दलित विरोधी मानसिकता व जातिवादी अहंकार के खिलाफ वर्गीय संघर्ष जरूरी

October 14, 2021 0 By admin

संपादकीय, अक्तूबर 2021

देश के हर कोने से हम लगातार ऐसी खबरें सुनते रहते हैं जिनमें कभी काम करने के बाद मजदूरी मांगने पर, कभी जबर्दस्ती काम करवाने से इंकार करने, कभी मूंछ रखने पर, कभी घोड़ी-साइकिल चढ़ने, कभी बारात निकालने या शव को अंतिम क्रिया के लिए ले जाने, स्त्रियों के खेतों में काम या शौच हेतु जाने पर, तो कभी किसी छोटी-मोटी चोरी का इल्जाम लगा या अंतर्जातीय प्रेम अथवा विवाह के ‘अपराध’ में दलित जातियों के व्यक्तियों की निर्मम अमानवीय पिटाई, बलात्कार, हत्या, आदि कर दी जाती है। मामला पुलिस में न जाने पाये इसके लिए अपराधियों द्वारा लाश तक को जबर्दस्ती जला दिया जाता है या उत्तर प्रदेश के हाथरस की घटना की तरह खुद पुलिस द्वारा ही परिवार की सहमति और मौजूदगी के बिना ही रात में जला दिया जाता है।

कुछ दिनों पहले उत्तराखंड में हरिद्वार के पास गांव रोशनाबाद में भारतीय हॉकी टीम की शानदार खिलाड़ी वंदना कटारिया के घर के आगे कुछ हुड़दंगबाजों ने पटाखे चलाये और जातिसूचक गालियाँ दीं। उनका कहना था कि टोक्यो ओलंपिक में भारतीय महिला हॉकी टीम की सेमीफ़ाइनल में हार की वजह दलित खिलाड़ी थे। कुछ दिन पहले पंजाब के जीदा गांव की एक वीडियो सामने आती है, जिसमें गांव के कुछ ख़ुद बने पंच गांव की चौपाल में कुछ व्यक्तियों को बेरहमी से डंडों के साथ पीट रहे हैं। पीटे जाने वालों पर तार की चोरी का इल्ज़ाम है। इन्हीं दिनों सिरसा ज़िले के एक गाँव की दलित परिवार की 9वीं में पढ़ने वाली लड़की अगवा होती है, जिसकी गली-सड़ी लाश 5 दिनों बाद खेतों में से मिलती है। दिल्ली के एक शमशानघाट में एक 9 साल की बच्ची को एक मंदिर के पुजारी द्वारा सामूहिक बलात्कार के बाद जला दिया जाता है, जो उसी मंदिर के सामने माँगकर गुज़ारा करने वाली दलित औरत की बेटी थी। इसी तरह हम देश भर की उच्च शिक्षण संस्थाओं में दलित छात्रों द्वारा आत्महत्याओं और स्कूलों में दलित छात्रों से जातिगत दुर्व्यवहार, सफाई का काम कराये जाने, मिड डे मील के लिए अलग बैठाये जाने, आदि की बातें सुनते रहते हैं।

हमारे देश के ज़्यादातर लोग ऐसी ख़बरें सुनने के आदी हो गए हैं जिन सारी घटनाओं में एक साझा बात यह होती है कि पीड़ित पक्ष का संबंध तथाकथित ‘निचली’ कहे जानी वाली जातियों के साथ होता है। बेशक हमारे देश में तथाकथित ‘उच्च’ जातियों द्वारा किये जाने वाले इस जुल्म का यह कोई नितांत नया सिलसिला नहीं है। यह जुल्म बहुत लंबे वक्त से किया जाता रहा है। लेकिन यह भी सच है कि फासीवादी मोदी सरकार के केंद्रीय सत्ता में आने व कई राज्यों में बीजेपी सरकारें बनने के बाद दलितों, अल्पसंख्यकों और औरतों पर हमलों में एकदम से तेज़ी आई है। ऐसी घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार अपराधियों को आम तौर पर गिरफ्तारी या सजा का ड़र भी नहीं होता क्योंकि उन्हें ताक़तवर राजनीतिक लोगों एवं प्रशासनिक अमले की शह हासिल होती है।

