कानूनों का विरोध करें

September 13, 2021 0 By admin

कम्युनिस्ट वॉइस

(यह Communist Voice, दिसंबर 2020में छपे लेख का हिन्दी अनुवाद है)


किसान एक बार फिर आंदोलित हैं और यह बात लगातार चर्चा में है। मोदी सरकार द्वारा बनाए गए कृषि कानूनों से किसान आक्रोशित हैं। परिवार, निजी सम्पत्ति और परम्परागत नैतिक मूल्यों के रक्षक के तौर पर किसानों का शासक वर्ग हमेशा से गुणगान करते आए हैं। किसान के पास कुछ सम्पत्ति भी होती है और वे मेहनतकश भी होते हैं। इस तरह एक मध्यवर्ती वर्ग होने के नाते उसे आम तौर पर दूसरे वर्गों की भी हमदर्दी मिलती रहती है। उसकी इस छवि को बनाने में तोलस्तोय से लेकर प्रेमचंद तक सभी का अपना योगदान रहा है और यह छवि हमारे दिलोदिमाग पर छायी रहती है। इसलिए कोई हैरानी की बात नहीं कि किसानों की दुर्दशा पर शहरी आबादी भी विचलित हो जाती है। लेकिन मजदूर वर्ग को आम तौर पर ऐसी हमदर्दी नहीं मिलती जबकि वह मेहनतकश आबादी का बहुमत है। लाॅकडाउन के दौरान उनकी भयंकर दुर्दशा के कारण ही प्रवासी मजदूरों की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट हुआ। जब श्रम कानून (लेबर कोड) पारित किए गए तो आबादी के खाते-पीते हिस्से की ओर से कोई खास शोर शराबा नहीं हुआ। अच्छी तनख्वाह पा रहे कामगारों की ओर से भी नहीं ही हुआ। यह रुख हमारे नेताओं द्वारा गढे़ गए नारों में भी दिखता है। लाल बहादुर शास्त्राी के ‘जय जवान, जय किसान’ से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी के ‘जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान’ और अब हमारे ‘अपने’ कन्हैया के ‘जय जवान, जय किसान और जय संविधान’ के नारे में भी मेहनतकश जनसाधारण के उस भाग की कोई चर्चा नहीं होती, उन उजरती मजदूरों की कोई चर्चा नहीं होती जो वाकई में ‘अन्नदाता’ हैं।

हम यह सब इसलिए कह रहे हैं कि कृषि कानूनों का आकलन हम शहरों और गांवों के मजदूर वर्ग के नजरिए से करेंगे। यह बात नोट की जानी चाहिए कि किसान कोई समरूप वर्ग नहीं है। उसके बीच इतने अंतर आ गए हैं कि गांवों में भी बहुसंख्या अब उजरती मजदूरों की हो गई है। सीमांत या गरीब किसानों की आमदनी का मुख्य जरिया भी अब मजूदरी से कमाई हो गया है। इस बात को शुरू से ही ध्यान में रखना जरूरी है ताकि धनी किसानों की मांगों को पूरे किसान समुदाय की मांग समझ लेने की गलती न हो जाए। और हमें यह बात जोर देकर कहनी चाहिए कि कुल मिलाकर किसान कोई एक समग्र समुदाय जैसा दरअसल है नहीं जो, जैसा कि हम कह ही चुके हैं, उन दूसरे तबकों की भावनाओं को भी विचलित कर देता है जिनका खेती किसानी से कोई वास्ता नहीं है।

भारत में कृषि संकट लम्बे समय से बना हुआ है। समय-समय पर अतिउत्पादन, कर्जों के बोझ, जोतों के टुकड़े-टुकड़े होकर छोटे होते जाने और किसानों की बर्बादी का सिलसिला लगातार बना रहा है। इसमें आप पर्यावरण के संकट को भी जोड़ दें तो दुर्दशा और बर्बादी की बड़ी दुःखद तस्वीर उभरती है। पिछली सदी के अंतिम दशक से लेकर अब तक लाखों किसानों की खुदकुशी में भी इसने अभिव्यक्ति पाई है। इसी संदर्भ में मौजूदा केन्द्र सरकार ये तीन कानून लेकर आई है और कहती है कि ये किसानों के भले के लिए हैं। हम पहले ही कह चुके हैं कि यह बात नोट की जानी चाहिए कि सामान्य रूप में किसान कहने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि किसान आबादी में विभेदीकरण हो गया है। और वादे चाहे कितने भी किये जायें और कथा चाहे कितनी भी गढ़ी जाये, पूंजीवाद के अंतर्गत ऐसा कोई नियम नहीं है जिससे आम किसानों की स्थिति में सुधार हो जाये। दुनिया भर के सभी पूंजीवादी देशों में किसान आबादी सम्पत्तिहरण की प्रक्रिया से गुजरी है, किसानों की तादाद बहुत छोटी रह गई है और वे अभी भी जमीन से उजड़ रहे हैं। कृषि मामलों के जानकार देविंदर शर्मा ने बड़ी दिलचस्प बात कही है कि हर कहीं ऐसी नीतियां चलाई जाती हैं जिनसे बड़ी संख्या में किसान अपनी जमीन से उजड़ जाते हैं। इसका दोष वे ‘नीतियों’ पर देते हैं जबकि हम माक्र्सवादी मानते हैं कि पूंजीवाद में ऐसा ही होता है और ‘नीतियां’ तो होती ही है किसी खास वर्ग की, पूंजीपति वर्ग की। इस बात को ध्यान में रखना बहुत जरूरी है ताकि इस सवाल से जुड़ी किसी भावुकता में बहने से बचा जा सके और उस पर ठोस तरीके से विचार हो। छोटे उत्पादकों को गरिमामय जीवन तो समाजवाद में ही मिल सकता है, लेकिन यह हमारी चर्चा का मसला नहीं है। मजेदार बात यह है कि मार्क्सवादी-लेनिनवादी नामधारी पार्टियां भी किसान की बात करती हैं मानो यह कोई समरूप वर्ग हो। उनकी बात तो और अजीब लगती है जो भारत में समाजवादी क्रांति की बात करते हैं, लेकिन किसानों के बीच हुए विभेदीकरण को नकारते हैं और इस अंतर की अहमियत को वाजिब तवज्जो नहीं देते। फिर कुछ और भी हैं जो प्रवचन देते हैं कि तीन कृषि कानूनों में ऐसा कुछ नहीं है जिस पर मजदूर वर्ग को फिक्र करने की जरूरत है। कुछ अन्य भी ऐसा ही मानते हैं, लेकिन वे कहते हैं कि आवश्यक वस्तु अधिनियम के संशोधन से मजदूरों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली बुनियादी जरूरत की चीजों की जमाखोरी होगी और उनकी कीमत बढ़ सकती है। वे भी राजनीतिक पहलू पर ध्यान नहीं देते और भूल जाते हैं कि मार्क्सवादियों के लिए किसान सवाल दरअसल इसी लिहाज से अहम है। सिर्फ आर्थिक नजरिए से विश्लेषण करने से किसी भी समाज में किसान सवाल को सही ढंग से नहीं समझा जा सकता। भारत जैसे समाज में तो ऐसा करने से और भी मुश्किलें होंगी क्योंकि यहां आज भी छोटे या सीमांत किसान या अर्ध सर्वहारा बहुत बड़ी संख्या में हैं। और जब राज किसी फासीवादी पार्टी का हो तब तो राजनीतिक पहलू के भूल जाने को कतई माफ नहीं किया जा सकता।

किसानों के सम्पत्तिहरण और विभेदीकरण

गांव देहात के हालात पर जरा गौर करें जिनका इन आंकड़ों से पता चलता हैः

पिछली कृषि गणना (2015-16) बताती है कि भारत में जोतों की बहुत बड़ी संख्या जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों की हैं यह कुल खेतिहर क्षेत्र का 46.94 फीसद है। पिछली जनगणना के बाद से ऐसी जोतों की संख्या बहुत बढ़ गई है —

“छोटी और सीमांत जोतों (दो हेक्टेयर तक की) की संख्या 2010-11 में कुल जोतों का 85.01 फीसद थी जो 2015-16 में बढ़ कर 86.08 फीसद हो गई। कुल जोतों के क्षेत्रफल में इन छोटी और सीमांत जोतों का हिस्सा 2010-11 में 44.58 फीसद था जो बढ़कर 2015-16 में 46.94 फीसद हो गया।” इनमें भी सीमांत जोतों (एक हेक्टेयर से कम) की संख्या कुल जोतों का 67.10 फीसद है और छोटी जोतों का 17.91 फीसद!! इससे जोतों के और छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटते जाने की चलती जा रही प्रक्रिया का पता चलता है जिसका असर उत्पादकता, विकास और ज्यादा अहम बात है कि उसकी व्यवहार्यता (viability) पर पड़ता है। खेती की जा रही कुल जमीन तो कम होती जा रही है, लेकिन जोतों की संख्या बढ़ती जा रही है, इसीलिए जोतों का औसत आकार भी कम होता गया हैः

“देश में खेतिहर जोतों की कुल संख्या 2010-11 में 13.83 करोड़ थी जो बढ़ कर 2015-16 में 14.64 करोड़ हो गई। इस तरह पांच साल में उनकी तादाद 5.86 फीसद बढ़ गई।”

“इस बीच देश में कुल खेती की जा रही जमीन 2010-11 में 15.96 करोड़ हेक्टेेयर से 15.78 हेक्टेयर रह गई। इस तरह उसमें 1.11 फीसद की मामूली कमी आई।”

“खेतिहर जोतों का औसत आकार इस तरह 2010-11 में 1.15 हेक्टेयर से घट कर 1.08 हेक्टेयर रह गया।”

इस तरह हम किसानों की जमीन से उजड़ने की वही प्रक्रिया चलती देख रहे हैं जिसे लेनिन ने कहा था कि कई दशकों तक जारी रह सकती है। इसका यह भी मतलब है कि किसानों की दशा बिगड़ती जाती है।[1] अगर हम जनगणना (2011) के आंकड़े को लें तो देख सकते हैं कि इसके पहले के दशक में किसानों की संख्या में कमी आई है। यह जनगणना इस कमी को 86 लाख बताती है। यह बताती है कि 2001 की जनगणना के मुकाबले खेत मजदूरों की तादाद 44 प्रतिशत बढ़ गई। एन॰एस॰एस॰ओ॰ के 70वें चक्र यानी ‘किसानों की दशा का आकलन सर्वेक्षण’ से इन बातों का पता चलता हैः

रिपोर्ट दिखलाती है कि खेतिहर परिवारों की तादाद में भारी कमी आई है। पूरे भारत के आंकड़े दिखलाते हैं कि कुल ग्रामीण परिवारों में खेतिहर परिवारों की तादाद 57.8 फीसद थी। अगर हम अलग-अलग राज्यों के आंकड़े देखें तो राजस्थान में यह 78.4 फीसद थी और केरल में 27.3 फीसद। बिहार के लिए यह आंकड़ा 50.5 फीसद था। ध्यान रखने की बात है कि इस चक्र के सर्वेक्षण के लिए एन॰एस॰एस॰ओ॰ ने खेतिहर परिवारों की परिभाषा बड़ी व्यापक रखी थी। सर्वेक्षण में कहा गया हैः

“इस सर्वेक्षण के लिए खेतिहर परिवार उस परिवार को माना गया था जिन्हें खेतिहर गतिविधियों (मसलन, खड़ी फसलों की खेती, फल फूल की खेती, चारे की खेती, बगान, पशुपालन, मुर्गीपालन, मछलीपालन, सुअरपालन, मधुमक्खी पालन, कीटपालन, रेशमपालन वगैरह) से 3000 रुपए से ज्यादा मूल्य का उत्पादन हासिल होता है और जिस परिवार का कम से कम एक सदस्य खेती में स्वरोजगार में पिछले 365 दिन में प्रमुख या सहायक हैसियत में लगा रहा है।”

आगे हम पाते हैं कि पिछले सर्वेक्षण (एन॰एस॰एस॰ के 59वें चक्र) में उन्हीं परिवारों को रखा गया था जो कुछ न कुछ जमीन के मालिक थे। इस चक्र (70वें) में यह शर्त खत्म कर दी गई। इस तरह मामूली खेतिहर कामों में लगे लोग भी इसके दायरे में आ गए (हालांकि पूरी तरह से खेतिहर मजदूरी पर निर्भर रहने वाले परिवारों को इस सर्वेक्षण से बाहर रखा गया था)। ग्रामीण आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा गांवों में रहता तो है लेकिन वह खेती का काम नहीं करता। इससे पता चलता है कि ग्रामीण इलाके में कितनी ज्यादा बेरोजगारी फैली है और खेतिहर आबादी किस बड़े पैमाने पर उजड़ रही है। जमीन से उजड़े जाने की इस प्रक्रिया को सम्पत्तिहरण के रूप में ही देखा जाना चाहिए। यह वह आरक्षित श्रम वाहिनी भी है जो भारत के उद्योगों व सेवा क्षेत्र के लिए सस्ते श्रम मुहैया करती है। दूसरे देशों के बुर्जआ वर्ग से मुकाबले में भारत का बुर्जुआ वर्ग सस्ते श्रम को ही अपनी आपेक्षिक बढ़त (comparative advantage) की चीज मानता है। कुल खेतिहर परिवारों में से 22 फीसद अपनी कमाई मजदूरी से हासिल करते हैं और 4.7 फीसद गैर-कृषि कामों से जैसा कि नीचे दी गई तालिका से पता चलता है। इस तरह खेती किसानी अब ग्रामीण आबादी के एक बहुत बड़े हिस्से की कमाई का जरिया नहीं रह गई है। अगर हम ‘सामाजिक, आर्थिक और जातीय जनगणना, 2011” की रिपोर्ट में ग्रामीण तबके वाले हिस्से पर गौर करें तो इसमें ग्रामीण परिवारों की संख्या 17.91 करोड़ बताई गई है। इनमें से 5.39 करोड़ परिवारों की कमाई का मुख्य जरिया खेती है जबकि शारीरिक दिहाड़ी मजदूरी 9.16 करोड़ परिवारों की आमदनी का मुख्य जरिया है। इसका मतलब हुआ कि 30.14 फीसद परिवार ही अपने गुजारे के लिए खेती पर निर्भर हैं और 51.4 फीसद को उजरती मजदूरी करनी पड़ती है।

