महान नवम्बर क्रांति की याद में

महान नवम्बर क्रांति की याद में

November 14, 2021 0 By admin

रूस के मेहनतक़शों ने जब स्वर्ग पे धावा बोला था

संपादकीय, नवंबर 2021


बुधवार, 7 नवम्बर, 1917, दोपहर 12 बजे, रूस की तत्कालीन राजधानी पेत्रोग्राद में नेवा नदी के किनारे स्थित पीटर-पॉल किले की तोप गरज़ उठी और रूस के मज़दूरों, मेहनतक़श किसानों और सदियों से दबे कुचले मज़लूमों ने सत्ता के प्रतीक, शीत महल पर निर्णायक धावा बोल दिया। सत्ता के हर केंद्र जैसे टेलीफोन-टेलीग्राफ एक्सचेंज, पोस्ट ऑफिस, स्टेट बैंक को तो नवम्बर 6 और 7 की रात और 10 बजे सुबह तक ही बोल्शेविक रेड गार्ड्स ने अपने क़ब्ज़े में ले लिया था और वहाँ लाल झंडे लहरा रहे थे। अपने महान नेता, शिक्षक, पथ प्रदर्शक, व्लादीमिर इलिच उल्यानोव, लेनिन का आदेश होते ही, मज़दूरों-किसानों, बोल्शेविक रेड गार्डस की हथियारबंद टुकड़ियाँ और हजारों शोषित-पीड़ित लोग, हाथ में जो मिला उसे लेकर स्मोल्नी की सडकों पर उतर गए और अचानक एक अजेय सेना में बदल गए। पूंजीपतियों-साम्राज्यवादियों की ताबेदार, दमनकारी केरेंसकी की तथाकथित अंतरिम सरकार की सारी तैयारियां सर्वहारा वर्ग की हुंकार के सामने रेत के महल जैसे बिखर गईं। ‘अस्थाई’ सरकार के भाड़े के सैनिक अपनी जान बचाकर भाग गए। सचमुच दुनिया हिल उठी। ये क्या हो गया? सत्ता पर तो हमेशा ‘प्रभु’ अमीर, जिल्ले इलाही, जेंटलमेन धन पशु ही बैठते आए हैं, ये मैले- कुचैले, पसीने की बदबू मारते कपडे पहने, बगैर नहाए मज़दूरों का सत्ता से क्या काम?? अमेरिकी कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में से एक, प्रतिष्ठित पत्रकार जॉन रीड, इस ऐतिहासिक घड़ी के चश्मदीद गवाह थे। वे अपनी कालजयी पुस्तक ‘दस दिन जब दुनिया हिल उठी’ में लिखते हैं कि सत्ता पर क़ब्ज़ा हो जाने के बाद भी कैसे स्टेट बैंक के कर्मचारियों ने स्मोल्नी के कमिसार का हुक्म मानने से मना कर दिया था और हथियार बंद बोल्शेविकों को भी सरकारी काम के लिए पैसे का भुगतान करने से मना कर दिया था, ‘ऐसे लोग भी कहीं सरकारी अफसर होते हैं’। बोल्शेविक रेड गार्ड्स को राइफल की गोली से तिज़ोरी का ताला तोड़ना पड़ा था!! दुनियाभर के लुटेरे सत्ताधीशों को लगा ये कोई ख़्वाब है, एक डरावना सपना, दू:स्वप्न, ये सच नहीं हो सकता, जल्द ही बिखर जाएगा। हक़ीक़त इतनी कड़वी भी हो सकती है, उनको यकीन नहीं हो पा रहा था। ये एक युगांतरकारी घटना थी, मानो, घुप्प अँधेरे में अचानक कोई तेज़ रोशनी जल गई हो। एक ऐसी घटना, जो प्रकृति के अपने अन्तर्निहित नियम, द्वंद्वात्मक वस्तुवाद के तहत पल-पल बदलते समाज के उस मुक़ाम पर पहुँचने पर घटती है जब उसे एक युगांतरकारी छलांग लेनी होती है। ठीक जैसे शांत रूप से गरम होते पानी का तापमान एक-एक डिग्री बढ़ता जाता है और अचानक 90 डिग्री से आगे बढ़ते ही पानी गुड़गुड़ाने लगता है, उछलने लगता है और अचानक गुणात्मक परिवर्तन करते हुए भाप बन जाता है। बिलकुल उसी तरह, रोज़गार मांगने, अपनी यूनियन बनाने, वेतन-भत्ते बढ़वाने, अपनी मर्यादा, सम्मान के लिए हर रोज़ ज़ुल्मो दमन का शिकार होने वाला सर्वहारा वर्ग क्रांतिकारी राजनीतिक चेतना से लैस हो, अपनी शक्ति को पहचानता है और उनके श्रम की चोरी कर अपनी तिजोरियां भर रहे लुटेरों पर टूट पड़ता है। ये फैसलाकुन जंग किसी वेतन-भत्ते, बोनस-बीमे के लिए नहीं बल्कि सत्ता में काबिज़ लुटेरों को बलात सत्ता से खींच खुद सत्ता हांसिल करने के लिए होती है। लुटेरे जब ख़ुद लुटते हैं। उस दिन कोई समझौता नहीं होता, कोई पंचायत नहीं बैठती, किसी आयोग-समिति का छलावा बर्दाश्त नहीं किया जाता, किसी  ‘बीच-बचाव के रास्ते’ को संज्ञान में नहीं लिया जाता, उस दिन फैसला सरे आम होता है और आर-पार होता है। रूस में वो घड़ी आ चुकी थी। अत्यंत पिछड़े और भयानक रूप से दमित देश, रूस का सर्वहारा, अपने महान नेता लेनिन के नेतृत्व में इतिहास के उस मुक़ाम पर था जिसे पश्चिमी यूरोप का अगुवा सर्वहारा हांसिल नहीं कर पाया था। उस दिन, मेहनतकश अवाम अपना नया इतिहास गढ़ रहा था।