असल में पूंजीवादी राजनीतिक पार्टियों के नेताओं, पुलिस प्रशासन, अफ़सरशाही और अदालतों का अपराधी क़िस्म के लोगों के साथ एक क़िस्म का नापाक़ गठजोड़ बन गया है। ये अपराधी आम तौर पर बड़े से बड़ा घिनौना गुनाह करके भी साफ़ बच निकलते हैं। जनाक्रोश के दबाव में कई बार यदि कार्रवाई ज़रूरी भी हो जाए तो अपराधियों में से ही किसी छुटभैये ग़रीब मेहनतकश, अल्पसंख्यक या फिर किसी दलित की ‘बलि’ दे दी जाती है। सरकारी अमले में असर-रसूख़ रखने वाले बड़े गुनाहगार साफ बच जाते हैं। जेलों में मौजूद सजायाफ्ता व मुकदमे के इंतजार में बिना जमानत क़ैदियों के बारे में बार-बार हुए सभी सर्वेक्षणों में यह तथ्य सामने आ चुका है कि भारतीय जेलों में क़ैदियों की बहुसंख्या मज़दूरों, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों से ही आती हैं।

भारत के मज़दूरों, किसानों और अन्य मेहनतकश तबक़ों का हर क़िस्म के दमन के ख़िलाफ़ संघर्षों का शानदार इतिहास रहा है। इसके चलते ऐतिहासिक तौर पर जुल्मो-सितम का शिकार रहे वंचित तबकों की जनता को 20वीं सदी के दौरान कुछ हद तक राहत की सांस मिलनी शुरू हुई थी। आजादी के बाद भारत का पूंजीवाद बीमार ही सही पर जब तक विस्तार के दौर में था तो सीमित ही सही मगर कुछ हद तक शिक्षा और रोजगार के अवसर भी उनके लिए खुलने शुरू हुये थे। लेकिन कुछ दशकों के बाद ही भारतीय पूंजीवाद अपने स्वयं के कारणों से आर्थिक संकट में फंस गया और इसने फिर से शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, आदि सभी सामाजिक सुविधाओं का व्यवसायीकरण और सार्वजनिक क्षेत्र का निजीकरण आरंभ कर दिया। रोजगार के अवसरों को अधिकाधिक अस्थायी व ठेके की व्यवस्था में बदल दिया गया है जिसमें मजदूरी की दर अत्यंत कम, बस किसी तरह जिंदा रहने लायक, है।

इन सभी पूंजीवादी आर्थिक नीतियों का सर्वाधिक विनाशकारी प्रभाव उन्हीं मेहनतकशों पर पड़ा है जो पहले से ही सबसे अधिक शोषण का शिकार थे और दलित जातियों में ऐसे मेहनतकश आनुपातिक रूप से सबसे अधिक हैं। अतः ऐतिहासिक रूप से ही शोषण-वंचना का शिकार रही दलित जातियों की मेहनतकश जनता को भारतीय पूंजीवाद की इन नवउदारवादी आर्थिक नीतियों का सर्वाधिक भयंकर नतीजा झेलना पड़ा है। कोविड़ और उससे निपटने के नाम पर किए गए निर्मम लॉकडाउन में भी यही देखा गया है कि पूंजीवादी सत्ता के दमन की सभी कार्रवाइयों और आर्थिक बरबादी में दलित मेहनतकश आबादी सर्वाधिक पीड़ित जनता में से होती है।

मौजूदा वक्त में हम एक ऐसे दौर से गुज़र रहे हैं, जब पूंजीवाद के असमाधेय बनते जा रहे आर्थिक संकट के कारण वर्तमान किसान आंदोलन जैसे जनविक्षोभ के उभरने, व्यापक रूप लेने व बढ़ते जाने की आशंका से भयभीत भारत के बड़े पूंजीपतियों ने फासीवाद को अपना सहारा चुन लिया है और भारत की फासीवादी पार्टी भाजपा व राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लिए अपनी तिज़ोरियों के मुँह खोल दिए हैं। यूं तो पूंजीपतियों की अन्य पार्टियाँ भी दूध की धुली नहीं हैं लेकिन भाजपा और संघ परिवार के पास अपने सैकड़ों संगठनों-गिरोहों की मदद से, देश के मेहनतकश लोगों को गुमराह करने वाला एक विशाल ताना-बाना है जिसकी मदद से उन्होंने हिंदू राष्ट्र के अपने एजेंडे को तेज़ी से आगे बढ़ाया है।