कमाई के मुख्य जरिए के मुताबिक खेतिहर परिवार (कुल खेतिहर परिवारों का वर्गीकरण)

खेती                                                    63.4 पशुपालन                                           3.7 अन्य कृषि कार्य                                1.1 मजदूरी/वेतन पर काम             22.0 अन्य                                                   5.1 गैर-कृषि कारोबार                        4.7

      स्रोतः एन॰एस॰एस॰ओ॰ 70वां दौर। फिगर 3

कृषि संकट के मुतअल्लिक भारतीय राज्य की विभिन्न प्रतिक्रियाएं

गांव देहात की हालत जब ऐसी है तो जाहिर है कि कृषि संकट गहरा होता गया है। किसानों और खेत मजदूरों की खुदकुशी चीख-चीख कर यह बताती है। भारतीय राज्य ने इसकी प्रतिक्रिया में मुख्यतः कुछ अल्पकालिक उपायों का सहारा लिया मसलन, कर्जमाफी, एक नाकारगर बीमा स्कीम जो इस तरह बनाई ही गई कि उसका फायदा कॉर्पोरेट को हो, विभिन्न तरह के अनुदान, आयात शुल्क बढ़ाना, इत्यादि। ये उपाय ज्यादा राजनीतिक मकसद से उठाए गए न कि विपत्ति के समाधन के रूप में। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम॰एस॰पी॰) का भी ज्यादा इस्तेमाल राजनीतिक संकटमोचक के रूप में और चुनावी फायदे के लिए किया जाता रहा है। एम॰एस॰पी॰ की व्यवस्था हरित क्रांति के दौरान किसानों को ऊंची पैदावार वाले अनाज को पैदा करने हेतु दाम प्रोत्साहन (price incentive) के रूप में लायी गयी थी। तब की सोच के उल्टा आज सरकारी हलकों में और सरकार को सलाह देनेवाले विशेषज्ञों और थिंकटैंक द्वारा इसे एक बोझ समझा जाता है। कुछ फसलों के मामले में एम॰एस॰पी॰ का इस्तेमाल आज भी उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहक कीमतों के रूप में किया जाता है, मसलन, तिलहन के लिए।

जहां तक राज्य की दृष्टि और लक्ष्य का सवाल है वह यह है कि किसानों को कृषि से बाहर किया जाए और इस क्षेत्र को बड़ी पूंजी के हवाले कर दिया जाए। इस तरह की बात को काफी स्पष्ट रूप से ग्यारहवीं योजना के दृष्टिकोण पत्र में (और साथ ही कई अन्य सरकारी नीतिगत दस्तावेजों में भी) पेश किया गया था जैसा कि हम आगे देखेंगे। अंतर्वर्ती चरण के रूप में ठेका खेती और खाद्य प्रसंस्करण (मूल्य संवर्धन) जैसे उपायों को सुझाया गया। नीति निर्माताओं ने फसलों के विविधीकरण को भी एक उपाय के रूप में सुझाया लेकिन यह सब बहुत कामयाब नहीं रहा। कृषि क्षेत्र के उत्पाद जिस तरह से दामों के भीषण उतार-चढ़ाव का शिकार रहते हैं, और यह विश्व व्यापार संगठन के बनने के बाद से बढ़ ही गया है, किसानों को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं।

कीमतों में भूचाल की बड़ी सटीक मिसाल है ग्वार बीज का उत्पादन। इसका इस्तेमाल ग्वार गोंद के उत्पादन में होता है। ग्वार गोंद का इस्तेमाल कच्चे तेल, विशेषकर ‘शेल तेल’ के लिए ड्रिलिंग में होता है। कच्चे तेल (पेट्रोलियम) के दामों में आई उछाल के बाद ‘शेल तेल’ के लिए खोज बड़ी तेजी से बढ़ गई। इसके साथ ही ग्वार गोंद की मांग में भी भारी तेजी आई। सो राजस्थान, गुजरात और हरियाणा के किसान ग्वार उत्पादन की ओर प्रवृत्त हुए। खरीफ के मौसम में उगाई जानेवाली इस फसल की पैदावार 2011 से 2013 के बीच दोगुनी हो गई। फिर 2015 से कच्चे तेल के भाव गिरने लगे। नतीजा हुआ कि ग्वार बीज की कीमत 300 रुपए प्रति किलो से गिर के 2016 में बस 36 रुपए किलो रह गई। सो हम देख सकते हैं कि खेती में विविधता लाने के क्या नतीजे हुए। वायदा बाजारों में भी ग्वार बीजों में जोरदार सट्टेबाजी हुई जिसका असर स्पॉट दामों पर पड़ा। किसानों के लिए तो यह किसी परिकथा के शोकगीत में बदल जाने जैसा था। यही कहानी कई सारी फसलों में दुहराई गई। मकई की खेती को ही लें। यह कहानी और कहीं की नहीं बल्कि पिछड़े राज्य बिहार की है। करगिल और लुई ड्रेफस जैसी बड़ी कम्पनियां वहां पहुंची और उन्होंने कोशी के किसानों से मकई खरीदी, बीजों और खाद के मामले में बाजार के बड़े हिस्से पर मोनसेंटो और ड्यूपॉइंट जैसी विशाल कम्पनियों का कब्जा है। बढ़ते निर्यात और बढ़ते दामों के साथ बिहार में मकई की रबी फसल की पैदावार 2006 से 2014 के बीच 10.64 लाख टन से बढ़कर 21.26 लाख टन हो गई। इसके बाद कीमतें गिरने लगीं। साल 2016 तक कीमतें बुरी तरह टूट गईं। इससे निर्यात प्रभावित हुए। मकई की कीमतों पर उसका बुरा असर पड़ा। साथ ही कई अन्य फसलों के दामों पर भी। बिहार सरकार के उद्योग विभाग के उद्योग मित्र वेबसाइट को स्वीकार करना पड़ा कि “दुनिया के बाजारों में मालों की कीमतें टूटने से बिहार की मकई क्रांति को बहरहाल तगड़ा झटका लगा है।” इसी तरह से 1990 के दशक में कपास की लहलहाती फसलें कीमतों में गिरावट के साथ अक्सर ऐसे दुखांत में बदलने लगीं। ‘किसानों की आजादी’ के बारे में और ज्यादा क्या कहा जाए! ‘बाजारों को ठीक से काम करने देने’ के बारे में और क्या कहा जाए!

मध्य प्रदेश में बीते दो दशक के दौरान खेतिहर पैदावार जबरदस्त रूप से बढ़ी है। बढ़त दर दो अंकों तक भी गई है। अचानक 2016 में वहां किसान सड़कों पर आ गए और हिंसक विरोध प्रदर्शन भड़क उठे। कैसी विडम्बना रही कि यह उसी वक्त हुआ जब कृषि नीति के बारे में राज्य सरकार के एक प्रमुख सलाहकार अशोक गुलाटी राज्य में कृषि विकास का गुणगान कर रहे थे और उन्होंनें कुछ अन्य विद्वानों के साथ मिलकर आई॰सी॰आर॰आई॰ई॰आर॰ के लिए इस पर एक ‘वर्किंग पेपर’ लिखा थाः ‘मेकिंग रैपिड स्ट्राइड्स –एग्रीकल्चर इन मध्य प्रदेश’। बाद में उन्हें स्वीकार करना पड़ा कि “मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के किसानों के विरोध प्रदर्शन बता रहे हैं कि आर्थिक मोर्चे पर सब कुछ ठीक ठाक नहीं है। खास तौर पर खेती के मामले में। मध्य प्रदेश में कृषि जी॰डी॰पी॰ 2005-06 से 2014-15 के बीच 9.7 फीसद की दर से बढ़ता गया है। अगर वहां ऐसा असंतोष उभर सकता है तो कोई भी राज्य शायद इससे अछूता नहीं रह जायेगा।” (इण्डियन एक्सप्रेस, 19 जून, 2017) उन्होंने इस बात को नोट किया कि उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि के बावजूद किसानों का दुखदर्द बना हुआ है। उन्होंने तजवीज की कि यह सारा मसला दरअसल ‘बाजारों को ठीक से काम करने देने’ का है। उन्होंने आगे लिखा — “समाधन बड़ा आसान सा हैः निर्यात पर तमाम बंदिशों, अनाजों के निजी भंडारण पर लगी सीमाओं और तमाम खेतिहर जिंसों में वायदा कारोबार पर लगे बंधनों को हटाओ। यह उन जिंसों के मामले में और भी जरूरी है जिनका आयात बेहद कम या जीरो तटकर पर हो रहा है। अगर ऐसा नहीं किया गया तो सरकार को उन तमाम फसलों को मजबूरन खरीदना पड़ेगा जिनकी कीमतें गिर जाएंगी। ऐसा नीतिगत विकल्प न तो कारगर होगा और न ही संभव।” यह सब हम ग्वार बीज और मकई के मामले में देख चुके हैं। जाहिर है कि वे चाहते हैं कि तमाम फसलों के मामले में ऐसा ही हो और इसीलिए तीन नए कृषि कानूनों को उन्होंने ‘खेती के लिए 1991 जैसा पल’ करार दिया है। और एक बार फिर हम इस मामले की विडम्बना पर हतप्रभ रह जाते हैं कि यह कीमतों का ही मसला है जो बुर्जुआ वर्ग के दोनों हिस्सों को परस्पर विरोधी खेमों में बांट देता है। यानी ग्रामीण और बडे़ बुर्जुआ वर्ग को। ऊंची कीमतों का लालच तत्काल लाभ का वादा करता है। लेकिन खेती पर इसका असर प्रतिकूल ही होता है जैसा कि मार्क्स ने ‘पूंजी’ में दिखाया है।[2] लेकिन पूंजीवाद में किसान ऊंची कीमतों की लालच में आ ही जाते हैं। पूंजीवाद में उत्पादक पर सचमुच उत्पादन का राज चलता है जैसाकि मार्क्स और एंगेल्स ने कहा भी है। ऐसी ही एक मिसाल है पंजाब में भूगर्भ जल का संकट जो उत्पादन की लागत को बढ़ा देता है और पर्यावरण को भी बर्बाद करता है।

हम देखते हैं कि खेतिहर पैदावार पर मौसम और अन्य कुदरती कारकों का बहुत ज्यादा असर पड़ता है। पूंजीवादी व्यवस्था के तौर तरीकों की वजह से खेतिहर पैदावार की मांग में भी अचानक बड़े भारी उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। इसलिए फसलों पर सट्टेबाजी की मार खास तौर पर बड़ी भारी पड़ती है। फॉरवर्ड ट्रेडिंग और वायदा कारोबार जैसे तौर तरीकों का मकसद फसलों के दाम में ‘स्थिरता’ लाना और सही ‘कीमत की तलाश’ बताया जाता है। लेकिन ये तौर तरीके हैं ही इस किस्म के कि उनसे सट्टेबाजी को बढ़ावा मिलता है। बुर्जुआ अर्थशास्त्राी जिसे सम्भावित जोखिम से सुरक्षा या हेजिंग कहते हैं, वह दरअसल सट्टेबाजी का ही एक और नाम है। तमाम वायदा और डेरिवेटिव कारोबार दरअसल हैं ही इस किस्म के कि वे ‘सही कीमतों’ की समस्या को सुलझाने के बजाय और बढ़ाते ही हैं। हाल के सालों में इन बाजारों के वित्तीयकरण के साथ यह सब और बढ़ता ही गया है। इस क्रम में मेहनतकश किसानों की दशा बिगड़ती गई है। एकफसली खेती और पैदावार के निर्यात पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं में निर्यात में भारी कमी और इस वजह से अर्थव्यवस्थाओं के ध्वस्त होने से पैदा हालत की वजह से भ्रातृघातक युद्ध भी हुए हैं। वायदा बाजार को ऐसा बाजार बताया गया था जो सही ‘कीमत की तलाश’ में मदद करता है और प्रत्यक्ष उत्पादकों यानी अपनी खेती खुद करने वाले किसानों की जोखिमों से हिफाजत करता है। लेकिन इन वायदा बाजारों ने ही सट्टेबाजी की लहरों के साथ प्राथमिक जिंसों की कीमतों को आकाश तक पहुंचा दिया। इन फसलों की कीमतें बढ़ने से कुछ किसानों की आमदनी बढ़ी होगी। लेकिन इनसे कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव भी आया और इसकी मार पड़ी प्रत्यक्ष उत्पादकों यानी गरीब किसानों पर (ऊपर हमने मकई की मिसाल देखी है। बताया गया है कि साल 2015 में दुनिया भर में मकई का वायदा कारोबार वास्तविक पैदावार का ग्यारह गुना था) इस बारे में 2008 के संकट पर स्टिगलिट्ज रिपोर्ट में कहा गया था किः