स्वर्ग पर पहले हमले का गौरव पेरिस कम्यून के जियालों के नाम ही रहेगा

मज़दूरों-मज़लूमों, मेहनतक़शो द्वारा लुटेरे शासक वर्ग को सत्ता से बलात खींचकर, उनके सारे टीन- टप्पर को उखाड़ फेंकते हुए सत्ता हांसिल करने की, वैसे, ये इतिहास की पहली घटना नहीं थी। पेरिस के वीर कोम्युनार्ड्स ये कीर्तिमान 1917 से 46 साल पहले सन 1871 में ही स्थापित कर चुके थे। मशहूर-ओ-मारुफ़ पाकिस्तानी शायर शायर फैज़ अहमद फैज़ ने भी क्या खूब लिखा है;

यूँ ही हमेशा उलझती रही है ज़ुल्म से खल्क

न उनकी रस्म नई है, न अपनी रीत नई

यूँ ही हमेशा खिलाये हैं हमने आग़ में फूल

न उनकी हार नई है न अपनी जीत नई

पेरिस के उन बहादुर कोम्मुनार्ड्स ने, जिनके सामने ऐसी किसी लड़ाई की मिसाल नहीं थी, जो एक भयंकर चुनौती वाली राह पर बिलकुल पहली बार चल रहे थे, अदम्य सहस का परिचय देते हुए 18 मार्च 1871 को फ़्रांस के नेशनल गार्ड्स को आमने-सामने की लड़ाई में परास्त कर फ़्रांसिसी सत्ता के गढ़, बस्तिले पर धावा बोला था और पेरिस के प्रसिद्ध होटल, दे विल्ले पेरिस में दुनिया की पहली मज़दूर सत्ता स्थापित की थी। उस ऐतिहासिक जंग के गवाह  खुद सर्वहारा के प्रथम महान शिक्षक कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स थे। 72 दिन का वो मज़दूर राज, पहला, वर्जिन और मासूम प्रयोग था जिससे दुनिया दंग रह गई थी। कोमुनार्ड्स की दिलेरी बे-मिसाल थी लेकिन बुर्जुआ वर्ग का काईयांपन, गद्दारी और सत्ता की ज़हरीली जड़ें किस तरह समूचे सत्ता तंत्र में रची-बसी होती हैं, इस सच्चाई को समझने में हुई चूक और मेहनतक़श और लड़ाकू किसानों को सत्ताधारी लुटेरे पूंजीपति वर्ग के खेमे से दूर कर अपने कैंप में ला पाने में हुई उनकी विफलता उन्हें बहुत भारी पड़ी। मज़दूरों को कुचलने के लिए पागल कुत्तों की तरह आपस में लड़ रहे फ़्रांसिसी और जर्मन लुटेरे कैसे रातों रात एक हो गए, मज़दूरों ने हथप्रभ हो देखा। इस फैसलाकुन जंग में हुई कोई भी ग़लती जान लेवा ही होती है। 28 मई 1871 को पासा पलट गया जिसकी क़ीमत मज़दूरों को अक्षरस: अपने खून से चुकानी पड़ी। कोम्युनार्ड्स द्वारा शत्रु पूंजीपति वर्ग के प्रति दिखाई दयालुता का बदला इस तरह लिया गया कि मज़दूरों से वापस सत्ता हांसिल करने के बाद जल्लाद थिएर्स ने 20,000 से अधिक मज़दूरों और सेना के 750 जवानों को जिन्होंने मज़दूरों का साथ दिया था, गोली से उड़ा दिया गया। पेरिस की सड़कें मज़दूरों के खून से सराबोर थीं। कुल 38,000 मज़दूरों को गिरफ्तार किया गया, उनमें से भी अधिकांश को फांसी दी गई और 7,000 मज़दूरों को देश निकाला दे दिया गया। कार्ल मार्क्स ने जो, हालाँकि, कोम्युनार्ड्स द्वारा अपनाई गई रणनीति से सहमत नहीं थे लेकिन लड़ाई छिड़ जाने पर, इस अनोखे ऐतिहासिक प्रयोग के महत्त्व को रेखांकित करते हुए कहा था, ‘फ़्रांस के मज़दूरों ने स्वर्ग पर धावा बोला है, उनका मार्गदर्शन भी किया और साथ ही उस तारीखी जंग से सीख लेते हुए उन्होंने कम्युनिस्ट घोषणापत्र में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया था कि सर्वहारा वर्ग, पूंजीपति वर्ग से सत्ता छीन लेने के बाद बने-बनाए शासन तंत्र का इस्तेमाल नहीं कर सकता। इसे पूरी तरह ध्वस्त करते हुए उसे अपना वैकल्पिक तंत्र स्थापित करना होगा। लेनिन ने पेरिस कम्यून की घटना का बहुत बारीकी से अध्ययन किया और कार्ल मार्क्स द्वारा लिखे महत्वपूर्ण दस्तावेज़ ‘फ़्रांस में गृह युद्ध’ की एक- एक लाइन की हर संभावित व्याख्या को समझा, अपनाया और सुनिश्चित किया कि पेरिस कम्यून में कोम्युनार्ड्स की कोई भी कमी या भूल नवम्बर क्रांति में ना रह जाए। रूस की 1905 की असफल क्रांति का मूल्यांकन करते हुए लेनिन, उस पराजय और पेरिस कम्यून की विफलता का मूल्यांकन करते हुए 1908 में लिखते हैं,

“हालाँकि मज़दूर वर्ग के ये शानदार विद्रोह कुचल दिए गए लेकिन आगे और विद्रोह होंगे और उनसे मुकाबले में सर्वहारा वर्ग के दुश्मनों की सभी शक्तियां प्रभावहीन हो जाएंगी और उनमें से समाजवादी सर्वहारा पूरी तरह अजेय होकर निकलेगा”।