हिंदुत्ववादी राष्ट्रवादियों का ऐलानिया मक़सद तो चौतरफा विकास के जरिये ‘राम राज्य’ और भारत के ‘प्राचीन गौरव’ को वापस लाना है, लेकिन उनका वास्तविक गुप्त मक़सद मेहनतकश जनता के बढ़ते असंतोष एवं गुस्से से बचाकर संकटग्रस्त बड़े पूंजीपति वर्ग की सेवा करना है। मज़दूरों, किसानों, दलितों एवं व्यापक मेहनतकश आबादी की ज़िंदगी में सुधार लाने से इनका कोई लेना-देना न कभी पहले था, न ही आज है। सबूत के तौर पर एक तथ्य ही काफ़ी है कि जैसे-जैसे हिंदू राष्ट्र की मुहिम तेज़ हुई है, तैसे-तैसे ही पूरे देश में मज़दूरों, दलितों और अल्पसंख्यकों पर हमले तेज़ हो गए हैं। इसका मक़सद भी साफ है। मेहनतकश आबादी में धर्म, जाति, सांप्रदायिकता और अंधराष्ट्रवाद के नारों के साथ फूट डालो। पूंजीवाद की नवउदारवादी आर्थिक नीतियों को लागू करने के लिए मेहनतकशों में आपसी फूट डालना और परस्पर वैमनस्य-नफरत फैलाना सबसे ज़रूरी है।

केवल और केवल मेहनतकश जनता की व्यापक एकजुटता के­­­ बल पर ही देशी-विदेशी पूंजी के इस बड़े हमले को रोका जा सकता है। इन हालातों में एक तरफ़ तो पूरे देश में विभिन्न तबकों में आक्रोश फूटता नज़र आ रहा है, दूसरी ओर मज़दूरों, किसानों और मध्यवर्गीय बुद्धि‍जीवियों का एक सचेतन हिस्सा इस बात के लिए भी चिंतित है कि इस बिखरे-बिखरे आक्रोश को एक विशाल लहर में कैसे बदला जाए। पर हमारे सामने कुछ अत्यंत गंभीर चुनौतियाँ मौजूद हैं। एक बड़ी चुनौती जो भारत के मेहनतकशों की एकता में बड़ी रुकावट बनी हुई है, वह है हमारे सामाजिक ढांचे का सांस्कृतिक पिछड़ापन। हमारे देश में जिस वक्त जाति आधारित सामंतवाद अपने अंतिम दौर में पहुंच बिखर रहा था और उसके बढ़ते अंतर्विरोध समाज को नए युग में ले जाने की जमीन तैयार कर रहे थे, उसी दौरान विश्व पूंजीवाद साम्राज्यवाद के दौर में दाख़िल हो चुका था।

इन विशेष ऐतिहासिक हालात में हमारे देश को उपनिवेशवादी अधीनता का संताप भोगना पड़ा। औपनिवेशिक साम्राज्यवादी शासकों ने हमारे यहाँ के कच्चे माल और श्रम शक्ति की लूट करने की नीति के तहत निचले स्तर पर मेहनतकश आबादी को नियंत्रण में रखने के लिए अपने एक भरोसेमंद सहयोगी के रूप में न सिर्फ सामंती ढांचे को कायम रखा बल्कि इसके वैचारिक आधार ब्राह्मणवाद को भी पूरा संरक्षण दिया। न सिर्फ प्रशासनिक अमले में भर्ती में इन तबकों को प्राथमिकता दी गई बल्कि शिक्षा व्यवस्था का ढांचा भी औपनिवेशिक हुकमत की खिदमत के लिए जरूरी कुछ आधुनिक कौशल के साथ मूलतः इनके विचारों के मिश्रण के आधार पर ही खड़ा किया गया।