“संकट के पहले कर्ज में हुए विस्तार के साथ बढ़ती वैश्विक आर्थिक विकास की वजह से बढ़ती हुई कीमतों से कई विकासशील देशों को फायदा हुआ। खास तौर पर उन देशों को जिन्हें प्राथमिक जिंसों (primary commodities) के निर्यात से आमदनी होती थी। हाल के सालों में सट्टेबाजी की गतिविधियों का भी बढ़ती कीमतों में योगदान रहा होगा। लेकिन कीमतों में इस लाभकारी रुझान के साथ कीमतों में अचानक भारी उतार-चढ़ाव भी होता रहा।”[3]

इन जिंसों के व्यापार में वित्तीयकरण की भूमिका और इसकी वजह से कीमतों में इजाफे पर संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था (UNCTAD) ने नोट किया कि:

“साल 2002 से मध्य-2008 के बीच प्राथमिक जिंसों के दाम में मजबूत और लगातार इजाफा होता रहा। इस दौरान जिंसों के वायदा बाजार में वित्तीय निवेशकों की मौजूदगी बढ़ती रही। जिंसों के बाजार के इस ‘वित्तीयकरण’ से यह चिंता पैदा हुई कि जिंसों की कीमतों में हाल में आई भारी उछाल और फिर जबरदस्त उतार तो वित्तीय निवेशकों द्वारा ही संचाालित थे जो उन जिंसों का इस्तेमाल सम्पत्ति की तरह कर रहे थे जिनसे आगे चल कर मुनाफा कमाया जा सके और इस वजह से उनकी भारी सट्टेबाजी कर रहे थे।”

“साल 2002 के शुरू से लेकर 2008 के मध्य तक के 78 महीने में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का समग्र वस्तु मूल्य सूचकांक लगातार बढ़ता गया और वस्तुओं की नकद कीमत चार गुना से ज्यादा बढ़ गई। इसी दौरान अंकटाड का गैर-ईंधन वस्तु मूल्य सूचकांक नकद अर्थों में तीन गुना हो गया और वास्तविक अर्थों में करीब 50 फीसद बढ़ गया। जुलाई 2008 में अपने चरम पर पहुंचने के बाद से ईंधन तेल की कीमतें करीब 70 प्रतिशत गिर गई हैं जबकि गैर-ईंधन तेल की कीमतें अप्रैल 2008 में अपने चरम से 35 फीसद नीचे गिर गई हैं। यह गिरावट बड़ी भारी है। फिर भी यह बीते छह साल में हुए इजाफे का करीब सातवां हिस्सा ही थी। और इस तरह जिंसों के दाम अभी भी इस दशक के पहले पांच साल के स्तर से ऊंचे बने हुए हैं। विभिन्न जिंसों की कीमत में उछाल और फिर उतार में समय का ही फर्क रहा। लेकिन कीमतों में भारी उछाल और फिर उनमें आई तेज गिरावट तमाम प्रमुख वस्तु संवर्गों में देखने को मिली और उनसे उन जिंसों की कीमतें भी प्रभावित हुईं जिनका कारोबार वायदा बाजार में होता है और उनकी भी जिनका कारोबार या तो वायदा बाजार में नहीं होता या जो उन बाजारों में प्रमुख वस्तु सूचकांक में शामिल नहीं हैं ; यह दूसरा संवर्ग ही है जिसका इस्तेमाल कई सारे वित्तीय निवेशक जिंसों के कारोबार में निवेश के लिए करते हैं।”[4]

हम देख सकते हैं कि किस तरह से उत्पाद का माल रूप और अंततोगत्वा यह पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था जो सट्टेबाजी को बढ़ावा देती है मेहनतकश किसानों का नुकसान करती है और उसे व्यवस्था का शिकार बनाती है (भारत में किसानों की खुदकुशी को याद रखें)। अल्पकालिक फायदे बड़े आकर्षक तो लगते हैं लेकिन कीमतों में भूचाल आबादी के इस हिस्से के लिए विनाश लेकर आता है। यही नतीजा है ‘बाजारों को ठीक से काम करने देने’ का।

वे तीन कृषि कानून इस साल संसद के मानसून सत्र में बिना पूरी बहस के और बिना वोट कराए ध्वनि मत से पास कराए गए जिन्हें लेकर किसानों और सरकार के बीच टकराव बना हुआ है। सरकार ने कोरोनावायरस महामारी में अपना मौका ताड़ा और वे तमाम विधेयक इसी तरह पास कर लिए जो राजनीतिक तौर पर संवेदनशील थे और अधर में लटके हुए थे। इस तरह दूसरे श्रम आयोग ने अपने मन की मुराद लेबर कोड के रूप में पूरी होती देखी जबकि कुछ राज्यों ने महामारी के दौरान श्रम कानूनों को निलंबित ही कर दिया। इस आयोग ने अपनी सिफारिशें 2002 में ही सरकार को सौंपी थीं। और फिर कृषि कानून भी पास हो गए। भूलना नहीं चाहिए कि यह भी उन तमाम नवउदारवादी आर्थिक विचारों को अंजाम तक पहुंचाना था जिनके लिए जीतोड़ कोशिश नब्बे के दशक से ही की जा रही थी। अब सरकार ने कई लिहाज से अनुकूल माहौल का संयोग पाकर इन सबको निपटा दिया है। यह बात हमें भूलनी नहीं चाहिए।

इन कानूनों का आकलन करते हुए हमें उस नजरिए से ध्यान नहीं हटाना चाहिए जो इन बदलावों के पीछे है। यह सिलसिला चल तो लंबे समय से रहा था, लेकिन एक फासीवादी पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार ही तमाम विरोध प्रतिरोध के बावजूद इसे जबरन सरपट अंदाज में पास कराने का राजनीतिक दुस्साहस कर सकी। दक्षिणपंथी नीतियों के नशे में चूर और कॉर्पोरेट स्वार्थों को पूरा करने में पूरी बेशर्मी से लगी सरकार ही ऐसा कर सकती थी। कृषि मंडियों को खत्म करने या उनका बुरा हाल कर बर्बाद कर देने की नीयत से 2003 में ही एक मॉडल कानून बनाया गया था। उसे राज्य सरकारों के सामने रखा गया था और कृषि मंडियों को संचालित करने वाले अपने-अपने ए॰पी॰एम॰सी॰ कानूनों को संशोधित करने को कहा गया था। इस मॉडल कानून का इरादा भी वही था जो नया कानून करना चाहता है। फर्क बस इतना था कि उसमें वही सब जरा धीरे-धीरे करने की मंशा थी। एक अध्याय उसमें ठेका खेती पर भी था। बिहार सरकार ने ए॰पी॰एम॰सी॰ कानून को 2006 में ही खत्म कर दिया। इसका नतीजा हुआ कि बाजार समितियों से जुड़ी संरचना बेकार होती गई। बिना किसी खास बुनियादी संरचना वाले बेलगाम बाजार उभर आए जिनसे किसानों को नुकसान हुआ।

ए॰पी॰एम॰सी॰ मंडियों की बड़ी भूमिका रही थी। उन्होंने फसलों की बिक्री के लिए बुनियादी संरचनाएं तैयार की थीं। लाइसेंसधारी आढ़तियों, नीलामी, समय पर भुगतान की व्यवस्था, नापतौल, और फसलों की गुणवत्ता के आधार पर उन्हें छांटने और उनका दर्जा तय करने की पूरी व्यवस्था तैयार की थी। यह व्यवस्था हरित क्रांति के दौरान अस्तित्व में आई थी। अब जब हरित क्रांति का दौर खत्म हो चुका है तो जिसके लिए सरकार ने इन मंडियों को खड़ा किया था उस हिसाब से सरकार के लिए इनका ज्यादा मायने नहीं रह गया है।

हरित क्रांति का आगाज उस दौर में हुआ था जब भारत में खाद्यान्न की भारी किल्लत थी। कहा जाता है कि विदेशों से जहाजों पर अनाज आता था तो यहां के लोगों के मुंह में दाना जाता था। हरित क्रांति का लक्ष्य मेहनतकश किसानों के बीच उभड़ रहे आक्रोश को दबाना भी था (खाद्यान्न की किल्लत को दूर करने के अलावा हरित क्रांति ने खेती के क्षेत्र में माल-मुद्रा संबंधों का और विस्तार किया। इसका नतीजा हुआ कि माल उत्पादन यानी बाजार के लिए उत्पादन का सार्विकीकरण हुआ जिससे पूंजीवाद का विकास हुआ)। बीती सदी के नब्बे के दशक से बेलगाम की गयीं उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण की ताकतों ने खेती के क्षेत्र को भी प्रभावित किया। इस बात पर बड़ा अफसोस जताया जाता है कि ‘सुधार’ कृषि क्षेत्र तक नहीं पहुंच रहे हैं जबकि ग्रामीण भारत में सार्वजनिक निवेश में कमी की गई (और बातों के अलावा नवउदारवादी “राजकोषीय मूलतत्ववाद” – “fiscal fundamentalism” – के चलते) और सब्सिडियों की कटौती भी की जाने लगी। इसके अलावा विश्व व्यापार संगठन की स्थापना के चलते परिमाणात्मक प्रतिबंधों को हटाने, गैर-तटकर प्रतिबंधों को खत्म करने व तटकरों में कमी लाने की व्यवस्था कायम हुई। कमोडिटी एक्सचेंजों की स्थापना 2002 में नेशनल मल्टी-कमोडिटी एक्सचेंज के साथ शुरू हुई और इस सिलसिले का ताजातरीन उदहारण है आइसेक्स जो 2018 में कायम हुआ। नाबार्ड और अन्य सरकारी संस्थानों ने भी इन एक्सचेंजों के लिए राशि मुहैया की। साल 2003 में उन 54 जिंसों के फॉरवर्ड ट्रेडिंग को मंजूरी दे दी गई जिन पर तब तक रोक थी। इनमें गेहूं, चावल, चीनी और दलहन भी थे। जब अनाजों की कीमतें आसमान छूने लगीं और यह बात साफ हो गई कि कीमतों में हो रहा असामान्य इजाफा वायदा कारोबार की वजह से है तो 2007 में गेहूं और चावल में वायदा कारोबार बंद कर दिया गया। ऐसा नुकसानदेह था अनाजों में वायदा कारोबार। सरकार की मदद से इन संस्थानों की स्थापना हुई ही इसीलिए कि फसलों का वायदा कारोबार आगे बढ़े। और कृषि विशेषज्ञों ने सही ‘कीमत की तलाश’ और जोखिमों से ‘हिफाजत’ के रामबाण के रूप में वायदा कारोबार की खूब सराहना की। यह सब कैसी भारी धोखाधड़ी है, इसे हम विश्व बाजार की कीमतों में होने वाले भूचाल से देख सकते हैं जिसकी वजह से मेहनतकश किसान बुरी तरह प्रभावित होते हैं।

जो भी सांस्थानिक प्रक्रियाएं कायम की जा रही थीं उनका मकसद खेती में बड़े कॉर्पोरेट को और ज्यादा प्रवेश देना था ताकि खेत से प्लेट तक के पूरे सिलसिले पर कॉर्पोरेट की मौजूदगी हो। इसी मकसद से भारतीय राज्य ने 2003 में आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन किया तथा ए॰पी॰एम॰सी॰ कानून में संशोधन किया। इन संशोधनों के जरिए निजी कारोबार को सुविधा दी गई। गोदामों की रसीद को व्यापार के लिए निगोशिअबल इन्स्ट्रमन्ट (negotiable instrument) जैसा दर्जा दिया गया जिसके आधार पर व्यापार हो सकता था। इन उपायों को ‘बाजारों को गहरा करना’ कहा गया। आधुनिक कोमोडिटी एक्सचेंज कायम किए गए, फॉरवर्ड और वायदा कारोबार पर से बंदिशें उठाई गईं, ठेका खेती को बढ़ावा दिया गया, किसान उत्पादक संघ (Farmer Producer Organisation) कायम किए गए और उन्हें कम्पनी कानून के तहत कम्पनियों का दर्जा दिया गया और कुछ खास मामलों में पट्टे पर जमीन लेना आसान बनाया गया। बंजर और पानी में डूबी और अन्यथा भी बेकार पड़ी जमीन कुछ राज्यों में कॉर्पोरेट को दे दी गई। गुजरात में 2000 एकड़ तक जमीन 20 साल के पट्टे पर बागवानी और बायोईंधन की फसल लगाने के लिए कॉर्पोरेट को दे दी गई।[5] कृषि निर्यात ज़ोन भी बनाए गए। नीति आयोग 2016 में एक मॉडल एग्रीकल्चरल लैण्ड लीजिंग एक्ट लेकर आया। उसने इस मामले में राज्य सरकारों को जरूरी कदम उठाने को कहा क्योंकि जमीन राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में होती है। इस तरह इस मामले में हम और आगे के कदम उठाए जाने की उम्मीद कर सकते हैं। इस साल मई में ‘रोजगार और कौशल विकास पर मंत्रियों के समूह’ ने खेती के कार्पोरेटीकरण के लिए ‘लैण्ड पूलिंग’ का सुझाव दिया ये सारे कदम कॉर्पोरेट खेती को बढ़ावा देने वाले थे। इसी दिशा में उठाया गया एक और कदम था भारतीय खाद्य निगम की ‘अनबंडलिंग’ (समझिए उसे विघटित करने की प्रक्रिया) के लिए शांता कुमार समिति का गठन।