कार्ल मार्क्स ने भविष्य में होने वाली सर्वहारा क्रांतियों के बारे में लिखा था कि औद्योगिक रूप से विकसित देशों में ये पहले घटित होंगी क्योंकि औद्योगिक विकास, सर्वहारा को ज्यादा सचेत और संगठित बनाता है और इस तरह वो अपनी क़ब्र खोदने वाली सेना को तैयार करता जाता है। बाकुनिन की आलोचना करते हुए मार्क्स लिखते हैं,

“समाज में गुणात्मक परिवर्तन लाने वाली क्रांतियाँ आर्थिक विकास की ऐतिहासिक परिस्थितियों से बंधी हुई होती हैं। अर्थात ये तब ही संभव है जहाँ पूंजीवादी विकास और औद्योगिक सर्वहारा एक विशिष्ट मुकाम हांसिल कर चुका हो।”

इसीलिए उनका अंदाज़ था कि वैसा पहले इंग्लॅण्ड या फ़्रांस में होगा क्योंकि वहाँ पूंजीवादी विकास और औद्योगिक सर्वहारा अन्य देशों के मुकाबले संख्या और संगठन दोनों दृष्टि से बाकी यूरोपियन देशों से कहीं आगे है। मार्क्सवाद को जड़ सूत्र की तरह कंठस्त करने वाला नेता तो रूस में समाजवादी क्रांति की संभावना को भी अपने ख़याल में ना लाता क्योंकि वहाँ तो पूंजीवाद सारे यूरोप में सबसे पिछड़ा हुआ था। वहाँ तो औद्योगिक सर्वहारा तादाद में बहुत ही कम था। वहाँ तो पूंजीवाद को विकसित करने के लिए नई आर्थिक नीति, सर्वहारा क्रांति संपन्न होने के दो साल बाद लाई गई थी। मार्क्सवाद को तोता रटन्त की तरह रट्टा मारने वाला नेता तो कहता कि रूस में तो समाजवादी क्रांति अभी कई पीढियों दूर है। अभी तो हम प्रबोधन काल में जी रहे हैं। अभी तो हम खन्दकें खोदेंगे, क्रांति तो आने वाले पीढियां करेंगी!! विश्व सर्वहारा के महान नेता और शिक्षक लेनिन ने, लेकिन, मार्क्सवाद को उसके सार तत्व और ‘कार्य की सही दिशा’तय करने वाले मार्ग दर्शन सिद्धांत की तरह समझा था इसीलिए वे उसे समृद्ध भी कर पाए, विकसित कर पाए। उन्होंने अपने गहन अध्ययन से बताया कि पूंजीवाद अपने विकास क्रम में अपनी अगली और अन्तिम अवस्था साम्राज्यवाद को प्राप्त कर चुका है, जिसमें ना सिर्फ़ पूंजी का केन्द्रीकरण और संग्रहण भयानक होकर इजारेदार दैत्याकारी वित्तीय पूंजी की अवस्था को प्राप्त हो चुका है बल्कि पूंजीवाद के असमान और अराजक विकास का अन्तर्निहित नियम और भी तीव्र हो चुका है। ऐसी परिस्थिति में इसे वहाँ से तोड़ना आसान होगा जहाँ ये कड़ी सबसे कमजोर है। इस मूल्यांकन की खास बात जो लेनिन को सचमुच महान बनाती है, उनका क़द बुलंद करते हुए उन्हें ‘दुनियाभर के क्रांतिकारी नेताओं का नेता’ प्रस्थापित करती है, वो ये है कि ऐसा प्रतिपादित करते वक़्त उनका लब्बो-लुआब ये नहीं था कि ‘देखो मार्क्स को इतना भी नहीं समझा’, बल्कि ये था कि ये ही है आज का मार्क्सवाद। पूंजीवादी-औद्योगिक विकास से मार्क्स का तात्पर्य यही है, पूंजी का साम्राज्यवादी स्वरूप अख्तियार कर लेना। रूस औद्योगिक रूप से अत्यंत पिछड़ा हुआ देश है, यहाँ औद्योगिक सर्वहारा अभी शोषित वर्ग में बहुमत में नहीं है लेकिन यहाँ सारे शोषित-पीड़ित वर्ग में क्रांतिकारी चेतना बाक़ी यूरोपियन देशों में सबसे ज्यादा है और सबसे अहम बात, यहाँ जनता का अपना वैकल्पिक तंत्र, सोविएट, मौजूद है जो किसी भी दूसरे देश में नहीं है। ऐसी परिस्थिति में रूस में क्रांति को टालना भयंकर भूल होगी, घोर मार्क्सवाद-विरोधी कृत्य होगा। इतना ही नहीं एक कुशल वैज्ञानिक, एक सर्जन की भांति क्रांति की परिस्थितियां क्या होती हैं, उन्होंने ये भी प्रतिपादित किया। क्रांति क्या होती है, ये कैसे संपन्न होती है, वस्तुगत परिस्थितियां क्रांति के लिए परिपक्व हो चुकीं ये कैसे पहचाना जाए; इन सभी प्रश्नों को एकदम सटीक और तर्क़पूर्ण तरीक़े से समझाते हुए लेनिन, 1915 में ‘दूसरे कम्युनिस्ट इंटरनेशनल का पतन’ विषय पर अपने महत्वपूर्ण लेख में एक वैज्ञानिक की तरह समझाते हुए लिखते हैं।