वहीं 19वीं सदी में देश में उद्योग लगने शुरू हो गए थे। नतीजे के तौर पर भारत में एक देशी पूंजीपति वर्ग पैदा हो चुका था और उसके साथ ही आधुनिक मज़दूर वर्ग भी वजूद में आ चुका था। किंतु औपनिवेशिक गुलामी के दौर में पैदा भारतीय पूंजीपति वर्ग में वह ऊर्जा और सामर्थ्य नहीं थी कि वह औपनिवेशिक सत्ता और सामंतवाद के खिलाफ एक चौतरफा निर्णायक लड़ाई लड़ता जबकि वह खुद ही उभरते मजदूर वर्ग संघर्षों से भी भयभीत था। अतः उसने औपनिवेशिक सत्ता और सामंतवाद दोनों से समझौते का रास्ता चुना। चुनांचे बंकिमचंद्र चैटर्जी, दयानंद, विवेकानंद से लेकर तिलक, लाजपत राय, गांधी, नेहरू, पटेल वगैरह का भारतीय पूंजीपति वर्ग का राष्ट्रवाद आधुनिक पुरोगामी तार्किक चिंतन व मानवतावादी समानता-स्वतंत्रता की नूतन संस्कृति के बजाय प्रतिगामी जाति आधारित सनातन धर्म व प्राचीन छद्म गौरव के अंधतावादी पुनरुत्थान पर टिका था।

1947 में साम्राज्यवादियों के साथ एक समझौते के तहत हुए सत्ता हस्तांतरण में सत्ता इसी पूंजीपति वर्ग के हाथ आई। देशी पूंजीपति शासकों के सामने देश को पूंजीवादी रास्ते पर विकसित करने की चुनौती थी। लेकिन उपनिवेशवाद की कोख में से पैदा हुए इस बीमार, ऊर्जाहीन और कमज़ोर पूंजीवाद ने सामंती संबंधों को क्रांतिकारी तरीक़े से बदलने की बजाए, ऊपर से, पुराने सामंती जमींदारों-भूस्वामियों के साथ समझौतों के ज़रिए प्रशियाई तरीक़े से, सामंती आर्थिक संबंधों को पूंजीवादी संबंधों में बदलना शुरू किया।

इससे आर्थिक संबंधों में तब्दीली तो आ गई मगर नए शासक वर्ग में भी बहुसंख्या सामंती समाज की तरह सवर्ण जातियों की ही बनी रही और संस्कृति में जातिगत भेदभाव-नफरत, औरत विरोधी मानसिकता, अंधविश्वास, इलाकाई कूपमंडूकता जैसे सामंती सांस्कृतिक मूल्य बड़े पैमाने पर बचे रहे। ये अतीत के सवर्ण सामंती भूस्वामी जिनमें से कुछ अब पूंजीपति या पूंजीवादी फार्मर बन मौजूदा शासक वर्ग का हिस्सा बन चुके हैं और बहुतेरे सरकारी-निजी क्षेत्रों की अफसरशाही-प्रबंधन का अंग हैं, अपने इन सामंती सांस्कृतिक मूल्यों के साथ आज फासीवाद के उभार में अहम भूमिका निभा रहे हैं। आज जब भारत की विशाल मेहनतकश आबादी देशी-विदेशी पूंजी की लूट के ख़िलाफ़ संघर्षों के रास्ते तलाश रही है, तब हमारे समाज का यह सांस्कृतिक पिछड़ापन मेहनतकशों की एकता की राह में एक बड़ी रुकावट बना हुआ है।

यही वह ऐतिहासिक कारण थे कि यूरोप के पूंजीवादी नवजागरण की तरह हमारा समाज एक मजबूत क़िस्म के नवजागरण और ज्ञान प्रसार का ऐसा बड़ा ओजस्वी आंदोलन नहीं खड़ा कर सका जिसकी मशाल समाज के हर कोने से अतीत की अतार्किकता, कूपमंडूकता, संकीर्णता के इस गहन अंधकार को भगा देती। पहले तो उपनिवेशवादी शासकों ने टूटते सामंती समाज में भक्ति आंदोलन, धार्मिक सुधारों और अन्य साहित्यि‍क आंदोलन के रूप में उठ रहे ज्ञान प्रसार के आंदोलन को ना केवल रोक दिया, बल्कि उसे रास्ते से भटकाने में भी मदद की। साथ ही वारेन हेस्टिंग्स के समय से ही भारत के पूरे कानूनी, न्यायिक व  प्रशासनिक ढांचे को न सिर्फ ब्राह्मणवादी प्रतिक्रियावादी विचारों पर खड़ा किया बल्कि उसमें इस्लामिक-ईसाई परंपरा के प्रतिक्रियावादी तत्वों का भी छोंक लगाकर एक घनघोर प्रतिगामी व मानवद्रोही प्रशासनिक-न्यायिक व्यवस्था की बुनियाद रखी जो कुछ सीमित बदलावों के साथ आज तक कायम है।