इन तमाम मामलों में राज्य ने बड़ी चालाकी से उन तर्कों का इस्तेमाल किया जो अपना माल बाजार में बेचने वाले और बेहतर कीमतों के मोह में फंसे भूस्वामी किसानों को आकर्षक लगे। इसी की एक मिसाल है कृषि अर्थशास्त्राी और सरकार के एक प्रमुख सलाहकार अशोक गुलाटी का ‘बाजारों को ठीक से काम करने देने’ का जुमला। जो भी व्यवस्थाएं और तौर तरीके तैयार किए जा रहे हैं वे खेती में बड़ी पूंजी (कॉर्पोरेट) के दबदबे को बढ़ावा देने के लिए उठाए गए हैं। मेहनतकश किसानों की विशाल तादाद की लम्बे समय से चली आ रही मुसीबतों का निदान कॉर्पोरेट खेती से किया जाएगा। खेती को सीधे-सीधे कॉर्पोरेट के हवाले करना राजनीतिक तौर पर विस्फोटक मसला है। इसलिए बीच के रास्ते के तौर पर ठेका खेती का प्रस्ताव दिया गया। कृषि संकट का यही पूंजीवादी निदान है। इन सबका विरोध करते हुए हमें यह भूलना नहीं चाहिए कि मेहनतकश किसानों की विशाल तादाद के दरिद्रीकरण और उनके सम्पत्तिहरण को किसी भी पूंजीवादी समाज में नहीं रोका जा सकता। इसे इतिहास ने साबित कर दिया है जैसा कि हम ऊपर देख चुके हैं। इसीलिए समाजवाद ही एकमात्रा जवाब है।

खेती से गरीब और छोटे किसानों को बाहर करना

हमारे नीति निर्माता दरिद्रीकरण और सम्पत्तिहरण के इस तथ्य को जानते हैं लेकिन वे स्पष्ट रूप से इस बात को मानते नहीं हैं। इसकी जगह पर वे घुमाफिरा कर बात को रखते हैं — वे कहते हैं कि देखिए कृषि क्षेत्र से जी॰डी॰पी॰ का केवल 16.5 प्रतिशत आता है (यह तो 2019-20 की बात है जो मद्धिम विकास (slowdown) का साल था, दूसरे सालों में यह और भी कम रहा है), जबकि उस पर आधी से ज्यादा जनसंख्या का बोझ है। इसलिए हम पाते हैं कि 11वीं पंचवर्षीय योजना का एप्रोच पेपर किसानों को कृषि से बाहर करने की जरूरत को रेखांकित करता है। हम उससे उद्धृत करेंगे —

“कृषि जी॰डी॰पी॰ के विकास को 4 प्रतिशत कर, दुगुना करने पर ग्रामीण रोजगार शर्तें बेहतर होंगी, इससे वास्तविक मजदूरी भी बढ़ेगी और बेरोजगारी भी कम होगी। तथापि यदि ऐसा हो भी जाता है, 9 प्रतिशत का कुल विकास दर कृषि और गैर-कृषि परिवारों के बीच आय की विषमता को बढ़ायेगा यदि कृषि में संलग्न 1 करोड़ कामगारों को गैर-कृषि क्षेत्र में रोजगार नहीं मिला। इसे सम्भव बनाने के लिए तथा श्रम वाहिनी के सभी नवांगतुकों को स्थान देने के लिए, गैर-कृषि रोजगार की वृद्धि 11वीं योजना के दौरान 6 प्रतिशत प्रति वर्ष की जरूरत होगी।

“11वीं योजना की रणनीति का एक पक्ष यह है कि द्रुत गति से कृषि उत्पादन वृद्धि को सीधे रोजगार वृद्धि के स्रोत के रूप में उतना नहीं देखना चाहिए वरन उसे न्यूनरोजगार (underemployment) घटाने के आवश्यक शर्त के रूप में तथा प्रति व्यक्ति कृषि आय की ज्यादा तेज वृद्धि के स्रोत के रूप में देखना चाहिए। हमें इस बात का संज्ञान लेना चाहिए कि जोतों का विद्यमान रकबा कृषि से मिलने वाली सम्भावित आय को परिसीमित करते हैं और गैर-कृषि क्षेत्र के द्रुत विकास से किसानों को अपने जोतों को लगान पर लगाकर या फिर बेच कर गैर-कृषि कार्यों में लग जाना बेहतर लगेगा। बहुत से अन्य किसान उत्पादकता बढ़ाने के लिए मशीनीकरण करेंगे और इस प्रक्रिया में उजरती मजदूरों के लिए रोजगार घटेगा। इसीलिए हमारा उपरोक्त विमर्श इस बात को मान कर चला है कि रोजगार सृजन के पूरे मुद्दे को हम गैर-कृषि क्षेत्र की ओर से देखें। तथापि, हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इसकी सम्भावना है कि जैसे-जैसे पुरूष मजदूर गैर-कृषि काम करेंगे, गांवों में महिलानीत परिवारों की संख्या में वृद्धि होगी। और यह कि उजरती मजदूरी (hired labour) की मांग में कमी के चलते खेतिहर मजदूर प्रतिकूल ढंग से प्रभावित होंगे। खासकर, हमें इस बात का संज्ञान लेना चाहिए कि जमीन के बेहतर इस्तेमाल के लिए और उत्पादकता में उच्च प्रतिमान स्थापित करने के लिए जमीन खरीद-फरोक्त में वृद्धि और उजरती मजदूरों का विस्थापन जरूरी है लेकिन ये सामाजिक अशांति ला सकती है।” (Towards Faster and More Inclusive Growth – An Approach to the 11th Five Year Plan (2007-2012); p.79, अनुवाद और शब्दों पर जोर हमारे हैं)

तो यहां हमें कृषि से सीमांत व छोटे किसानों को निकालने की समस्या देखने को मिलती है और इसी ओर हमारे शासक काम करते रहे हैं। यह आलेख यू॰पी॰ए॰ के शासनकाल से है और यह हम सीधे उन्हीं के मुख से सुन रहे हैं हालांकि इसे राजनीतिक रूप से वांछनीय शब्दावली में पेश किया गया है। जब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को किसानों की दुर्दशा पर फोकस करने वाली फिल्म ‘पीपली लाइव’ दिखाया गया तो उन्होंने टिप्पणी की कि समस्या नत्थाओं के लिए रोजगार बहाल करने का था (नत्था इस फिल्म का नायक है)। हां, बात तो यह है ही और हमें तीनों कृषि कानूनों को श्रम कानूनों में संशोधनों के साथ पढ़ना चाहिए (जिन्हें लेबर कोड कहा गया है)। आगे यह बड़े पूंजीपतियों के इस सामाजिक अशांतिवाली (विघटनकारी) योजना के प्रबंधन का सवाल है। इसीलिए बनने वाला हर कानून या होनेवाला हर संशोधन वैसा होना चाहिए था जिसे राजनीतिक रूप से सम्भाला जा सके और हम पाते हैं कि हमारे हुक्मरान धीरे-धीरे चतुराईपूर्ण तरीके से करोड़ों लोगों को खेती से निकालने के काम में लगे हुए थे। बीते वर्षों में छोटे और सीमांत किसानों के लिए ‘गोल्डन हैण्डशेक’ यानी उन्हें एक खास रकम देकर खेती से बाहर करने की बात कही गई। धनी किसानों के एक संगठन, शेतकारी संगठन, के नेता शरद जोशी ने इसकी वकालत की थी। यह बात साफ है कि कई तरह के बदलाव लाए जा रहे थे ताकि कॉर्पोरेट कृषि के लिए जगह बने। चल रहे कृषि संकट का यही पूंजीवादी जवाब है और अन्यथा हो भी नहीं सकता। हम प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना को ही लें। यह किसानों के लिए आय समर्थन का स्कीम है और राजनीतिक रूप से आकर्षक भी है। इस आय समर्थन का निहितार्थ क्या है? वास्तव में इस सरकार के सलाहकार सुझाव देते हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम॰एस॰पी॰) बहुत खर्चीला प्रावधान है और यह ‘बाजार को विकृत करने वाला’ भी है (‘बाजार/व्यापार को विकृत करनेवाला’ — market distorting एक नव-उदारवादी शब्दावली है जिसे विश्व व्यापार संगठन के समझौतों के समय भी काफी परोसा गया ताकि सब्सिडियां, आयातों पर लगीं परिमाणात्मक बंदिशें, दूसरे गैर-तटकरीय बंधन, उच्च आयात शुल्क व्यवस्था, इत्यादि खत्म किए जाएं। नव-उदारवादी अर्थशास्त्र के अनुसार बाजार सबसे बेहतर जानकारी रखता है और वह संसाधनों का आबंटन सबसे कुशलतापूर्वक कर सकता है। इससे सही निर्णय लिए जा सकते हैं आदि। हालांकि तथ्य इसके विपरीत ही हैं)। ऐसे में यह समझा गया कि बेहतर होगा कि एम॰एस॰पी॰ की जगह एक खास नकद रकम किसानों को आय समर्थन के रूप में दे दी जाए। (ICRIER का एम॰एस॰पी॰ और आय समर्थन के विकल्प पर अध्ययन यही बात कहता है)। यह विछिन्न आय समर्थन (decoupled income support) के बराबर है और इस आय समर्थन का वास्तविक उत्पादन से कुछ लेना देना नहीं है। इसको विश्व व्यापार संगठन के तहत भी स्वीकृति प्राप्त है और यह उसके हरे बक्सा (ग्रीन बाक्स) — यानी अनुमतिप्राप्त अनुदानों के तहत आता है। यह भी किसानों को कृषि से हटाने का एक तरीका है — एक अप्रत्यक्ष तरीका। यह राजनीतिक रूप से कम विस्पफोटक भी है जिसकी सरकारी हलकों में की गई बात को ऊपर दिया गया है (चलते-चलते यह भी बता देना चाहिए कि विश्व व्यापार संगठन ‘उत्पादक रिटायरमेंट लाभ’ की भी अनुमति देता है)। यही बात है जिससे कि सरकार ने भी इस स्कीम को शुरू किया है। हम सभी जानते हैं कि वित्तीय महाप्रभु सब्सिडी या जिंस के रूप में लाभ पहुंचाने के बजाय लाभार्थी के बैंक खाते में सीधे सीधे पैसा जमा कर देने के लिए प्रचार करते रहे हैं (DBT)।

प्रत्यक्ष हस्तांतरित लाभ (DBT) जन वितरण प्रणाली, खाद्य निगम व न्यूनतम मूल्य समर्थन

विश्व बैंक तथा अन्य वित्तीय संस्थानों के साथ मिलकर वित्तीय समावेशन हेतु गठबंधन (Alliance for financial inclusion) ने इस बात पर बल दिया कि हर ‘विकासशील’ देश के प्रत्येक व्यक्ति या परिवार के पास बैंक खाता होना चाहिए। यह मुहिम ऊपर वर्णित DBT के तहत है। DBT को ज्यादा कार्यकुशल बताया गया और कहा गया कि यह लाभार्थियों के लिए ज्यादा अच्छा भी है और यह रिसाव (‘leakage’ मतलब भ्रष्टाचार) को रोकने में ज्यादा मददगार है। जब हम मौजूदा तीन कृषि कानूनों को देखते हैं तो हमें यह याद रखना चाहिए कि नकद ट्रांसपफर की व्यवस्था की शुरुआत हो गई है। यदि आज किसान एम॰एस॰पी॰ के लिए चिन्तित हैं और यदि High level committee on restructuring of Food Corporation of India या शांता कुमार कमिटी के अनुसार केवल 6 प्रतिशत किसानों को ही एम॰एस॰पी॰ का लाभ मिलता है तो हमें इन कानूनों के खिलाफ विरोध को खारिज इस बात से नहीं कर देना चाहिए कि एम॰एस॰पी॰ धनी किसानों की मांग है (चलते चलते हम यह कह दें कि हमें शांता कुमार कमिटी की रिपोर्ट की बात से भ्रम में नहीं आ जाना चाहिए कि 22 कृषि उत्पादों के लिए घोषित एम॰एस॰पी॰ केवल 6 प्रतिशत किसानों को ही मिलता है)। कमिटी का कार्यक्षेत्र जन वितरण प्रणाली और एफ॰सी॰आई॰ को विघटित करने के लक्ष्य का ही एक हिस्सा था। इस काम को एकबारगी नहीं किया जा सकता इसीलिए कुछ मध्यवर्ती कदमों की सिफारिश की गई है जैसे कि बेशी अनाज पैदा करने वाले राज्यों में खरीदारी उन्हीं राज्यों के जिम्मे दे दी जाए, ठेके के काम द्वारा निजीकरण किया जाए, निजी क्षेत्र में वेयरहाउसिंग व खरीदारी, आदि। कमिटी ने जिन्स रूप में वितरण के बदले नकदी ट्रांसपफर की भी सिफारिश की है। वह खाद्य सुरक्षा के अंतर्गत आने वाली आबादी को 67 प्रतिशत से घटाकर 40 प्रतिशत करने को कहती है। कुछ हलकों से तो यह भी सुझाव आ रहा है कि इसे आबादी के 20 प्रतिशत तक ही सीमित कर देना चाहिए। उन्होंने लक्षित जन वितरण प्रणाली के तहत आनेवाले गैर-अंत्योदय परिवारों के लिए दाम बढ़ाकर एम॰एस॰पी॰ के पचास प्रतिशत कर देने की सिफारिश की है। तो हम देख सकते हैं कि सरकारी खाद्य आपूर्ति के बदले उससे पीछे हटने की प्रक्रिया शुरू है। आने वाले दिनों में हमें केवल कैश ट्रांसफर ही मिलेगा खाद्य आपूर्ति की सरकारी व्यवस्था नहीं। जब हम मौजूदा हालातों में बात करते हैं तो हमें यह सब दिमाग में जरूर रखना चाहिए। और ऐसा किए बिना तीनों कृषि कानूनों की समीक्षा नहीं करनी चाहिए। अपने पिछले शासनकाल में भाजपा सरकार ने कॉर्पोरेट को सरकारी जमीन दे देने के लिए बारम्बार अध्यादेश जारी किए और यह कॉर्पोरेट के लिए काम करने की फासीवादियों की दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति को दिखाता है।