“मार्क्सवादी के लिए यह निर्विवाद है कि क्रांतिकारी परिस्थिति के बिना क्रांति असंभव है; इसके अलावा, ऐसा भी  नहीं है कि हर  क्रांतिकारी परिस्थिति क्रांति संपन्न कर दे। सामान्यतया, एक क्रांतिकारी परिस्थिति के लक्षण क्या हैं? यदि हम निम्नलिखित तीन प्रमुख लक्षणों की मौजूदगी के संकेतों को रेखांकित करें तो निश्चित रूप से हम गलत नहीं होंगे: (1) जब शासक वर्गों के लिए बिना किसी परिवर्तन के अपना शासन बनाए रखना असंभव हो रहा हो; जब "उच्च वर्गों" के बीच भी किसी न किसी रूप में संकट मौजूद हो, शासक वर्ग की नीतियों में ऐसा संकट मौजूद हो जिससे शासक वर्ग में एक दरार पैदा हो रही हो, जिसमें से उत्पीड़ित वर्गों का असंतोष और आक्रोश फूट पड़ रहा हो। एक क्रांति के क़ामयाब होने के लिए आमतौर पर इतना ही काफी नहीं है कि "निम्न वर्ग” ही पहले की तरह नहीं रह पा रहा है बल्कि "उच्च वर्ग " के लिए भी मौजूदा तरीक़े से जीना संभव ना हो पा रहा हो; (2) जब शोषित-उत्पीड़ित वर्गों की पीड़ा और अभाव सामान्य से अधिक तीखे हो गए हों; (3) जब, उपरोक्त सभी कारणों के परिणामस्वरूप, जनता की राजनीतिक हलचल में काफी वृद्धि हो चुकी हो, जो जनता "शांति के समय" में बिना कोई शिकायत किए लुटने की अनुमति देती रहती है, वो इस अशांत समय में, संकट की परिस्थितियों में "उच्च वर्गों" से स्वतन्त्र किसी ऐतिहासिक कार्रवाई के लिए खिंची चली जा रही हो।”

क्रांति का लक्ष्य लेनिन के दिमाग से कभी भी ओझल नहीं हुआ। फरवरी क्रांति, 8 मार्च 1917 को फूट पड़ी थी लेकिन उसे फरवरी क्रांति इसलिए कहा गया क्योंकि उस समय रूस में जूलियन कैलेंडर इस्तेमाल होता था जो दुनिया भर में प्रचलित ग्रेगोरियन कैलेंडर से 13 दिन पीछे रहता था। अत: 8 मार्च, वहाँ 24 फरवरी हुआ, जैसे 7 नवम्बर को शुरू हुई नवम्बर क्रांति को अक्तूबर क्रांति भी कहा जाता है क्योंकि जूलियन कैलेंडर के मुताबिक़ वो 25 अक्तूबर को शुरू हुई थी। 1918 के बाद रूस में भी ग्रिगोरियन कैलेंडर ही अपना लिया गया था।    फ़रवरी क्रांति किसी क्रांतिकारी पार्टी द्वारा संगठित क्रांति नहीं थी बल्कि, ज़ार की निरंकुश तानाशाही और प्रथम विश्व युद्ध के दरम्यान रूस में फैली भयंकर भुखमरी और अभाव ने लोगों को विद्रोह करने को विवश कर दिया और सारे देश में दंगे और शासन के विरुद्ध ऐसी आंधी उठी जो खूँख्वार ज़ार निकोलस द्वतीय की सदियों से चली आ रही भयंकर दमनकारी निरंकुश सत्ता को बहा ले गई। रोटी की भूख से उठने वाली ज्वाला आश्वासनों से नहीं बुझा करती और रूस के दबे कुचले लोगों ने ज़ार की एक ना सुनी। लेकिन, जैसा कि स्वत:स्फूर्त आन्दोलनों में अक्सर होता है, ज़ालिम शासक वर्ग जब घिर जाता है तो वो एक आखरी पैंतरा ज़रूर खेलता है जिसके तहत वो खुद कुर्सी खाली कर देता है लेकिन अपनी जगह अपने गुर्गों को प्रस्थापित कर देता है।  रूस में भी वैसा ही हुआ। ज़ार के पिट्ठू मिल्युकोव और गुच्कोव जैसों के द्वारा ‘पूंजीवादी जनवाद’ तो स्थापित हो गया लेकिन ज़ारशाही की साम्राज्यवादी युद्ध नीतियों में कोई खास बदलाव नहीं आया। उस वक़्त लेनिन स्वित्ज़रलैंड में थे, इस टूटी-फूटी क्रांति ने ही, लेकिन, उनके रूस वापस लौटने का रास्ता खोल दिया। वे 3 अप्रैल को वापस रूस आ गए और क्रांतिकारी शक्तियों को संगठित-संचालित करने, नेतृत्व प्रदान करने के काम से सीधे जुड़ गए। रूस के क्रांतिकारी वर्ग की आगे की राह क्या हो, अपनी ऐतिहासिक ‘अप्रैल थीसिस’ में उन्होंने रणनीति स्पष्ट की। उन्होंने स्पष्ट किया कि जनवादी क्रांति जैसी भी है, संपन्न हो चुकी है। क्रांति का पहला चक्र पूरा हुआ और रूस अब सर्वहारा क्रांति की अवस्थिति में दाखिल हो चुका है क्योंकि सत्ता रूस के पूंजीपति वर्ग के हाथों में पहुँच चुकी है। उन्होंने ये नहीं कहा कि सर्वहारा वर्ग को अब बुर्जुआ वर्ग के साथ मिलकर स्वस्थ जनवाद लाने की लड़ाई लड़नी है जैसा कि हमारे देश में 1947 में अंग्रेजों द्वारा भारतीय पूंजीपतियों को सत्ता हस्तांतरित होने के बाद की परिस्थितियों का मूल्यांकन करते हुए कई क्रांतिकारी ये ग़लती आज तक करते चले जा रहे हैं और जाने कब तक करते चले जाएँगे कि अभी तो हम जनवादी क्रांति वाली स्थिति में ही हैं और अभी तो यहाँ का पूंजीपति दलाल पूंजीपति ही है इसलिए उसे साथ लेकर पहले स्वस्थ- सुन्दर -सलौना जनवाद लाया जाएगा!! 21 अप्रैल 1917 को रुसी मेहनतकशों ने, रोमानोव ज़ार के पिट्ठुओं गुच्कोव-मिल्युकोव की सत्ता के ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया और उस सत्ता को भी उखाड़ फेंका। अब उसकी जगह मेंशेविकों और समाजवादी क्रांतिकारियों की मिली जुली सत्ता प्रस्थापित हुई जिसमें सोविएट्स की शक्ति बढ़ गई। इसके बाद भी लेनिन ने स्पष्ट कहा कि सत्ता के चरित्र में कोई अंतर नहीं आया है। बोल्शेविकों का इस सत्ता में भागीदार होने का सवाल ही पैदा नहीं होता क्योंकि बोल्शेविकों को तो इस सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए अब समाजवादी क्रांति के काम में लगना है। जनवादी क्रांति संपन्न हो ही चुकी है और जनवादी क्रांति के अधूरे कार्यों को अब सर्वहारा के अधिनायकत्व वाली समाजवादी सत्ता में ही पूर्ण किया जाएगा। पूंजीवाद, जनवाद को किसी सामाजिक कल्याण के नेक मक़सद से नहीं लाता बल्कि वो ऐसा अपनी आर्थिक आवश्यकताओं के लिए ही करता है। इसीलिए प्रतिक्रियावादी अवस्थिति को प्राप्त होने के बाद वो जनवाद लाता नहीं बल्कि धीरे धीरे या फिर एक झटके में जनवादी स्पेस को छीनने का काम करता है जैसा कि आज हर तरफ हो रहा है। 