आगे चलकर भारत के पूंजीवादी शासकों ने भी पिछड़े सामंती सांस्कृतिक मूल्यों को पूंजीवादी मंडी की ज़रूरतों के अनुसार ढालकर क़ायम रखने में ही अपना भला समझा। जातिवादी अहंकार भी इसका ही एक बेहद विकृत एवं उभरा हुआ रूप है जो कहीं ब्राह्मणवादी दबदबे, तो कहीं क्षत्रिय या राजपूत दबदबे के रूप में आज भी काफ़ी हद तक क़ायम है। वहीं ज़मीनों के मालिक वर्ग जिन्हें मध्ययुगीन सामंतवादी दौर में काम करने वाली शूद्र जातियों में गिना जाता था, मौजूदा पूंजीवादी दौर में अपने बढ़े आर्थिक और सामाजिक रुतबे के कारण जाति व्यवस्था में ऊपरी दर्जे में आ गए हैं। पंजाब, हरयाणा, महाराष्ट्र, तमिलनाडु आदि जिन क्षेत्रों में ब्राह्मणवादी दबदबा कम या लगभग नहीं है, वहां उसके जाति उत्पीड़न और अहंकार आधारित दबदबे की जगह इन मध्यवर्ती जातियों के दबदबे ने ले ली है।

लेकिन क्या मौजूदा वक़्त का जातिवाद हूबहू सामंती दौर की जाति व्यवस्था जैसा ही है? नहीं। ऊँच-नीच और सामाजिक भेदभाव के मामले में यह पुरानी जाति व्यवस्था की ही निरंतरता है। लेकिन बहुत कुछ बदल भी चुका है। जाति प्रथा की तीन मुख्य विशेषतायें थीं – पहली जाति आधारित श्रम या काम का विभाजन, दूसरा दर्जाबंदी या ऊँच-नीच का पदानुक्रम, और तीसरी अंतर्जातीय विवाह संबंधों की मनाही। परंतु और गहराई से देखा जाए तो जाति-व्यवस्था का मूल भौतिक आधार इसकी पहली विशेषता अर्थात सामंती उत्पादन व्यवस्था का श्रम विभाजन था जबकि शेष दो विशेषतायें इस पहली के आधार पर ही खड़ी और टिकी हुई थीं।

वर्तमान पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था के दौर में जाति संबंधों को कायम रखने का यह सामंती श्रम विभाजन का भौतिक आधार तो ख़त्म हो गया है। अब शेष दो विशेषतायें ख़त्म होने की प्रक्रिया में हैं, लेकिन यह प्रक्रिया बेहद धीमी रफ़्तार से चल रही है क्योंकि इनके बने रहने से न सिर्फ पूंजीवादी व्यवस्था को कोई नुकसान नहीं बल्कि वह इनका प्रयोग अपने स्वार्थ में कर सकता है और कर रहा है। उंच-नीच व छुआछूत को आज के दैनंदिन सार्वजनिक व्यवहार में तो पूरी तरह चला पाना मुमकिन नहीं है पर व्यक्तिगत-पारिवारिक क्षेत्र में यह अभी भी बहुत हद तक बरकरार है और अंतर्जातीय विवाहों की रफ्तार तो बहुत ही धीमी है।

इसलिए जाति व्यवस्था के बने रहने के लिए सामंती उत्पादन संबंधों के श्रम विभाजन का भौतिक आधार ख़त्म हो जाने पर भी सांस्कृतिक-वैचारिक क्षेत्र में जाति अहंकार, नफरत व भेदभाव मौजूद है। यह इसलिए है कि पूंजीवाद को मेहनतकशों की एकता तोड़ने के लिए इसकी ज़रूरत है। जनता को बाँटकर रखने के लिए पूंजीवाद जातिवाद को अंधराष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता की तरह एक विचारधारात्मक व सांगठनिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करता है। इसीलिए दलितों के ख़िलाफ़ व्यापक जातिवादी भेदभाव की घृणि‍त तस्वीर आज भी हमारे सामने है।