तीन कृषि कानून

अब हम उन तीन कृषि कानूनों की बात करेंगे जिसके चलते यह तूफान खड़ा हुआ है।

विवाद के केन्द्र में जो ये तीन कानून हैं उनकी घोषणा प्रधान मंत्री द्वारा कोरोनाकाल के लिए घोषित 20 लाख करोड़ रुपए के पैकेज के साथ मई, 2020 में की गई थी। फिर 5 जून, 2020 को इन तीनों कानूनों को प्रभाव में लाने के लिए अध्यादेश जारी किये गए और अंततः इन्हें संसद के माॅनसून सत्र में बिना चर्चा और सही तरीके से मतविभाजन के ऐन-केन-प्रकारेण पारित घोषित कर दिया गया। उनमें दी गई मुख्य बातों को देखा जाये —

      ‘कृषि उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सरलीकरण) अधिनियम, 2020’ पारित किया गया है जिसे आलोचकों ने ‘बाजार समिति या मंडी बाइपास कानून’ की संज्ञा दे दी है क्योंकि कृषि उत्पाद विपणन समितियां (APMC) राज्यों के अधीन आते हैं और केन्द्र सरकार उन पर कानून नहीं बना सकती थी तो उसने किनारे से यह कानून बना दिया। उसने इस बात का फायदा उठाया कि अंतर्राज्यीय व्यापार केन्द्र के अधीन आता है और वह उस पर कानून बना सकता है। यह कानून इस बात की इजाजत देता है कि किसान और खरीदार किसी भी स्थान पर खरीद-बिक्री कर सकते हैं और वह भी बिना कोई शुल्क दिए। इस तरह यह कानून राज्य के बाजार समिति अधिनियमों को एक तरह से निरस्त करता है। इस कानून के तहत चलने वाले किसी तरह के व्यापार से राज्य सरकारें किसानों, व्यापारियों और इलेक्ट्राॅनिक व्यापार प्लेटफार्म से किसी तरह के शुल्क, बाजार फीस या लेवी नहीं ले सकती हैं। व्यापार किसी भी जगह से चल सकता है चाहे वह किसान का खेत हो, वेयरहाउस या साइलो हो या किसी अन्य तरह का व्यापार प्लेटफाॅर्म हो। कृषि उत्पाद का मतलब खेत व पशुपालन से आने वाला उत्पाद है। खरीदारी चाहे खुदरा व्यापार के लिए हो, तत्काल-उपयोग के लिए हो, मूल्य संवर्धन के लिए हो, थोक व्यापार के लिए हो, प्रसंस्करण के लिए हो, उत्पादन के लिए हो, निर्यात या उपभोग के लिए किसी पर कोई पाबंदी नहीं है और कोई भी राज्य में या अंतर्राज्यीय पैमाने पर व्यापार कर सकता है। वैसी कृषि उपज जिसके व्यापार का नियमन राज्य APMC कानून द्वारा किया जाता है, के लिए जरूरी है कि खरीदार एफ॰पी॰ओ॰ हो, कृषि सहकारी समिति हो या वैसा व्यक्ति हो जिसके पास PAN या वैसा कोई दस्तावेज हो जिसकी अधिसूचना सरकार करेगी। नियमों का लिपीकरण ही बतायेगा कि ऐसी छूट से किस हद तक केन्द्रीकरण होगा और किस हद तक राजकीय संरक्षण को प्रोत्साहन मिलेगा। आखिर तफसील में ही तो बहुत सारी बातें घुसा दी जाती हैं। निर्दिष्ट व्यापार क्षेत्रों के अंदर ई-व्यापार की अनुमति दी गई है। बिहार के मामले में हमने देखा कि जब APMC को खत्म कर दिया जाता है तो क्या होता है। यह भी प्रचार किया जा रहा है कि बिचैलिए खत्म कर दिए जायेंगे। छोटे उत्पादकों को बिचैलिओं पर निर्भर रहना पड़ता है। यहां तक कि बाजार तक अपने माल को लाने के काम कोे करने में भी वे अक्षम ही रहते हैं। इस कानून के तहत विवाद निवारण भ्रष्ट, जनविरोध्ी नौकरशाही द्वारा ही किया जायेगा और वह तीन स्तरों पर होगा जो कलक्टर के स्तर तक ही निपट लिया जायेगा।

संसद से पारित दूसरा कानून है ‘कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण), कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार अधिनियम, 2020’। इसे ठेका खेती को प्रोत्साहन देने वाले कानून के रूप में जाना जाता है। इस कानून के तहत किसी भी तरह के कृषि उत्पाद के उत्पादन या पालन-पोषण के पूर्व समझौते किए जाएंगे जिसे अंततः स्पांसर (ठेका देने वाला) द्वारा खरीदा जाएगा। यह उत्पादक और स्पांसर के बीच होने वाले समझौते को औपचारिक व विधिवत बनाता है। स्पांसर लगभग कोई भी हो सकता है। इस कानून में ‘एग्रीगेटर्स’ के लिए भी जगह है। यह भारी भरकम शब्दावली जिसे उबर, ज़ोमाटो व अर्बन कम्पनी जैसी टैक्सी व सेवा जैसी आई॰टी॰ आधारित सेवाओं से ली गई है वास्तव में बदनाम हुए बिचैलिए ही हैं। इनको भी जगह दी गई है तथा किसान और स्पाॅन्सर दोनों के साथ उनके सम्बंधों को औपचारिक रूप दिया जाएगा। कानून समझौतों या करारों के इलेक्ट्राॅनिक पंजीकरण की भी व्यवस्था करता है। करार में आपूर्ति, दाम, गुणवत्ता और उत्पाद के मानदण्ड आपस में तय की गईं शर्तों में शामिल ‘रह’ सकते हैं। करार में ऐसे प्रावधान और शर्त ‘रह सकते’ हैं जो कृषि उत्पाद के उत्पादन काल के दौरान या उसे हस्तांतरित करने के समय उसके पर्यवेक्षण और प्रमाणन की व्यवस्था करते हैं। किसान और स्पाॅन्सर के लिए ऋण की जारी व्यवस्था के लिए या फिर जोखिम के प्रबंधन के लिए दोनों करारों को केन्द्र और राज्य सरकार के स्कीम के साथ या वित्तीय सेवा प्रबंधन करने वालों के साथ जोड़ने की व्यवस्था की जा सकती है। एक खास प्रावधान जिसे किसानों के लिए महत्त्वपूर्ण सुरक्षात्मक उपायवाला बताया जा रहा है वह यह है कि स्पाॅन्सर किसानों की जमीन का न तो मालिकाना हक ले सकते हैं और न ही वे इस जमीन पर स्थायी किस्म के बदलाव ला सकते हैं। इस प्रावधन को बहुत गम्भीरता से लेने की जरूरत नहीं है। आखिर खेत का मालिकाना औपचारिक रूप से किसान के पास रहने के बावजूद वह एक मुहावरा बन जा सकता है, वास्तविकता नहीं एक कानूनी छलावा (juridical fiction) रह जा सकता है। वास्तविक नियंत्रण तो बड़ी पूंजी के हाथों ही होगा और पूंजीवाद के अंतर्गत केवल बड़ा भागीदार ही अपनी शर्तें लाद सकता है। हम देख सकते हैं कि कानून के इस प्रावधान को भाजपा की प्रचार-फौज बहुत ज्यादा फोकस करती है। वास्तव में लागत सामग्री से लेकर उत्पादन तक तो हर चीज या तो स्पांसर के हाथों में होता है या वह उसकी देख-रेख में होता है। स्पांसर के साथ किसानों का अनुभव आज भी ऐसा ही है। सच्चाई तो यह है कि जिसकी भी चलती रहती है वही वास्तविक मालिक होता है, कानून का खास मायने यहां नहीं है। इतिहास में ऐसा ही होता आया है। जैसा कि हमने बताया है कॉर्पोरेट के नियंत्रण द्वारा खेती या ठेका या अनुबंध खेती को व्यवहार में लाने का यह राजनीतिक रूप से कम विस्फोटक तरीका माना गया है और असल में इसकी शुरूआत काॅरपोरेट खेती के लिए एक अंतरवर्ती स्तर माना गया है।

इस कानून के अंतर्गत किए जाने वाले करार पर कृषि उत्पाद की खरीद-बिक्री के निमयन के लिए बने राज्य के कानून लागू नहीं होंगे। आवश्यक वस्तुएं अधिनियम, 1955 के प्रावधनों से भी वे मुक्त होंगे और भण्डारण पर कोई सीमा नहीं होगी। करार में ही दाम दिए हुए होंगे जिसमें किसी तरह के बोनस या प्रीमियम के अलावा एक गारण्टीशुदा दाम का जिक्र रहेगा। वे उपयुक्त मानक दामों से जुड़े होगे। ‘दाम तय करने’ के तरीकों का जिक्र करार में किया जाएगा। फिर यह वह चीज है जो मनमानी के लिए जगह छोड़ता है और बड़ी पार्टी (स्पांसर) इसका पफायदा उठा सकता है और चतुर वकीलों का इस्तेमाल कर करारों का मसौदा तैयार करवा सकता है जिसमें कोई झोल हो। ठेका खेती कानून के तहत जो विवाद निवारण प्रक्रिया का प्रावधान है वह भी किसानों को भ्रष्ट व जनविरोधी नौकरशाही के हवाले कर देता है जिससे स्पांसर (कॉर्पोरेट) आसानी से निपट सकते हैं। इसके तहत एक समाधान करने वाले बोर्ड की व्यवस्था की गई है और यदि वहां पर निपटारा नहीं हो पाया तो अफसरशाही के यहां अपील की जा सकती है (उप जिलाधिकारी और फिर समाहर्ता या उप-समाहर्ता)। ये जो आदेश पारित करेंगे वह अंतिम होगा और बाध्यकारी होगा। (यानी न्यायालय का रास्ता बंद)

आवश्यक वस्तुएं अधिनियम, 1955 को संशोधित किया गया है और वह खास खाद्य पदार्थों की आपूर्ति के लिए केन्द्र सरकार द्वारा नियमन की अनुमति केवल असामान्य परिस्थितियों (जैसे युद्ध, अकाल, असाधरण दाम वृद्धि और ‘गम्भीर प्रकृति की प्राकृतिक आपदा’) में ही देता है। जबरदस्त दाम वृद्धि के मामलों में भंडारण की सीमा बांधी जा सकती है। बागवानी (horticulture) के उत्पादों के खुदरा दामों में 100 प्रतिशत की वृद्धि होने पर और अन्य कृषि खाद्य पदार्थों के खुदरा दामों में 50 प्रतिशत की वृद्धि के मामलों में ही सरकार कार्रवाई कर सकती है। इसीलिए इसे “कृषि व्यवसाय द्वारा खाद्य भंडारण की स्वतंत्रता के लिए कानून” कहा गया है। इसकी आशंका है कि इससे जमाखोरी होगी और दाम बढ़ेंगे। वायदा बाजारों (futures) में कृषि व्यवसाय के लिए जगह लेने के लिए भी इस छूट को जरूरी माना गया है।

‘कृषि क्षेत्र का 1991’