विश्व भर में आज जो परिस्थितियां निर्मित हो रही हैं उनके मद्देनज़र फरवरी क्रांति और नवम्बर क्रांति के दरम्यान लेनिन ने जो भी कहा, लिखा; क्रांतिकारी आन्दोलन से जुड़े हर शख्श को उसे बहुत बारीकी से पढ़ने, समझने की ज़रूरत है। ‘सारी सत्ता सोवियतों को’ का नारा फरवरी, मार्च, अप्रैल में बुलंद करना, सोवियतों में क्रांति विरोधियों का अस्थाई क़ब्ज़ा होने के बाद मई, जून और जुलाई में उसे छोड़ देना और फिर बोल्शेविकों का बहुमत होने के बाद फिर उसी नारे को पूरी ताक़त से बुलंद करना, लेनिन की अद्भुत नेतृत्व क्षमता, उनके असली क़द को प्रस्थापित करता है। क्रांति का मतलब है, सत्ता में अपनी जड़ें जमाए बैठे शत्रु वर्ग को परास्त कर, सत्ता हांसिल करना और फिर अपना हाल पेरिस के बहादुर लेकिन अनुभवहीन कोम्युनार्ड्स जैसा नहीं होने देना और इसके लिए  शत्रु की हर चाल पर पैनी नज़र रखना और क्रांति को टेढ़े-मेढे, नुकीले घुमावदार मोड़ों से निकाल कर मंजिल पर परचम लहराना है। इसके लिए क्रांतिकारी नेता की नज़र का दूर तक साफ देख पाने में सक्षम होना, पहली अनिवार्य शर्त है और उसके लिए अपनी रणनीति में लचीलापन लाना बहुत ज़रूरी है। अड़ियल टट्टू की तरह की भूमिका लेने से सर्वनाश निश्चित है। पेत्रोग्राद और मास्को की सोविएट्स में बोल्शेविकों का बहुमत होने के बाद लेनिन की समझ में आ गया था कि सत्ता हांसिल करने के लिए निर्णायक धावा बोलने की ऐतिहासिक घड़ी आ पहुंची है। बोल्शेविकों को अब सत्ता अपने हाथ में ले लेनी चाहिए” शीर्षक से अपनी बोल्शेविक पार्टी की केन्द्रीय समिति के नाम लिखी लेनिन की ये चिठ्ठी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

“दोनों राजधानियों (पेत्रोग्राद तथा मास्को) की मज़दूरों, सैनिकों की सोवियतों में बहुमत हांसिल करने के बाद बोल्शेविकों को अब राज सत्ता अपने हाथ में ले लेनी चाहिए। वे ऐसा कर सकते हैं क्योंकि इन दोनों प्रमुख नगरों में मौजूद क्रांतिकारी तत्वों का क्रियाशील बहुमत, विरोधियों के प्रतिरोध का सामना करने, उसे कुचलने और सत्ता पर क़ब्ज़ा करने और उसे महफूज़ रखने के लिए, बाक़ी लोगों को अपने साथ लेने के लिए काफी है। सैनिकों के लिए तुरंत शांति का प्रस्ताव, किसानों को तुरंत खेती की ज़मीन देने का प्रस्ताव और केरेंसकी ने जो जनवादी संस्थाओं और जनवादी अधिकारों का सत्यानाश किया हुआ है उनकी पुनर्स्थापना करने का प्रस्ताव कर हम ऐसी सरकार की स्थापना कर सकते हैं जिसे कोई हिला नहीं पाएगा। जनवादी कांफ्रेंस, क्रांतिकारी शक्तियों का प्रतिनिधित्व नहीं करती बल्कि ये तो टटपूंजिया वर्ग के ऊपरी समझौता परस्त परत का प्रतिनिधित्व करती है। हमें चुनाव के नतीजों से दिग्भ्रमित नहीं होना चाहिए, चुनाव से कुछ सिद्ध नहीं होता। आप पेत्रोग्राद और मास्को की नगर परिषद के चुनाव के नतीजों और सोवियतों के चुनावों को मिलाकर देख लीजिए। आप मोस्को के चुनाव और 12 अगस्त को मोस्को में हुई हड़ताल की तुलना कीजिए। क्रांतिकारी शक्तियों, जिन्हें लोगों को नेतृत्व प्रदान करना है, उनका बहुमत परखने के लिए ये वस्तुपरक तथ्य बहुत ही अहम हैं।” 

