पूंजीवादी गलाकाट प्रतिस्पर्धा और शारीरिक फिटनेस

पूंजीवादी गलाकाट प्रतिस्पर्धा और शारीरिक फिटनेस

November 14, 2021 0 By admin

प्रसाद वी


जाने-माने कन्नड़ युवा अभिनेता पुनीत राजकुमार की हुई हालिया मौत ने फिर से युवाओं में दिल के दौरे की बढ़ती घटनाओं और अत्याधिक व्यायाम के साथ इसके संबंधों पर ध्यान केंद्रित किया है। 29 अक्टूबर को नियमित कसरत के बाद सुबह सीने में दर्द की शिकायत के बाद पुनीत को उनके पारिवारिक डॉक्टर के पास ले जाया गया। अभिनेता का ईसीजी हुआ और किसी भी विपरीत हृदय गतिविधि का कोई सबूत नहीं मिला।

युवा लोगों में दिल के दौरे की बढ़ती घटनाओं का यह चलन पिछले कुछ वर्षों से बढ़ रहा है। ऐसे ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ पीड़ितों में से 30% से अधिक के पास इस बीमारी का पारंपरिक जोखिम या रोग का आनुवंशिक इतिहास नहीं है। ये लोग वर्कआउट के दौरान या जिम से लौटने के तुरंत बाद गिर पड़ते हैं। ऐसे मामलों में उच्च-तीव्रता वाला व्यायाम एक प्रमुख कारक है। यह सर्वविदित है कि व्यायाम मानव फिटनेस के लिए ज़रूरी है लेकिन अत्यधिक व्यायाम, स्वास्थ्य के लिए लाभकारी सीमा से आगे बढ़ जाता है। लंबे समय तक अत्यधिक व्यायाम और फिटनेस की धुन में प्रतिस्पर्धा से हृदय की दीवारों को नुकसान पहुँचता है जिससे हृदय-धड़कन की लय में गड़बड़ी हो सकती है क्योंकि, चरम, दीर्घकालिक, सहनशक्ति की सीमा तक अभ्यास, कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम पर सामान्यत: अत्यधिक बोझ डालते हैं।

मैराथन धावकों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया है कि अत्यधिक दौड़ने की घटनाओं के समापन के बाद भी, एथलीटों के रक्त के नमूनों में दिल की क्षति से जुड़े बायोमार्कर मौजूद हैं। 2011 में पुरुष और महिला दोनों पर किए गए एक अध्ययन से ये निष्कर्ष निकला है कि लगभग 40% मैराथन धावकों में सीरम क्रिएटिनिन की मात्रा में एक क्षणिक वृद्धि पैदा हुई है जो सिस्टैटिन-सी के समानांतर तीव्र गति से बढ़ते हुए गुर्दे को ज़ख़्मी करने का कारण बनती है और न्यूट्रोफिल के साथ बढे हुए जिलेटिनेज से जुड़े लिपोकेलिन, गुर्दे में घातक चोट का कारण बनते हैं। अध्ययन में पाए सभी बायोमार्कर बढ़ने  के 24 घंटे बाद तक ही सामान्य हो पाए थे। इन आंकड़ों से ये भी पता चला कि गुर्दों में ज़ख्मों के साथ गुर्दों की निस्पंदन प्रक्रिया में बदलाव भी मैराथन दौड़ने के तनाव के साथ ही हुआ। शारीरिक क्षति के ये संकेत आमतौर पर अपने आप दूर हो जाते हैं, लेकिन जब हृदय बार-बार अत्यधिक शारीरिक तनाव से गुजरता है, तो इस अस्थायी क्षति से हृदय की रीमॉडेलिंग हो सकती है और इससे गंभीर शारीरिक बदलाव जैसे हृदय की दीवारों और हृदय के ऊतकों पर निशान पड़ सकते हैं। आगे के अध्ययन बताते हैं कि ये प्राथमिक रूप से ऐसे परिस्थितिजन्य साक्ष्य हैं जो “चरम व्यायाम मानसिकता” की वज़ह से हैं। इस मानसिकता का आधार ये है कि व्यायाम की तीव्रता बढ़ने से स्वास्थ्य सम्बन्धी जोखिमों की तीव्रता कम होती है, लेकिन जब कोई व्यक्ति लगातार व्यायाम की सही सीमा से परे व्यायाम करता है तो ये स्वास्थ्य लाभ काफी हद तक समाप्त हो जाते हैं। सबक्लिनिकल और एथेरोस्क्लोरोटिक कोरोनरी धमनी ह्रदय रोग (सीएडी) के साथ-साथ संरचनात्मक हृदय संबंधी असामान्यताएं और ह्रदय धड़कन की लय में गड़बड़ी भी ऐसे कई अति व्यायाम/ जिम की अति करने वाले एथलीटों में मौजूद पाई जाती हैं. इसीलिए हृदय रोग सम्बन्धी जोखिम को कम करने के लिए उपयुक्त एवं उचित व्यायाम की आवश्यकता है। इस बात के और भी प्रमाण हैं कि उच्च तीव्रता वाले व्यायाम पहले से हृदय रोग वाले व्यक्तियों में अचानक हृदय गति रुकने या अचानक हृदय अपघात द्वारा मृत्यु के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। व्यायाम अथवा जिम की अति, हृदय धड़कन लय सम्बन्धी विकारों के जोखिम को भी बढ़ा सकता है, खासकर उन लोगों में जिनके शरीर में पहले से ही ऐसे जोखिम कारक मौजूद हैं।