इससे ज्यादा और कुछ भ्रामक नहीं हो सकता कि हम इसे किसानों की बहुसंख्या यानी मेहनतकश किसानों के लिए “कृषि क्षेत्र के लिए 1991” मानें। ऐसा करने का मतलब यह मान लेना है कि किसान औद्योगिक किस्म के उद्यमी हैं जबकि किसान बिना साधन का माल उत्पादक बन जाता है क्योंकि उसके पास पूंजी का अभाव होता है। किसी भी पूंजीवादी देश में उसका हाल  सांप छछूंदर की गति वाला होता है और उसे “बाजार के साथ ताल मिला कर चलना पड़ता है” जबकि इसके लिए उसके पास साधन नहीं होते हैं। हम देख सकते हैं कि वह स्वतंत्रता नहीं होती बल्कि उसके पास के विकल्प पूरी तरह से बड़ी पूंजी द्वारा निर्धारित होते हैं, कृषि व्यवसाय के दैत्यों द्वारा निर्धारित होते हैं। दाम की उत्प्रेरणा से किसान उन विकल्पों के प्रति संवेदनशील बनता है और इसका मतलब है कि वह अपने आप को बाजार के अंधे (हम जोड़ दे सकते हैं कि आज की परिस्थिति बहुत ही सट्टेबाजाना- speculative नियमों के हवाले कर देता है। इस बाजार में दामों का भयानक उतार-चढ़ाव होता है जैसा कि उपरोक्त न्छब्ज्।क् रिपोर्ट सामने लाती है। किसानों का एक छोटा सा तबका – धनी किसान ही इससे लाभान्वित होने की सोच सकते हैं और पूंजी की ज्यादा खेप होने के चलते दाम वसूली के उतार-चढ़ावों से पार पा सकते हैं और हर तरह के ऋण व विपणन प्रक्रिया को अपने लाभ में इस्तेमाल करने की सोच भी सकते हैं। छोटे और सीमांत किसानों के लिए तो यह “कर्ज की खेती” ही है और वे तो अच्छे समयों में भी मुश्किल से चल पाते हैं, संकट काल की बात तो छोड़ दी जाए कार्ल काउत्स्की ने अपनी पुस्तक ‘कृषि प्रश्न’ (Die agrarfage) में पूंजीवाद के अंतर्गत इस पर विस्तार से लिखा है)। “सही” बाजारों या दामों पर पहुंचने जैसी कोई चीज नहीं है। जो काम एम॰एस॰पी॰ नहीं कर सका वह अपने “चुनिंदा” खरीदार को बेचने की किसान की “स्वतंत्रता” भी नहीं कर सकती। बाजार के छोटे खिलाड़ियों के पास “चुनाव” करने का विकल्प नहीं होता। उपरोक्त कानूनों को एक देश, एक बाजार के नाम पर महिमामंडित किया गया है। इसका मतलब और ज्यादा केन्द्रीकरण होगा। हम समझ सकते हैं कि जब राज्य सरकारों की ही नहीं चलेगी तब मेहनतकश किसानों का कैसे चल सकता है। अखिल भारतीय बाजार का मतलब होगा कि ज्यादा सट्टेबाजी के दांव के लिए खरीद होगी और केन्द्रीकरण होगा जिससे सबसे अच्छे उत्पाद महानगरीय केन्द्रों में चले जायेंगे और उन्हें प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ बनाने के लिए तथा निर्यात के लिए इस्तेमाल किया जायेगा (मूल्य संवृद्धि की बात याद रखी जाये)। इससे शहर और देहात के बीच का अंतरविरोध और बढ़ेगा।

तो अभीष्ट लाभार्थी आखिर कौन हैं? ये हैं कृषि-व्यवसाय की दैत्याकार कम्पनियां। जो नाम हमारे दिमाग में आते हैं वे हैं, उदाहरण के लिए, मोनसेंटो, लुई ड्रेफस, कारगिल, अदानी विलमार, रिलायंस रिटेल और पेप्सीको जैसी खाद्य प्रसंस्करण कम्पनियां, आदि। ये भारतीय तथा विदेशी कम्पनियां इन बदलावों के पीछे हैं। हम जानते हैं कि बौद्धिक सम्पदा अधिकारों (intellectual property rights) वाली व्यवस्था तथा विश्व व्यापार संगठन के ‘कृषि पर समझौता” को अंतर्राष्ट्रीय पूंजी ने आगे बढ़ाया। चलिए, हम देखते हैं कि किस तरह से कृषि के अंतर्राष्ट्रीय बाजार इन दैत्याकार बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा नियंत्रित हैं। कृषि क्षेत्र में जो हद दर्जे का इजारेदाराना नियंत्रण है वह प्रत्यक्ष उत्पादकों के खिलाफ काम करता है। हम कृषि मशीनरी से शुरू करें। यह जानी मानी बात है कि यूरोपीय और उत्तर अमेरिकी बाजार अब संतृप्त हो गये हैं। मशीनरी उत्पादक सबसे बड़ी कम्पनियां, जैसे – डीयर एण्ड कम्पनी, फियट और एगको जिनका बाजार पर वर्चस्व है (बाजार के 50 प्रतिशत हिस्से से ज्यादा पर उनका वर्चस्व है) उन्हें अब नए उभरते बाजारों की ओर देखना पड़ेगा। वे यूरोप व अमेरिका की कृषि में इस मंदी से प्रभावित हुए हैं और अब उन्हें चढ़ती वाले भारतीय और चीनी बाजारों की ओर रूख करना है। भारत सरकार का आर्थिक सर्वेक्षण (2019-20) कृषि मशीनीकरण के मुद्दे को हाथ में लेने की बात करता है। वह आधुनिकतम कृषि मशीनरी को बढ़ावा देने के लिए एक बड़े आकार के अभियान की बात करता है। इसी के साथ वह इस बात को चिन्हित करता है कि अन्य कारकों के साथ छोटी जोतों की उपस्थिति यहां की कृषि में मशीनीकरण की धीमी गति के लिए जिम्मेवार है। वह इस बात का जिक्र करता है कि “भारत में खेती का मशीनीकरण (40-45 प्रतिशत) दूसरे देशों, मसलन – संयुक्त राज्य अमेरिका (95 प्रतिशत), ब्राज़ील (75 प्रतिशत) और चीन (57 प्रतिशजत) की तुलना में कम है। यह तथ्य कि भारत में कृषि का मशीनीकरण कम है और इससे उत्पादकता भी प्रभावित होती है हमारे नीति निर्माताओं के लिए एक समस्या है। कहने की जरूरत नहीं कि छोटी किसानी इसके मार्ग में बड़ी बाधा है। यह आर्थिक सर्वेक्षण “जमीन के बाजार को उन्मुक्त” करने की भी बात करता है।

यदि हम कृषि रसायनों और बीज के व्यवसाय को देखें तो हम पाते हैं कि मोनसेंटो, ड्यूपोण्ट, केम चायना और बेयर की वर्चस्वकारी स्थिति है। इनके पास 60 प्रतिशत से ज्यादा बाजार है। विश्व व्यापार संगठन द्वारा लाई गई बौद्धिक सम्पदा अधिकार व्यवस्था ने बीज आपूर्ति करने वाली कम्पनियों को बहुत फायदा पहुंचाया है। कृषि व्यवसाय की इजारेदाराना कम्पनियां थ्।व् व वल्र्ड बैंक जैसे विश्व (साम्राज्यवादी) संस्थानों तथा सरकारों के साथ मिलकर काम करते हुए ऐसी नीतियों का निर्माण करती हैं जो उनके हक में होती हैं। उनका रसूख बहुत ज्यादा है और वे ही इस बात को निर्धारित करती हैं कि विश्व में किस तरह की कृषि व्यवस्था चलेगी। जहां तक कृषि मालों में व्यापार का सवाल है तो 4 दैत्याकार कम्पनियों का विश्व बाजार के 70 प्रतिशत पर नियंत्रण है। ये हैं एडीएम, कारगिल, लुई ड्रेपफस और बंज जिसे । ABCD ग्रुप कहा जाता है। एक नया प्रतिद्वंद्वी चीन का कोफको है। भारतीय बाजार में भी इनकी उपस्थिति है जो कि उपरोक्त कानूनों के कार्यान्वित होने के बाद बढ़ जाने वाली है।

भारत में अवस्थित ICRIER जो कृषि बाजारों आदि पर शोध करता है, में इन शोधों पर ‘बिल एण्ड मेलिंडा गेट्स फाउन्डेशन’ पैसे खर्च कर रहा है। हमें यह जान लेना चाहिए कि कृषि से मिलने वाले लाभ के महाभोज में आई॰टी॰ उद्योग भी भागीदारी चाहता है। कृषि क्षेत्र के उत्पादन से लेकर खुदरा व्यापार, बिग डेटा और इंटेलीजेन्ट मशीन तक माइक्रोसोफ्रट, अमेज़न आदि के लिए बड़े बाजार का निर्माण करते हंै। बिग डेटा का मतलब प्रभावकारी नियंत्रण भी होता हैै। आखिर जैसा कि कहा जाता है ‘डेटा आज का खनिज तेल है’। स्मार्ट खेती आज की आधुनिकतम रुझान है। इस तरह से हम देख सकते हैं कि इजारेदारियों का यह समूह ही उपरोक्त कृषि बदलावों से लाभान्वित होने वाला है और ये इनके द्वारा वित्तपोषित थिंक टैंक द्वारा दिए गए बहुतेरे नीतिगत सुझावों से प्रेरित हैं। उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के साथ ही इन कानूनों का पारित होना वास्तव में कॉर्पोरेट के लिए “कृषि क्षेत्र का 1991” है।

गांवों को कॉर्पोरेट मगरमच्छों के हाथों सौंपा जाना

यह दिलचस्प है कि भारतीय क्रांतिकारियों का एक हिस्सा किसानों के नाम पर धनी किसानों के आंदोलनों से कैसे अपने को जोड़ लिया करते हैं। फिर भी क्रांति के स्तर की उनकी समझदारी जिसे वे जनवादी (लोक जनवाद, नव जनवाद) स्तर का मानते हैं, को देखते हुए यह एक हद तक तर्कसंगत माना जा सकता है। काल्पनिक दुनिया में उनके फंसे हुए रहने के बावजूद यह कहा जा सकता है कि उनकी यह अवस्थिति इसके अनुरूप ही है। फिर भी हमें इनके द्वारा किये जाने वाले भारत के अर्ध-सामंती चित्रांकण और धनी किसानों द्वारा उठाए जाने वाले मांगों के विशुद्ध पूंजीवादी चरित्र के बीच की द्विविधता पर ध्यान देने की जरूरत है। इससे भी ज्यादा दिलचस्प तो उनकी अवस्थिति लगती है जो भारत को प्रधानतः पूंजीवादी मानते हैं और समाजवादी क्रांति की बात तो करते हैं परंतु गांवों के कारपोरेटों द्वारा हस्तगतकरण पर खुशी से झूम कर ताली बजाते हुए प्रतीत होते हैं! उनके द्वारा पूंजीवाद का संज्ञान लेने से लेकर उसकी पैरोकारी तक फिसलते हुए देखने की प्रक्रिया भी काफी रोचक है। हम देखते हैं कि इस प्रसंग को वे वर्ग-संघर्ष के परिप्रेक्ष्य में नहीं देखते हैं और न ही मेहनतकशों के हालातों को बदतर बनाने वाले उन कानूनों की भूमिका को देख पाते हैं। आखिर इन मेहनतकशों को हमें लिखनी और करनी दोनों में मजदूर वर्गीय क्रांति की मित्र शक्ति के रूप में देखना चाहिए। इसीलिए हमने कहा कि पूरे मामले में राजनीति महत्वपूर्ण है। किसानों का प्रश्न या कृषि प्रश्न वास्तव में एक राजनीतिक प्र्रश्न है। और यह कि प्रस्तावित कानूनों की प्रकृति ऐसी है कि वे मेहनतकश किसानों को बड़ी पूंजी के हवाले कर देंगे, इस बात का हमें सिरे से विरोध करना चाहिए। हमने दिखाया है कि इन कानूनों का निहितार्थ कॉर्पोरेट द्वारा गांवों को लूटना ही है। इस हेतु की खातिर कई बदलाव लाए जा रहे थे। जो बदलाव अभी तक हुए हैं उनकी गति से संतुष्ट न होकर इस प्रक्रिया को त्वरित करने के लिए तीनों कानूनों को पारित किया गया है। यह हमारा फर्ज बनता है कि हम गांवों में अपने प्रचार और आंदोलन को बढ़ा दें और मेहनतकश किसानों को इन कानूनों का निहितार्थ बतायें। फासीवादी प्रचारतंत्र ने आखिर अपना दुष्प्रचार जारी कर ही दिया है कि इन कानूनों के चलते “किसानों की स्वतंत्रता” वाला एक नया भारत बनेगा। हमें बताना पड़ेगा कि अंततोगत्वा उनका सम्पत्तिहरण होगा, उनकी जमीन कॉर्पोरेट और धनी किसानों को चली जायेगी। जबकि मेहनतकश किसानों से इस बात को स्पष्ट तौर पर कहना हमारा फर्ज है कि पूंजीवाद के अंतर्गत उनके लिए कोई राहत नहीं है और गांवों से उजड़ना उनकी नियति है फिर भी यह हमारा काम कतई नहीं है कि हम इस प्रक्रिया को त्वरित करने में मदद करें बल्कि हमें तो मेहनतकश किसानों को पूंजी के खिलाफ संघर्ष में गोलबंद करना चाहिए। हमें उन्हें बताना पड़ेगा कि यह प्रक्रिया तीनों कानूनों के साथ खत्म नहीं हो जाने वाली है बल्कि वह और आगे जायेगी। लम्बे समय से “भूसम्पत्ति के बाजार” को उनमुक्त कर देने की बात चल रही है और 2019-20 का आर्थिक सर्वेक्षण इस बात को फिर से रेखांकित करता है जैसा कि हमने ऊपर देखा। इसके साथ ही यह दस्तावेज “श्रम के पुर्नाबंटन” की बात करता है। इस तरह से प्रतिक्रांति की राजनीतिक शक्ति को देखते हुए नए भूमि संबंधी कानून बनाए जायेंगे और अंततोगत्वा हमें भूसम्पत्ति के बाजार की “स्वतंत्रता” का सामना करना पड़ेगा। यह गांवों को काॅरपोरेट मगरमच्छों के हवाले कर देना ही है।