लेनिन एक दम आश्वस्त थे कि ये ही है वो निर्णायक घड़ी जब इतिहास अपने विकास क्रम में एक छलांग लेता है, मानो प्रसव पीड़ा से गुजर रहा समाज प्रसव के लिए तड़प रहा है। अब निर्णायक धावा बोलने के लिए एक पल की भी देर ठीक नहीं क्योंकि ये ऐतिहासिक घड़ी इसी जगह ठहरी नहीं रहेगी। आज चूके तो बस चूक ही जाएँगे जाने कब तक। वे अपनी पार्टी की केन्द्रीय कमेटी को समझाने की हर कोशिश कर रहे थे लेकिन उसका बहुमत उनकी बात नहीं मान रहा था। तब लेनिन ने झुंझलाकर केन्द्रीय कमेटी से अपने स्तीफे की ही घोषणा कर डाली। पार्टी स्तब्ध रह गई और उनके प्रस्ताव पर पूरी गंभीरता के साथ फिर विचार हुआ और उन्हें बहुमत प्राप्त हो गया। सारी पार्टी और उससे जुड़े सारे जन संगठन, मित्र, हितैषियों को पूरी तरह तैयार रहने के लिए कहा गया। निर्णायक संघर्ष के ऐलान के लिए केन्द्रीय कमेटी की एक गोपनीय बैठक हुई और 1 नवम्बर (अर्थात 19 अक्तूबर 1917) का दिन निर्णायक हमले के लिए निश्चित किया गया लेकिन केन्द्रीय कमेटी के विरोधी समूह, जिनोवीव और कामानीव ने गद्दारी की और सारी गुप्त योजना अखबार में उजागर कर दी। लेनिन गुस्से में आग-बबूला हो गए। लगा कि अब ये पूरा प्रोग्राम छोड़ देना पड़ेगा लेकिन लेनिन क्रांति की उस घड़ी को हाथ से अब भी नहीं जाने देना चाहते थे इसलिए तारीख को बस 6 दिन बढाया गया और 7 नवम्बर 1917 (पुराने रुसी कैलेंडर के अनुसार 25 अक्तूबर 1917) को शीत महल पर धावा बोल दिया गया और बिना किसी खून खराबे के रूस की सत्ता, रूस के सर्वहारा और मेहनतक़श किसानों के हाथ में आ गई।   

नवम्बर क्रांति, जिसकी रोशनी दुनिया भर में फैलती गई, दुनियाभर के करोड़ों दबे- कुचले लोगों की प्रेरणास्रोत बनी, औपनिवेशिक दासता और ज़ालिम शासकों के ख़िलाफ़ आज़ादी आन्दोलनों को शक्ति मिल और मेहनतकशों का सहारा बनी। आज, जब मज़दूर वर्ग के गद्दारों द्वारा उसे प्रतिक्रांति द्वारा पलटकर  पूंजीवादी लूट सत्ता को फिर से स्थापित कर दिया गया है, आज भी महान नवम्बर क्रांति दुनियाभर के मेहनतक़शों की प्रेरणा स्रोत बनी हुई है और बनी रहेगी।  नवम्बर क्रांति संपन्न होने की समीक्षा करते हुए लेनिन विनम्रता से लिखते हैं,

हमने हमेशा यह महसूस किया है कि यह रूसी सर्वहारा वर्ग की किसी योग्यता के कारण नहीं था, भले हम क्रांति की शुरुआत पहले कर सके लेकिन ये विकसित हुई पूंजीवाद की विशिष्ट कमजोरियों और उसके पिछड़ेपन के कारण ही और उसके ख़िलाफ़ विश्वव्यापी संघर्ष के चलते हुए  ही। इसके आलावा, यह केवल पूंजीवाद की विशिष्ट कमजोरी और पिछड़ेपन और सैन्य सामरिक परिस्थितियों के अजीब दबाव के कारण था, कि हम अन्य टुकड़ियों से आगे बढ़ने के लिए घटनाओं का उपयोग कर सके। दुनिया हमारे साथ आ जाए और वह भी विद्रोह करे, हम तब तक इंतजार नहीं कर सकते थे। अब हम यह समीक्षा इसलिए कर रहे हैं ताकि आने वाली क्रांतियों में उनके सामने आने वाली लड़ाइयों के लिए हम अपनी तैयारियों का जायजा ले सकें।