तो क्या जाति अहंकार व जातिगत उत्पीड़न के खिलाफ लड़ाई सिर्फ़ दलित आबादी का अपना अलग संघर्ष ही है? इस सवाल के जवाब के लिए हमें जातिवादी दमन के स्रोत को समझना होगा। वर्तमान पूंजीवादी दौर में हमारे समाज के दो बड़े ऐतिहासिक वर्ग आमने-सामने हैं। एक तरफ़ उत्पादन के साधनों का स्वामी पूंजीपति वर्ग और दूसरी तरफ़ उत्पादन के सारे साधनों से अपना अधिकार खो चुका मज़दूर वर्ग है। इन दोनों वर्गों के बीच का टकराव हमारे समाज के बुनियादी अंतरविरोधों में से प्रमुख अंतरविरोध है। इस अंतरविरोध के कारण होने वाले संघर्ष में ही मेहनतकश आबादी (दलित और ग़ैर-दलित) के ख़िलाफ़ होने वाले दमन का स्रोत मौजूद है। भारत की कुल दलित आबादी का लगभग 90% हिस्सा मज़दूरी करता है। इसलिए वर्ग संघर्ष में आर्थिक, सामाजिक और हर प्रकार का दमन चक्र लगभग सारी दलित आबादी पर ही अधिक चलता है एवं आर्थिक शोषण के साथ-साथ दलित आबादी को जातिगत उत्पीड़न के रूप में दोहरा जुल्म भी झेलना पड़ता है। पर यह भी हक़ीक़त है कि भारत की कुल मज़दूर आबादी में ग़ैर-दलित जातियों के मजदूर बहुसंख्या में हो गये हैं।

अतः देश की समस्त मज़दूर आबादी की एकता लूटेरी पूंजीवादी व्यवस्था को उखाड़ने की पहली शर्त है। दलित आबादी पर हो रहे दमन के ख़िलाफ़ संघर्ष को पहचान की राजनीति के तहत केवल जातिवादी अवस्थिति से लड़ने का न्यौता देने वाले इस हक़ीक़त को नज़रअंदाज़ करते हैं। पहचान की राजनीति की यह अवस्थिति न सिर्फ मज़दूर वर्ग की विशाल एकता की राह में रुकावट है, बल्कि यह जातिगत उत्पीड़न के खिलाफ लड़ाई में दलित मेहनतकशों को अकेला व अलग-थलग कर उनके संघर्ष को कमजोर कर देती है। उदाहरण के तौर पर 1970-80 के दशक में जातिगत उत्पीड़न के क्रांतिकारी प्रतिरोध ने जहां बिहार में सवर्ण दबंगई को सीधी चुनौती देकर कमजोर किया था, वहीं सवर्ण दबंगाई को मिली इस चुनौती के बल पर ही सत्ता में आने वाले लालूप्रसाद यादव-नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली पहचान की राजनीति ने पिछले तीन दशकों में इस एकता को तोड़कर वापस बीजेपी-संघ नेतृत्व में सवर्णों की प्रतिक्रियावादी जातिगत शक्ति को फिर से मजबूत कर दिया है।  

आज ग्रामीण आबादी की सरंचना में उत्पादन के साधनों से पूरे-आधे वंचित हो चुके लोगों की आबादी में गैर दलित जातियों के लोग भी काफ़ी बड़ी संख्या में हैं। ग्रामीण मेहनतकशों में दलित, भूमिहीन ग़ैर-दलित तथा ग़रीब किसानों की एकता ही जाति आधारित दमन का मुक़ाबला कर सकती है हालांकि जातिवाद के विचारधारात्मक हथियार से शासक वर्ग इस तरह की एकता की राह में बड़ी रुकावट खड़ी करता है। मगर आज दलित व ग़ैर-दलित मेहनतकशों की एकता के इस दुर्गम कार्य को हर हाल में पूरा करना ज़रूरी है। वर्गीय उत्पीड़न का शिकार पूरी मेहनतकश आबादी होती है पर दलित मेहनतकश आबादी साथ में जातिगत उत्पीड़न का भी अतिरिक्त शिकार होती है। क्योंकि जातिवादी उत्पीड़न वर्गीय उत्पीड़न को कायम रखने के लिए ही किया जाता है, इसलिए इसके ख़िलाफ़ संघर्ष भी सिर्फ दलितों का नहीं पूरी मेहनतकश आबादी का साझा संघर्ष बनता है। इस साझा संघर्ष को तोड़ने के लिए जातिवादी अहंकार जगाने वाले वृत्तांत गढ़कर तथाकथित सवर्ण जातियों के मेहनतकशों को दलित मेहनतकशों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया जाता है। अतः जातिवादी नफरत-अहंकार को बनाए रखना शासक वर्गों के लिए बेहद ज़रूरी है। यह मज़दूर वर्ग की एकता को तोड़ने का एक पैना हथियार है। और ठीक इसीलिए गैर दलित जातियों के मेहनतकशों को जाति-उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष व प्रतिरोध हेतु सचेत व खड़ा करना बेहद जरूरी है तभी वर्ग उत्पीड़न के विरुद्ध साझा संघर्ष भी सशक्त होगा।