हम जो इस बात को इतने जोरदार ढंग से कहते हैं कि पूंजीवाद के अंतर्गत मेहनतकश किसानों का कोई भविष्य नहीं है और उनकी नियति अंततोगत्वा सर्वहाराकरण ही है और इस बात को एक आर्थिक तथ्य के रूप में देखते हैं तो फिर जमीनी हकीकत के रूप में इस आर्थिक तथ्य के खिलाफ आखिर हम संघर्ष करने की क्यों सोचते हैं? हम पूंजीवाद के आर्थिक नियमों को कैसे देखते हैं? देखा जाये कि लेनिन इस बाबत क्या कहते हैं —   

“वस्तुपरकवादी किसी देय ऐतिहासिक प्रक्रिया की अवश्यसम्भाविता की बात करते हैं। भौतिकवादी देय सामाजिक-आर्थिक संरचना का सटीक चित्र पेश करते हैं और उन अंतर्विरोधी संबंधों की बात करते हैं जो इससे उभर कर आते हैं। किसी देय तथ्यों की श्रृंखला की अपरिहार्यता को दिखाते हुए, वस्तुपरकवादी के साथ हमेशा यह खतरा रहता है कि वह इन तथ्यों की पैरोकारी करने लगेः भौतिकवादी वर्ग अंतर्विरोधों का खुलासा करता है और ऐसा कर वह अपना अवस्थान स्पष्ट करता है। वस्तुपरकवादी “अलंघ्य ऐतिहासिक प्रवृत्तियों” की बात करता है, भौतिकवादी उस वर्ग की बात करता है जो देय आर्थिक व्यवस्था को ‘निर्देशित’ करता है, जिससे दूसरे वर्गों द्वारा प्रतिकार का फलां-फलां रूप सामने आता है। इस तरह, एक तरफ, भौतिकवादी वस्तुपरकवादी से ज्यादा सुसंगत है, और अपनी वस्तुनिष्ठता का ज्यादा गम्भीर एवं सुस्पष्ट अभिव्यक्ति देता है। वह किसी प्रक्रिया की अपरिहार्यता की बात करने तक अपने को सीमित नहीं कर देता बल्कि इस बात की शिनाख्त करता है कि वास्तव में वह कौन सा वर्ग है जो इस अपरिहार्यता को निर्धरित करता है। उदाहरण स्वरूप, इस मामले में भौतिकवादी अपने को “अलंघ्य ऐतिहासिक प्रवृत्तियों” तक ही सीमित नहीं रखता बल्कि वह कतिपय वर्गों के अस्तित्व की बात करता है जो किसी देय व्यवस्था की अंतर्वस्तु को निर्धारित करता है और वह स्वयं उत्पादकों द्वारा कार्यवाही के बिना किसी तरह के समाधान की सम्भावना से इंकार करता है। दूसरी ओर, एक प्रकार से कहा जाए तो भौतिकवाद के तहत पक्षधरता शामिल रहता है और किसी घटना के मूल्यांकन में खास सामाजिक तबके के दृष्टिकोण को प्रत्यक्ष और खुले रूप से अपनाये जाने को लाजिमी बनाता है।” (लेनिन,The Economic Content of Narodism, CW 1, pp. 400-01; अनुवाद हमारा है)

आज की देय स्थिति में पूंजीवादी व्यवस्था के तहत लूट एवं विनाश की अपरिहार्यता के बारे में पैरोकारी तक हम नहीं गिर जाना चाहते हैं तो हमें भुक्तभोगी वर्गों द्वारा प्रतिकारक व्यवहार की बात करनी होगी, यानी व्यापक मेहनतकश किसानों की बात करनी होगी, जो सर्वहारा क्रांति की मित्र शक्ति हैं।

जो कानून बनाये गए हैं वे कहने की जरूरत नहीं कि कुछ समय के अंतराल में ही अपना प्रभाव दिखाएंगे और इसीलिए जो उनके तात्कालिक प्रभाव में नहीं आये हैं वे इस बात की ओर सचेत नहीं हुए हैं कि कैसा विनाश उनके सामने आ खड़ा होने वाला है (याद रहे यह नवम्बर-दिसम्बर, 2020 में ही लिखा गया लेख है)। जहां तक एम॰एस॰पी॰ (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर आंदोलन की बात है हम पाठक को याद दिलाना चाहेंगे कि वह दाम ही है जो कृषि उत्पादकों के लिए उत्प्रेरक का काम करता है और दामों के संकेत के हिसाब से वे काम करते हैं। यह किसानों के मालिक होने के चरित्र में निहित है, एक माल उत्पादक होने के चरित्र में निहित है कि किसान दामों के प्रति संवेदनशील होते हैं और दामों के आकर्षण के वशीभूत होते हैं। एम॰एस॰पी॰ को लेकर जो आशंकाएं हैं वे बेवजह नहीं हैं और हम यह भी जानते हैं कि माल उत्पादक होने के नाते जो धनी किसानों के साथ बाकी किसान जनता की एक समानता बनती है उसके चलते धनी किसान अपने हितों को पूरी किसान आबादी के हितों के रूप में पेश कर पाता है। मंडियों (APMC) के बाइपास करने की नीति व निजी खिलाड़ियों की बढ़त को लेकर यह प्रतिक्रिया ही है जो किसान एम॰एस॰पी॰ को खत्म करने के आसार के प्रति सजग दिखते हैं। आखिर उत्पादन और उत्पादकता वृद्धि हेतु दाम उत्प्रेरक (price incentive) के रूप में एम॰एस॰पी॰ की ऐतिहासिक भूमिका खत्म हो गई है। यह ठान लेना कि हम इन कानूनों का इसलिए विरोध न करें क्योंकि हम किसानों के “लाभकारी” मूल्यों के पक्ष में नहीं हैं, इसलिए कि आबादी की बहुसंख्या उजरती मजदूर हैं और यह कि किसान जनता भी कुल मिलाकर उपभोक्ता ही हैं जंगल की जगह पेड़ों को देखने के बराबर होगा। ये कानून कृषि व्यवसाय के दैत्यों के लिए दरवाजे खोल देंगे जिससे सट्टेबाजीपूर्ण दौर चलेंगे जो दामों के बढ़ जाने पर उपभोक्ता जनसमुदाय के लिए और जब दाम कम होंगे तो प्रत्यक्ष उत्पादकों के लिए विपत्ति लायेंगे विशेषकर मेहनतकश किसान जनसमुदाय के ऊपर कहर बरपायेंगे।

एफ॰सी॰आई॰ (खाद्य निगम) और दूसरे प्रांतीय संस्थानों द्वारा खरीदारी को हम कैसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली की व्यवस्था से अलग करके देख सकते हैं। हम जानते हैं कि सरकार का यह लक्ष्य है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली को खत्म कर दिया जाये और इसे नकदी भुगतान (डी॰बी॰टी॰) में बदल दिया जाए जिसके लिए जन धन खाता (सभी के लिए बैंक खाता) जैसे संस्थागत इंतजाम पहले से ही कर दिए गए हैं। हां, अवश्य ही इसने आबादी के बीच आक्रोश को जन्म नहीं दिया इसलिए कि यह खतरा के रूप में स्पष्टरूप से उनके सामने आया नहीं है। एक-एक करके किया हुआ काम प्रक्रिया की भयंकरता को कम करने का काम करते हैं। हम जानते हैं कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली को विघटित करने की ओर एक कदम तब ले लिया गया था जब इसे लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (Targeted PDS) में बदल दिया गया था। इस प्रक्रिया में कई जरूरतमंद परिवारों को इससे अलग कर दिया गया था। ये बदलाव हो चुके थे जब बड़ी पूंजी के मन की करने के लिए बड़ी इच्छाशक्ति के साथ भाजपा सत्ता में आई और उसने 2015 में शांता कुमार कमिटी का गठन किया जैसा कि हम ऊपर कह चुके हैं। कमिटी की रिपोर्ट ने इस बात को जोर देकर कहा कि केवल 6 प्रतिशत किसान ही एम॰एस॰पी॰ की व्यवस्था से लाभांवित हुए हैं। इसके कहने के पीछे यह बात भी थी कि यदि इसे खत्म भी कर दिया जाए तो कोई खास बात नहीं होगी। हम यहां एक टिप्पणी करना चाहेंगे कि इससे यह भी पता चलता है कि पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत कथित सुरक्षात्मक उपाय (इस मामले में एम॰एस॰पी॰) भी किसानों के अपेक्षाकृत अच्छी स्थिति वाले तबके ही इस्तेमाल कर पाते हैं। फिर भी एम॰एस॰पी॰ एक बेंचमार्क दाम का काम करती रही है और उसके परिणाम दूरगामी रहे हैं, इतना कि उससे खेती बारी के तौर तरीके बदल गए और कुछ खास किस्म के फसलों की एकलप्रणाली बन गई और इस प्रक्रिया ने किसानों के हर तबके को अपनी भंवर में खींच लिया। हम यहां ध्यान दिलाना चाहते हैं कि इस कमिटी की सिफारिशें OECD (धनी देशों का ग्रूप) और ICRIER के अध्ययन की सिफारिशों से मेल खाती हैं। (OECD Food and Agricultural Reviews – Agricultural Policies in India; 2018)

हमने देखा कि सरकार का लक्ष्य है कि कृषि को कारपोरेटों को दे दिया जाए। अतः हमारे विश्षेलण सम्पूर्ण चित्र को छोड़कर केवल वर्तमान कानूनों तक ही कैसे सीमित रह सकते हैं? भाजपा सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्यों का क्या करती है वह पूरी तरह से राजनीतिक उपयुक्तता और उसके राजनीतिक प्रबंधन पर निर्भर करता है। एक तरीका जो सुझाया गया है वह है उत्पादन से विछिन्न आय समर्थन। इसे एम॰एस॰पी॰ खत्म करने के एक सस्ते तरीके के रूप में सुझाया गया है। वह एक तरह से किसानों को खेती से निकालने की कीमत चुकाने वाली (buying out) बात है। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वर्तमान सरकार अपने को कितनी शक्तिशाली पाती है या फिर हो सकता है कि वह अपने सामाजिक आधार को सशक्त करने के लिए 6 प्रतिशत के लिए एम॰एस॰पी॰ बनाए रखे। आखिर पिछले महाराष्ट्र चुनाव के पहले राज्य की भाजपानीत सरकार ने कृषि उत्पाद के व्यापार में कानूनी बदलाव का अनुमोदन किया था जिसके तहत प्रावधान था कि कोई व्यापारी यदि सरकार के एम॰एस॰पी॰ से कम दर पर खरीदता है तो उसपर 50000 रुपए का जुर्माना लगेगा और उसे इसके लिए एक साल के कारावास की सजा भी दी जा सकती है। चीजें कैसा मोड़ लेंगी यह कहना अभी मुश्किल है और इसमें राजनीति की अहम भूमिका है। हमें फिर यह भी कहना पड़ेगा कि एम॰एस॰पी॰ का सवाल केवल ‘लाभकारी’ मूल्यों का सवाल नहीं है। उन पर हो रहा प्रहार इसलिए भी है कि सरकार को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए सरकारी व्यवस्था और खरीदारी खत्म करनी है जिससे कामगार जनता प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होगी।