एक खास बात जो क्रांतिकारी आन्दोलन से जुड़े हर कार्यकर्ता को समझनी चाहिए, वो है कि 7 नवम्बर 1917 को केरेंसकी की सरकार को सत्ता से भगाकर  बोल्शेविकों ने सत्ता हांसिल कर ली थी लेकिन उस वक़्त, वर्ग संघर्ष आधारित संघर्ष सिर्फ़ शहरों में ही हुआ था। देहात के विशाल भूभाग में वर्ग संघर्ष, सर्वहारा द्वारा राज सत्ता रूपी औजार का उपयोग करते हुए क्रम बद्ध तरीक़े से चलाया गया। क्रांति का पहला चरण था राज सत्ता हांसिल करना और उसे सुरक्षित-संरक्षित रखना जो कि आसान साबित हुआ लेकिन उसके बाद पहले भयानक गृह युद्ध और फिर खेती किसानी में वर्ग संघर्ष चलाते हुए कुलकों का सफ़ाया तो 1930 तक, मतलब सत्ता हांसिल करने के 13 साल बाद ही हो पाया था और ये रास्ता जटिल और अत्यंत कठिनाईयों भरा था। 1930 तक रूस में चारों प्रकार की खेती मौजूद थी, व्यक्तिगत फार्म, सहकारी फार्म, सामूहिक फार्म और सरकारी फार्म। खेती में समाजवादी व्यवस्था स्थापित होने का मतलब है, सरकारी फार्मों का निर्माण। यदि कोई ऐसा सोचता है कि विशाल देशों में शहरों और देहात में सभी जगह एक साथ वर्ग संघर्ष चलाते हुए एक झटके में शोसक वर्ग को परास्त कर समाजवाद स्थापित किया जाएगा तो ये मुंगेरीलाल के ख़्वाब देखने जैसा ही है। मौजूदा ऐतिहासिक किसान आन्दोलन के सन्दर्भ में कई स्वयं घोषित अति क्रांतिकारी ऐसी भूमिका लेते देखे जा रहे हैं। ‘इस किसान आन्दोलन का नेतृत्व धनी किसानों के पास है, इसीलिए इसका विरोध किया जाना ही क्रांतिकारिता है भले ऐसा करते हुए हम इजारेदार कॉर्पोरेट की ताबेदार फासिस्ट भाजपा सरकार की गोद में ही क्यों ना लहालोट होते पाए जाएँ इस मानसिकता से संचालित सिर्फ़ वो ही इदारा ही हो सकता है जो क्रांतिकारी दिखना भर चाहता है, उसका असल व्यवसाय कुछ और है। मौजूदा किसान आन्दोलन किस तरह सत्ता पक्ष को तोड़ डाल रहा है, जैसे-जैसे ये आगे बढ़ रहा है, सत्ता में पड़ी दरार चौड़ी और गहरी होती जा रही है, फासिस्ट सत्ता का आधार कैसे दिनों दिन किसानों की एकता की चट्टानी दीवार से टकराता जा रहा है, कैसे किसानों की अपनी सारी उपज की निश्चित दाम पर सरकारी खरीद की गारंटी की मांग के प्रति किसानों की दृढ़ता और समझौता रहित संघर्ष चलाते जाना, बेशक़ इसके लिए जान ही दांव पर क्यों ना लगानी पड़े’ पूंजीवादी सीमा को लाँघता जाने वाला है, दिनों दिन किसानों और सर्वहारा वर्ग के बीच निकटता कैसे दृढ और गहरी होती जा रही है; ये सारी हकीक़त अगर किसी ‘क्रांतिकारी’ के लिए कोई भी मायने ना रखती हो तो उनके बारे में क्या कहा जाए? हर रात जो ‘दल’ ये सपने देखता हो कि सुबह तक किसानों के आन्दोलन स्थल उजाड़ जाएँगे, किसान, सरकार बहादुर के सामने घुटनों के बल रेंगते,  गिड़गिड़ाते नज़र आएंगे या फिर और कुछ भी नहीं हुआ तो एसकेएम के नेता आपस में ही लट्ठ बजाते नज़र आएँगे; ऐसी सोच वाले दलों पर सिर्फ़ तरस ही खाया जा सकता है। ये किसान ऐसे मुन्गेरीलालों को पूरी तरह निराश कर के ही छोड़ेंगे, इनकी असलियत छुपी नहीं रहने देने वाले, इतना तो तय है। विशाल महाद्वीप जैसे देशों में आम जन मानस को उद्वेलित कर संघर्ष को शिखर तक ले जाने वाली क्रांतियाँ कभी भी बिलकुल शुद्ध, शास्त्रीय रूप में, कॉपी बुक स्टाइल में संपन्न नहीं हो सकतीं। यहाँ तक कि क्रांति क़ामयाब होने की अनिवार्य शर्त, देश के स्तर पर क्रांतिकारी पार्टी का मौजूद होना भी ज़रूरी नहीं कि बिलकुल शास्त्रीय, किताबी अंदाज़ में ही हो। मतलब पहले क्रांतिकारी पार्टी एक-एक कर राज्यों में फैलती जाएगी, जन संगठन क्रमबद्ध तरीक़े से बनते, विकसित होते जाएँगे और पूरे देश में उसका प्रसार हो चुकने के बाद क्रांतिकारी संघर्ष का बिगुल बजेगा। ऐसी भी मुमकिन है बल्कि संभावित दिख रहा है कि चूँकि वस्तुगत परिस्थितियां पक चुकी हैं, दुनिया बारूद के ढेर पर बैठी हुई है, कोई घटना लोगों में मौजूद असीम गुस्से को भड़का दे और एक क्रांतिकारी मोर्चा बने और फिर संघर्ष की उस प्रक्रिया के दौरान ही क्रांतिकारी पार्टी का उद्भव हो।   इसीलिए कहा जाता है कि हर देश में क़ामयाब क्रांति, मार्क्सवाद-लेनिनवाद के विज्ञान में अपना कुछ ना कुछ विशिष्ट योगदान करती है और उससे विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन का एक नया नेता पैदा होता है। ‘छोटे किसानों को पहले उजड़ने दिया जाए क्योंकि छोटी पूंजी का ये ही हस्र होना है और जब सारे किसान पूरी तरह उजड़कर, खेत मज़दूर-सर्वहारा बन चुकेंगे तब ही क्रांतिकारियों को क्रांति का आह्वान करेंगे’, आईये देखें, स्टालिन बिलकुल इसी विषय पर अपने  बहुत महत्वपूर्ण लेख ‘सोवियत संघ की आर्थिक समस्याएँ में क्या कहते हैं।

“और इसलिए, क्या किया जाना चाहिए यदि सारे  नहीं, लेकिन उत्पादन के साधनों के केवल एक हिस्से का सामाजिककरण किया गया है, फिर भी सर्वहारा वर्ग द्वारा सत्ता ग्रहण करने के लिए परिस्थितियाँ अनुकूल हैं - क्या सर्वहारा सत्ता ग्रहण कर ले और उसके बाद वस्तु उत्पादन को तुरंत समाप्त कर दिया जाए? निश्चित ही, हम कुछ अधपके (अधकचरे) मार्क्सवादियों की राय को उत्तर के रूप में सही नहीं मान सकते हैं, जो कहते हैं कि ऐसी परिस्थितियों में सत्ता लेने से बचना चाहिए और तब तक इंतजार करना है जब तक कि पूंजीवाद लाखों छोटे और मध्यम उत्पादकों को बर्बाद करने में सफल नहीं हो जाता। और पहले उन्हें खेतिहर मजदूरों में परिवर्तित करने दे और कृषि में उत्पादन के साधनों को केंद्रित करने दे, और इसके बाद ही सर्वहारा वर्ग द्वारा सत्ता ग्रहण करने और उत्पादन के सभी साधनों के समाजीकरण पर विचार करना संभव होगा। स्वाभाविक रूप से, यह एक "समाधान" है जिसे मार्क्सवादी स्वीकार नहीं कर सकते हैं, यदि वे खुद को पूरी तरह से बदनाम नहीं करना चाहते हैं। न ही हम अन्य अधपके-अधकचरे मार्क्सवादियों की राय को उत्तर के रूप में सही मान सकते हैं, जो सोचते हैं कि छोटे और मध्यम ग्रामीण उत्पादकों को हथियाने और उनके उत्पादन के साधनों का सामाजिककरण करने के लिए काम करना होगा। मार्क्सवादी इस मूर्खतापूर्ण और आपराधिक रास्ते को भी नहीं अपना सकते, क्योंकि यह सर्वहारा क्रांति के लिए जीत के सभी अवसरों को नष्ट कर देगा, और किसानों को लंबे समय तक सर्वहारा वर्ग के दुश्मनों के शिविर में फेंक देगा।”