जातिवादी अहंकार, नफरत व भेदभाव के ख़ि‍लाफ़ लड़ाई का एक अहम पहलू समाज में जारी विचारधारात्मक संघर्ष है। आज हमारे समाज की रग-रग में पूंजीवाद का प्रतिक्रियावादी विचारधारात्मक दबदबा कायम है। इसने न केवल मध्ययुगीन पिछड़े सामंती मूल्यों को ही सीने से लगाकर रखा है बल्कि पूंजीपति वर्ग की समस्त आर्थिक, राजनीतिक, प्रशासनिक, शैक्षणिक, विभिन्न किस्म के मीडिया की प्रचारात्मक शक्ति से इन प्रतिगामी मूल्यों को बढ़ावा भी दे रहा है। इसका मुक़ाबला करने के लिए ज़रूरी है कि जवाब में मज़दूर वर्ग का विचारधारात्मक दबदबा स्थापित किया जाए। हर क़िस्म के पिछड़े सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों के ख़िलाफ़ लड़ाई इस विचारधारात्मक संघर्ष का ज़रूरी हिस्सा बनती है। बेशक आर्थिक लड़ाइयों व उत्पीड़न के खिलाफ प्रतिरोध में हमारी शानदार विरासत रही है, लेकिन सामाजिक-सांस्कृतिक पिछड़ेपन से मुक़ाबला करने के लिए इतना ही काफ़ी नहीं है। मौजूदा दौर में विचारधारात्मक संघर्ष के लिए हमें आगे बढ़कर वर्गीय नज़रिए से चीज़ों का विश्लेषण व उसका प्रचार करना होगा। मज़दूर वर्ग विश्व के सभी भौतिक और आत्मिक मूल्यों का सृजनकर्ता होने के कारण, इतिहास का सबसे उन्नत वर्ग है। मज़दूर वर्ग की एकता के आधार पर ही दलितों पर बढ़ रहे हमले और जातिवादी भेदभाव के ख़िलाफ़ लड़ा जा सकता है।

इस बात पर ज़ोर देना बेहद जरूरी है कि जातिवादी कोढ़ और जातिगत अहंकार के ख़िलाफ़ संघर्ष सिर्फ दलितों का ही नहीं पूरी मेहनतकश आबादी का साझा संघर्ष है। जैसे मार्क्स ने अमरीकी श्रमिकों को कहा था, ‘गोरी खाल वाले श्रमिक तब तक खुद को मुक्त नहीं कर सकते जब तक काली खाल पर गुलामी का दाग मौजूद है’ ठीक उसी तरह भारत के गैर दलित जातियों के मेहनतकशों के बीच इस चेतना का प्रचार-प्रसार अत्यंत जरूरी है कि जातिगत उत्पीड़न से दलित मेहनतकशों की मुक्ति के लिए सभी मेहनतकशों का साझा संघर्ष पूंजीवादी शोषण से उनकी अपनी मुक्ति के संघर्ष का अनिवार्य, अविच्छिन्न अंग है, उनकी अपनी मुक्ति की पूर्वशर्त है। जातिगत, पितृसत्तात्मक, अंधराष्ट्रवादी, इलाकाई, भाषाई अर्थात हर प्रकार के दमन के ख़िलाफ़ संघर्ष करते हुए ही पूंजीवादी व्यवस्था के ख़िलाफ़ सभी मेहनतकशों की विशाल एकता बन सकेगी जिससे इंसान के हाथों इंसान की लूट से रहित समाजवादी समाज की स्थापना का मेहनतकशों का सपना साकार होगा जिसमें समाज के हर व्यक्ति को जीवन के हर क्षेत्र और हर स्तर पर बिना भेदभाव के हिस्सेदारी व अपना योगदान देने का पूर्ण अवसर हासिल होगा।