ऐसे में हम पूरे प्रकरण की राजनीति के प्रति कैसे अंधा रह सकते हैं? क्रांतिकारी मेहनतकश किसानों को अपने मित्र वर्ग के रूप में देखते हैं। इस मध्यवर्ती वर्ग वाले किसी भी समाज में किसानों का प्रश्न एक महत्वपूर्ण प्रश्न रहा है। मेहनतकश के इस तबके पर क्या पूंजीपति वर्ग का प्रभाव रहेगा या फिर क्या सर्वहारा इसे अपने पक्ष में कर लेगा यह बात क्रांतिकारी माक्र्सवादियों की नीतियों पर निर्भर करती है। हम जानते हैं कि एक मेहनतकश होने के नाते किसानों का सर्वहारा वर्ग से लगाव होता है और एक मालिक व उत्पाद के विक्रेता होने के नाते उसका लगाव पूंजीपति वर्ग से होता है और इस तरह यह वर्ग दोनों वर्गों की नीतियों के प्रभाव में आसानी से आ सकता है। यहां तक कि साम्राज्यवादी शक्तियों ने भी कुशल चालबाजी से इन्हें अपने पक्ष में कर लिया है। जापान में संयुक्त राज्य अमेरिका की दखलकारी सेना के जनरल मैकआर्थर ने ‘जमीन जोतने वालों को’ के सिद्धांत पर किसानों में जमीन का पुनर्वितरण कर दिया ताकि जापानी सैन्यवाद जिसका सामाजिक आधार जमींदार थे उसकी कमर तोड़ दी जा सके। ऐसे कई दृष्टांत इतिहास में मिलेंगे। हम इसके प्रति कैसे अंधा रह सकते हैं? कोई भी क्रांतिकारी प्रस्तुतीकरण पूंजीवादी व्यवस्था की प्रक्रिया का इस तरह का युक्तिकरण करते हुए यह नहीं बांच दे सकता है कि पूंजीवाद का यह तो नियम ही है कि किसान उजड़ जायेंगे और उनका सम्पत्तिहरण हो जायेगा। हां, यह नियम तो है परंतु पूंजीवादी समाज के किसी भी नियम की तरह इस पर प्रतिकारक भी काम करते हैं। कृषि प्रश्न क्रांतिकारी प्रस्तुतीकरण की मांग करता है। सवाल तो यह है कि पहले चक्र में क्रांति की तो हार हुई और जमींदारों और कृषक बुर्जआ के पक्ष में बुर्जुआ-जमींदार भूमि सुधार हुए। हरित क्रांति ने माल-मुद्रा संबंधों का सार्विकीकरण किया और देहात में पूंजीवादी शासन को बल प्रदान किया। अब हम दूसरे चरण में हैं, समाजवादी क्रांति के काल में हैं जब सर्वहारा के नेतृत्व में किसानों की बहुसंख्या गरीब किसान और सर्वहारा को सत्ता लेनी है। इस काल में जब पूंजीवादी उत्पादन संबंधों की प्रधानता हो गई है, बड़ी पूंजी आती है और चाहती है कि एक तरह से ‘जागीरों की सफाई’ हो पाये, यानी वह गांवों को अपने दखल में लेना चाहती है। बड़ी पूंजी गांवों में लूट मचाना चाहती है और श्रम को उद्योग के क्षेत्र में पुर्नाबंटित करना चाहती है। वह एक वृहत आकार की आरक्षित श्रम वाहिनी का निर्माण करना चाहती है ताकि सस्ते श्रम का एक विपुल भंडार रहे जिसका शोषण कर इन पूंजीपतियों के सपने पूरे हों। हम क्या करें? क्या हम सर्वहारा के नाम पर किनारे खड़े हो जायें और कहें कि इससे मजदूर वर्ग का कोई लेना-देना नहीं क्योंकि वह तो प्रभावित नहीं हो रहा है? आखिर छोटी जोत वाले उजड़नेवाले हैं! यह तो कहीं से भी क्रांतिकारी राजनीति नहीं है। हमें कॉर्पोरेट लूट के लिए गांवों को इनके हाथों में कर देने का तीखा विरोध करना चाहिए। लेनिन ने हमें क्रांतिकारी सर्वहारा राजनीति के बारे में क्या शिक्षा दी थी? क्या उन्होंने यही कहा था कि यह मसला केवल दो वर्गों के बीच के संबंध का ही है– श्रम को नियोजित करने वालों के रूप में पूंजीपति और अपनी श्रम शक्ति को बेचने वाले मजदूर और बाकी किसी चीज से हमें मतलब नहीं है? क्या हमें ठेका खेती द्वारा लाये जाने वाले विध्वंस के प्रति उदासीन रहना चाहिए क्योंकि हम सोचते हैं कि उजरती श्रम की हमारी परिस्थितियों पर कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा? लेनिन ने कहा था — “सामाजिक-जनवाद मजदूर वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है केवल मालिकों के किसी एक दल विशेष के साथ उसके संबंध में ही नहीं, बल्कि आधुनिक समाज के सभी वर्गों के साथ और एक संगठित राजनीतिक शक्ति के रूप में राजसत्ता के साथ उसके संबंध के मामले में भी।” (क्या करें, अध्याय -3) ऐसा कहना कि मजदूर वर्ग को बहुत कुछ खोना नहीं है क्योंकि इन तीनों कानूनों से उसकी जीवन परिस्थितियां बहुत कुछ प्रभावित नहीं होने वाली है हास्यास्पद होने की हद तक अर्थवादी प्रस्तुतीकरण होगा। यहां राजनीतिक समझ की जरूरत है। पूंजीपति वर्ग किसानों के साथ राजनीतिक रूप से अपने वर्ग संबंधों का प्रबंधन कर अपने वर्ग हितों को परिचालित करता है। एम॰एस॰पी॰, कर्जमाफी, आयात शुल्क में वृद्धि सभी का संकटकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए इस्तेमाल अल्पकालिक उपायों के रूप में होता रहा है जबकि दीर्घकालीन नीतियां बड़ी पूंजी के अधिकाधिक प्रवेश के लिए लाई जाती रही हैं। जरूरत पड़ने पर नव-उदारतावादी अवस्थिति भी उसे ऐसे उपायों के कार्यान्वयन से नहीं रोकता है जैसा कि एम॰एस॰पी॰ के मामले में हमने देखा है। जो भी गांवों में हो रहे बदलावों की दिशा को नक्शे पर उतारेगा वह कहेगा कि लम्बे समय में तो यहां बस कॉर्पोरेट ही कॉर्पोरेट दिखेंगे। पूंजीपति वर्ग दामों को आधार बना रहा है और फिर व्यावसायिक पूंजी द्वारा शोषण का बहाना ले रहा है जो कि खुद ही पूंजीवादी विकास का प्रतिफल है और अच्छे दामों के नाम पर, बिचैलियों के उन्मूलन के नाम पर और अंततः “किसानों की स्वतंत्रता” के नाम पर इन कानूनों को आगे बढ़ाने का काम रहा है। इतिहास ने दिखाया है कि किस तरह से दाम की उत्प्रेरणा पर आधारित खेती ने जिसके तहत दामों के उतार-चढ़ाव और अत्यंत अस्थिरता (volatility) रहते हैं, किसानों के लिए विपत्ति का ही पैगाम लाया है। इस स्थिति से केवल “सामान्य, सर्वांगीण तथा दूरदर्शितापूर्ण नियंत्रण” से पार पाया जा सकता है। इस पर अपना मंतव्य रखते हुए मार्क्स ने कहा था “और यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि ऐसा नियंत्रण समूचे तौर पर पूंजीवादी उत्पादन के नियमों से असंगत है और हमेशा एक नेक इरादा ही बना रहता है, अथवा भारी तनाव और गड़बड़ के वक्तों में आपवादिक सहयोग तक ही सीमित रहता है।” (पूंजी खंड 3, ‘कीमत के उतार-चढ़ाव का प्रभाव अध्याय’ से) यह पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के उच्छेदन की मांग करता है। सरकार हमें जो हल बताती है वे वैसे बाजार आधारित हैं, जैसे देखिए – खाद्य प्रसंस्करण को बढ़ावा देना, वेयरहाउसिंग (गोदाम) की अच्छी व्यवस्था, वायदा बाजार (futures market) विपणन की स्वतंत्रता आदि जो कि किसी भी तरह से दाम के भयानक अस्थिरता, सम्पत्तिहरण और परिणामस्वरूप विनाश की समस्या से पार नहीं पा सकते। वह समाजवाद ही है जो छोटे किसानों को सामान्य रूप से राहत और समृद्धि दे सकता है। हमारे हुक्मरान चाहते हैं कि देहात का सफाया करने की ओर कदम बढ़ाया जाये और गांवों को काॅरपोरेटों को दे दिया जाये। इसका जवाब यह युक्तिकरण नहीं हो सकता है कि आखिर पूंजीवादी प्रतिद्वंद्विता तो इजारेदारी (बड़ी पूंजी- काॅरपोरेट) को ही जन्म देती है बल्कि हमें राजनीति करनी होगी, मित्रता और संयुक्त मोर्चा की क्रांतिकारी राजनीति। सत्तासीन फासीवादी सरकार के रहते हुए हमें उसके जनाधार में किसी भी तरह की दरार का फायदा उठाना चाहिए। यह कि धनी किसान, जो कि रूढ़िवादिता का गढ़ है, जैसा कि हमने पहले ही कहा है, आज फासीवादी सरकार के खिलाफ खड़ा हो रहा है, भले ही यह अस्थायी ही क्यों न हो तो हमें इसका फायदा उठाकर इसे कमजोर

बनाना चाहिए। जैसा कि लेनिन कहते हैं विभिन्न बुर्जुआ ग्रुप या तबके के बीच कोई छोटी सी भी दरार हो तो उसका फायदा उठाना चाहिए भले ही वह कितनी भी अस्थायी क्यों न हो और वह कितनी भी ढुलमुल मित्र शक्ति क्यों न हो।[6] हमारी नीति में लचीलापन होना चाहिए और हमें यह भी याद रखना पड़ेगा कि अवसरवादिता और एक लचीली क्रांतिकारी नीति के बीच का अंतर महीन होता है और हमेशा बदलते रहता है लेकिन वह रहता जरूर है। यह हम पर निर्भर करता है कि हम अपने दूरगामी लक्ष्यों पर कैसे पकड़ बनाये रखते हैं और किस तरह से हम अपने दूरगामी लक्ष्य की तिलांजलि को सुविधा की बलिवेदी पर नहीं चढ़ा देते हैं। अंत करते हुए हम यह याद रखें कि राजनीतिक बात को भूल जाना और एक अर्थवादी प्रस्तुतीकरण करना अक्षम्य है, विशेषकर जब एक फासीवादी पार्टी सत्तासीन हो।

    कृषि कानून मुर्दाबाद! और भी ऐसे कृषि कानून आने वाले हैं, सावधान रहें!! कृषि संकट का एकमात्र जवाब समाजवाद ही है!!!

(ध्यान रहे कि यह दिसम्बर, 2020 में अंग्रेजी में छपे लेख का हिन्दी अनुवाद है। उस समय किसान आंदोलन की महज शुरुआत थी, अब इसकी व्यापकता के बढ़ने के साथ ही कई नए आयाम जुड़ गये हैं जिन पर हम अगले अंकों में टिप्पणी करेंगे)

[सम्पादकीय नोट : यद्यपि हम इस लेख में व्यक्त की गई मूल भावना व दिशा से पूरी तरह से सहमत हैं, तथापि यह भी सत्य है कि हमारी समझ कई मायनों में, यहां तक कि कुछ बुनियादी मसलों पर भी, जैसे कि किसान आन्दोलन में मजदूर वर्गीय क्रान्तिकारी प्रचार से जुड़े कुछ मूलभूत सवालों तथा अन्यान्य मसलों पर भी, इससे भिन्न है, या कह सकते हैं कि भिन्न रूप से प्रतिपादित की गई है। लेकिन इस भिन्नता के बावजूद हम इस लेख की भरपूर पैरवी करते हैं और उम्मीद करते हैं कि जो मतभेद हैं वे द्विपक्षीय बिरादराना वार्ता के जरिये हल होने लायक हैं। ]


[1] “वस्तुतः उद्योग तथा कृषि दोनों में छोटे पैमाने के उत्पादन का बड़े पैमाने के उत्पादन द्वारा विस्थापन पूंजीवाद की मौलिक एवं प्रधान प्रवृत्ति है। लेकिन इस विस्थापन को तत्काल सम्पत्तिहरण के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए। विस्थापन का अर्थ छोटे जोतदारों की बरबादी तथा उनके फार्मों का बदतर होना भी होता है, यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो वर्षों तथा दशकों तक चल सकती है। यह अवनति विविध रूप अख्तियार करती है और छोटे जोतदारों का अतिश्रम व कुपोषण, उसकी भारी कर्जग्रस्तता, आम तौर से जानवरों का बदतर भोजन और उसकी अपर्याप्त देखभाल, घटिया खेती-बाड़ी, उर्वरण तथा फार्म पर तकनीकी ठहराव, आदि।” (Lenin, Coll. Works. 22, p. 70; अनुवाद हमारा है)

[2]  Capital Vol. 3, p. 617 (Progress Publishers, Moscow) देखें

[3] Report of the ‘Commission of Experts  of the President of the United Nations General Assembly on Reforms of the International Monetary and Financial System’; September 21, 2009; p.28 (अनुवाद हमारा है)

[4] The Global Economic Crisis: Systemic Failures and Multilateral Remedies, UNCTAD Report, 2009; p.23 (अनुवाद हमारा है)

[5] C. Bharwada and V Mahajan (2006): “Gujarat: Quiet Transfer of Commons”, Economic and Political Weekly, January 28, 2006

[6] अपने से अधिक शक्तिशाली विरोधी को केवल सारी ताकत लगाकर, अपने शत्राुओं के प्रत्येक छोटे मतभेद का, विभिन्न देशों के बुर्जुआ वर्ग के बीच और अलग-अलग देशों में विभिन्न ग्रुपों तथा जमातों के बुर्जुआ वर्ग के हितों के प्रत्येक अंतर्विरोध का अनिवार्य रूप से, बिना चूके, बड़ी होशियारी, सावधनी तथा दक्षता के साथ उपयोग करके, अवामी संगी-साथी पाने के प्रत्येक अवसर का, छोटे से छोटे अवसर का भी लाभ उठाकर हराया जा सकता है, भले ही संगी-साथी अस्थायी, ढुलमुल, अस्थिर, अविश्वसनीय, सापेक्ष क्यों न हो। “ (क्या करें, लेनिन संकलित रचनाएं, 9, प्रगति प्रकाशन, पृष्ठ 311)