चूंकि उच्च तीव्रता वाले व्यायामों की अति की मानसिकता भी एक विशिष्ट सामाजिक सोच के परिणामस्वरूप बन रही है इसलिए उसी सामाजिक सोच के बनने की प्रक्रिया को समझने की ज़रूरत है जिससे पता लगे कि लोग अपने स्वास्थ्य को भी खतरे में डालने वाले असामान्य, कृत्रिम तरीके से व्यायाम की अति क्यों कर रहे हैं।

व्यायाम की अति और पूंजीवाद के साथ इसका संबंध

जिस व्यवस्था में हम रह रहे हैं, उसे पूंजीवाद कहते हैं और ये प्रतिस्पर्धा पर आधारित है। व्यवसायिक फर्म मुनाफे के लिए प्रतिस्पर्धा करती हैं। चूंकि मुनाफे की मात्रा बाजार में हिस्सेदारी पर निर्भर करती है, इसलिए कंपनी की बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए हमेशा गला काट प्रतियोगिता होती है। उसी तरह व्यक्ति भी इस व्यवस्था के तहत प्रतिस्पर्धा करते हैं। रोजगार पाने के लिए श्रमिक आपस में प्रतिस्पर्धा करते हैं। कलाकार और खिलाड़ी भी अपने अस्तित्व के लिए आपस में प्रतिस्पर्धा करते हैं। यह विचार कि व्यक्ति को मन के साथ-साथ शरीर का भी व्यायाम करना चाहिए, पूंजीवाद से बहुत पहले, कम से कम कुछ सहस्राब्दियों से अस्तित्व में है लेकिन पूँजीवाद ने इस विचार को अपनी आवश्यकता के अनुसार ढाल लिया है। स्वाभाविक रूप से फिटनेस का सवाल भी प्रतिस्पर्धा में कामयाबी का एक बड़ा हथियार बन गया है।

शारीरिक फिटनेस और खेल पर ध्यान देने वाली संस्थाएं बचपन से ही संभावित उम्मीदवारों की तलाश में रहती हैं। अक्सर बच्चे भविष्य में बड़ा बनने और पैसा कमाने की कहानियां सुनते हुए बड़े होते हैं। बच्चों को अपने शरीर और खेल प्रतिभा से उस उच्च मापदंड को पूरा करने के लिए अधिकतम शारीरिक व्यायाम करने के लिए उकसाया जाता है। व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा की तीव्रता भी इस स्तर पर पहुँच चुकी है कि उसमें आगे निकलने के लिए रुग्ण और अस्वस्थ तरीकों का इस्तेमाल करने में भी संकोच नहीं किया जाता। कई बार कृत्रिम खाद्य पदार्थ और हार्मोन सहित अन्य रसायन और स्टेरॉयड जैसे खतरनाक पदार्थ तत्काल परिणाम प्राप्त करने के लिए उपयोग किए जाते हैं। तीव्र प्रतिस्पर्धा की पृष्ठभूमि में इन खतरनाक तरीकों का इस्तेमाल करने के लिए बच्चों पर अत्यधिक मानसिक दबाव डाला जाता है।

कहानी का एक अन्य पहलू वर्तमान पूंजीवादी समाज में पुरुषत्व/ मरदानगी का नग्न चित्रण भी शामिल है। फिटनेस उद्योगों और संस्थानों द्वारा ऐसी लफ्फाजी अक्सर पुरुषों और महिलाओं में मौजूद मानसिक असुरक्षा से लाभ कमाने के लिए की जाती है और उत्पादों की मार्केटिंग करते हुए उन्हें ऐसे सेक्सिस्ट सौंदर्य मानकों से दृढ़ता से जोड़ देती है जो फिटनेस से हांसिल होंगे ऐसा बताया जाता है। फिटनेस विकसित करने की प्रक्रिया को स्थापित करने के लिए विज्ञापन एजेंसियां ​​रोल-मॉडल बनाती हैं। इस प्रक्रिया में, पूंजीवादी संस्थाओं द्वारा पुरुष शरीर को एक विशेष मर्दाना/ मज़बूत मांस पेशियों वाला आकार दिया जाता है, दूसरी ओर महिलाओं के शरीर को नृत्य करने वाले कोमल शरीर की तरह परोसा जाता है। इस तरह स्वास्थ्य एवं व्यायाम के मुद्दे को पुरुषत्व और पुरुष कामुकता से किस तरह जोड़ दिया जाता है, आइए हम उस पर गौर करें।

फिटनेस उद्योग में पुरुष व्यायाम के स्थान, व्यायामशालाओं का चुनाव अक्सर पुरुषत्व के विचार को आगे बढ़ाने की ज़हनियत के साथ ही किया जाता है। ये जिम अक्सर, दिन हो या रात, खिड़की रहित और ध्वनिरोधी बनाए जाते हैं। लोग वहाँ अपने ख़ाली वक़्त, आराम करने के समय में ऐसे काम करने के लिए जो अत्यंत थकाने वाले होते हैं। यहीं पर एकदम भावना शून्य तरीक़े से पूरी निर्ममता के साथ यौन आकर्षण की भावना को भड़काया जाता है। ये संस्थान अक्सर निजी मालिकाने वाले होते हैं, और अक्सर उपयोग करने के लिए अत्यंत महंगे होते हैं। दूसरी बात, अगर लोग जोड़े या समूहों में भी जिम जाएँ तो भी वे वहां जो कदम उठाते हैं वे अनिवार्य रूप से व्यक्ति केंद्रित ही होते हैं। कोई भी व्यक्ति वजन उठाने के व्यायाम में भी एक दूसरे के साथ सहयोग नहीं कर सकता।

युवा पुरुषों में एक भावना ठूंस दी गई है कि यदि उनके पास फूली हुई मांसपेशियां और दूर से नज़र आने वाले उभार/ एब्स नहीं हैं तो ये बहुत शर्म की बात है और उन्हें बाहर नहीं निकलना चाहिए। कई लोग अति व्यायाम/ जिम जाने वाले लोगों की संख्या में हो रही मौजूदा वृद्धि को तनाव या चिंता के परिणाम के रूप में भी देखते हैं। समाज में मौजूद महिलाओं और नारीवाद के बारे में नित हो रहे शोध के साथ ही पिछले दशक में पुरुषों और मर्दानगी पर भी इस दिशा में अत्यधिक जोर दिया गया है। जिस तरह नारीवाद ने उन तरीकों की आलोचना और जांच की है जिसमें महिलाओं और स्त्रीत्व को एक विकृत नीयत से एक विशिष्ट तरीक़े से वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, उसी तरह मर्दानगी के महिमामंडन पर सामाजिक डिबेट चलाए जाने की ज़रूरत है।

महिलाओं की असुरक्षा का उपयोग हमेशा उत्पादों को बेचने के लिए किया जाता रहा है. हाल के दिनों में सांस्कृतिक और आर्थिक ताकतों की मिलीभगत को देखते हुए जिसने लिंग और पहचान में विभिन्न परिवर्तनों को अत्यधिक बढाया है, आज पुरुषों की आत्म-मुग्ध छवियां भी ऐसी मार्केटिंग का वाहन बन गई हैं, जिसके माध्यम से उत्पादों को उच्च लाभ के लिए बेचा जा रहा है. इसके अलावा, फिटनेस और खेलों से संलग्न हो उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए नवयुवकों में मौजूद  दबाव के कारण, कमाई का ये एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बन जाता है जिसमें मर्दानगी वाली छवियां गढ़ी जाती हैं, परिभाषित की जाती हैं और प्रस्थापित की जाती हैं। इसके अतिरिक्त, इस तरह की भागीदारी के माध्यम से प्राप्त की गई स्थिति पुरुषों में तीव्र प्रतिस्पर्धा और प्रभुत्व के लिए एक सामाजिक ज़रूरत बनाने का काम करती है और लड़कों को बहुत कम उम्र में ही सिखा देती है कि ऐसा व्यवहार मर्दानगी हांसिल करने के लिए ज़रूरी शर्त है।

आधुनिक युग में पूंजीवाद में उपभोग की आवश्यक वतुओं को खरीदने का रिवाज़ इस तरह बना दिया गया है कि ख़रीद ज़रूरत के मुताबिक़ ना होकर उस वस्तु के प्रति ख़रीदार के ज़हन में बन चुकी काल्पनिक छवि से निर्धारित हो रही है (जेगर 2000).  उत्पादों के साथ पहचान के इस निरंतर संबंध को बनाए रखने के लिए, उपभोक्ताओं का अपने जीवन के किसी पहलू के बारे में इसी तरह निरंतर असुरक्षित बने रहना ज़रूरी है। इसी का नतीज़ा है कि विज्ञापन उद्योग आज पूंजीवाद की एक ज़रूरी जनसंपर्क शाखा बन गया है, जिसके तहत माल को एक उत्पाद मात्र बेचने के लिए विज्ञापित नहीं किया जाता है (जैगर, 2000; झल्ली, 1990) बल्कि वस्तुओं  और सेवाओं को एक विशिष्ट सामाजिक पहचान के साथ नाभिनाल बद्ध कर दिया गया है और उसके अनुरूप समाज में उपभोग की एक अंतहीन भूख की ज्वाला को लगातार धधकता रखने के लिए उसमें विज्ञापनों का इंधन लगातार झोंका जा रहा है।

इस अर्थ में, विज्ञापन उद्योग द्वारा मांग को लगातार बढ़ाया जा रहा है, क्योंकि वस्तुओं की आक्रामक मार्केटिंग समाज में पैदा की जा चुकी काल्पनिक ज़रूरतों के साथ जोड़कर की जा रही है। इसीलिए विशिष्ट लिंग के मनुष्यों में उस लिंग की पहचान बन चुके उत्पादों को विज्ञापित कर बेचा जा रहा है। मार्केटिंग के इस भयावह तंत्र के केंद्र में है लिंग की विशिष्ट, काल्पनिक पहचान से जोड़ा जा चुका एक मानव शरीर.

इस तरह हम पाते हैं कि जिन उत्पादों को पुरुषों के लिए विज्ञापित किया जाता है, वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, अक्सर मर्दानगी की वर्चस्ववादी धारणाओं को प्रस्थापित करते हैं और उनका महिमामंडन करते हैं। इस तरह, मर्दानगी की मार्केटिंग और बिक्री की जा रही है। एक पूंजीवादी, पितृसत्तात्मक समाज के भीतर, पुरुषत्व का वह रूप जिससे सबसे अधिक लाभ कमाए जाने की संभावना है, वह है मर्दवादी प्रभुत्व, नियंत्रण, हिंसा, आदि के साथ मर्दानगी की पाशविक धारणाओं को बढाने वाला।

विज्ञापन उद्योग द्वारा बनाई गई यह विशेष मर्दाना छवि युवा आबादी के मन में लगातार मजबूत हो रही है। यह वह स्थिति है जिसमें लोग विज्ञापनों में देखे गए विशेष प्रकार के मर्दाना शरीर के निर्माण के लिए अत्यधिक व्यायाम के लिए तत्पर रहते हैं। समस्या का एक और पहलू जो ध्यान में रखा जाना चाहिए वह यह है कि पूंजीवाद सभी को अवसर देता है; लेकिन उनकी क्रय क्षमता के अनुसार। विज्ञापनों के माध्यम से युवा मन के भीतर कितनी भी मजबूत मर्दाना छवि बन चुकी हो, उक्त व्यक्ति को शरीर के विकास की गुंजाइश उसकी क्रय शक्ति के अनुरूप ही मिलनी है। अधिकांश मामलों में बचपन में आर्थिक रूप से यह संभव नहीं हो पाता है लेकिन बढ़ती आय के साथ मध्यम वर्ग को नौकरियों के माध्यम से वह अवसर प्राप्त हो जाता है और विज्ञापन में दिखाई देने वाला शरीर जो ज़हनियत में पहले से मौजूद है उसे पाने की ललक बढ़ जाती है। इसके परिणामस्वरूप, लोग अपनी उम्र के 30 वें और 40 वें दशक में व्यायाम की अति  करने के लिए तैयार हो जाते हैं। यह स्थिति हृदय की मांसपेशियों को सर्वाधिक नुकसान पहुँचाने के लिए बिलकुल अनुकूल है क्योंकि हृदय का कार्य-भार अचानक बहुत ज्यादा बढ़ जाता है और ये परिस्थिति जान लेवा बन जाती है।

संक्षेप में, हकीक़त ये है कि व्यायाम की अति से, संबंधित युवाओं की दिल का दौरा पड़ने से हो रही मौतों में वृद्धि का, शारीरिक के साथ साथ एक सामाजिक कारण भी मौजूद है। ये सामाजिक घटक उस पूंजीवाद द्वारा बनाया और स्थापित किया गया है, जिस व्यवस्था में हम जी रहे हैं। पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा पैदा की जा रही सांस्कृतिक सड़ांध पर सवाल उठाए बिना, इस मामले में हमारे लिए उचित अर्थ में आगे बढ़ना संभव नहीं है।