रूस में नवम्बर क्रांति क़ामयाब होने का एक बहुत अहम योगदान ये है कि इसने ये साबित किया कि क्रांतियाँ औद्योगिक रूप से आगे निकल चुके पश्चिमी यूरोप में ही पहले हों, ज़रूरी नहीं। मतलब, क्रांतिकारी परिस्थितियां किसी भी पिछड़े, औपनिवेशिक देश में कहीं भी पैदा हो सकती है और जैसे रूस में क़ामयाब हुई वे पूंजीवाद को उखाड़ फेंककर मज़दूरों-मेहनतक़श किसानों का राज, समाजवाद स्थापित कर सकती हैं। इसी हकीक़त का नतीज़ा है कि 1917 के आस पास ही लगभग हर देश में कम्युनिस्ट पार्टियाँ बनीं और कम्युनिस्ट आन्दोलन अपनी बुलंदी पर पहुंचा। हमारे देश में भी ग़दर आन्दोलन उसी दशक में परवान चढ़ा और इसी का नतीज़ा था शहीद-ए-आज़म भगतसिंह और शानदार क्रांतिकारियों की टोली जिसने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी बनाई और मार्क्सवादी-लेनिनवादी राह पर चलते हुए मज़दूरों-किसानों के राज की ना सिर्फ़ कल्पना की बल्कि भले तरीका अपरिपक्व रहा हो, उस मंजिल की तरफ कूंच भी कर दिया। ऐतिहासिक परिस्थितियों ने, हालाँकि, उन्हें इस विशाल देश में क्रांतिकारी पार्टी गठित करने का अवसर नहीं दिया। कम्युनिस्ट पार्टी का गठन भी बीसवें दशक में ही हुआ भले वो पार्टी क्रांति के रास्ते से भटक गई। ये ही नहीं, ग़रीब देशों को उपनिवेश बनाकर बर्बर तरीक़े से लूटने वाले देशों को भी ये समझ आ गया कि देश की आज़ादी की लड़ाईयाँ अब पूंजी से मुक्ति की लड़ाई में बदल जाने वाली हैं और उसी के डर से उन लुटेरों ने अपना बोरीया-बिस्तरा समेटना शुरू कर दिया और एशिया-अफ्रीका के सैकड़ों देश यूरोपियन देशों की गुलामी से मुक्त हुए। नवम्बर क्रांति से सिर्फ़ क्रांतिकारी शक्तियों ने ही नहीं सीखा बल्कि क्रांति से भयाक्रांत होने वाले पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शासकों ने भी बहुत कुछ सीखा। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि फ़ासिस्ट संगठन भी बीसवें दशक में ही बने। इटली, जर्मनी, जापान, स्पेन ही नहीं हमारे देश में राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ की स्थापना भी बीसवें दशक में ही हुई। नवम्बर क्रांति सही मायने में एक युगांतरकारी घटना थी जिसने सारे विश्व को प्रभावित किया और आगे भी प्रभावित करती रहेगी। 

संशोधनवाद ही है क्रांतियों का असली दुश्मन

रूस में क्रांति की परिस्थितियां नवम्बर में पूरी तरह परिपक्व हो चुकी थीं और निर्णायक हमले के लिए बोल्शेविकों ने बिलकुल सही समय चुना था, यही वज़ह है कि 7 नवम्बर 1917 को उन्हें सत्ता बहुत आसानी से हांसिल हो गई थी, कोई खून ख़राबा नहीं हुआ था। सत्ता हांसिल करने के बाद, लेकिन, उन्हें एक के बाद एक बहुत गंभीर मुसीबतों का सामना करना पड़ा था। हर इम्तेहान से वो नवांकुर सर्वहारा सत्ता ना सिर्फ़ क़ामयाब हुई बल्कि और मज़बूत होकर निकली। सत्ता हांसिल करते ही दुनिया के तत्कालीन सबसे बड़े साम्राज्यवादी ठग जर्मनी ने रूस पर प्रथम विश्व युद्ध में रूस की हो रही कमजोर परिस्थितियों के मद्दे नज़र ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया और रूस को ब्रेस्ट लिटोव्स्क नाम की बहुत अपमानजनक संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए मज़बूर होना पड़ा। उसके बाद 2 साल का भयानक, ख़ूनी गृह युद्ध लड़ना पड़ा जिसमें दुनिया के 15 साम्राज्यवादी लुटेरे शासकों ने उसे घेरा हुआ था और वो रूस के अन्दर के क्रांति-दुश्मनों से मिलकर क्रांति को तबाह कर देना चाहते थे। लेनिन और स्टालिन के सशक्त नेतृत्व में बोल्शेविकों ने क्रांति के सभी गद्दारों को उनकी सही जगह पहुँचाया और मज़दूर सत्ता की प्रतिष्ठा को दुनिया भर के मेहनतकशों की नज़रों में बढाया। बीस के दशक में ग्रामीण भाग में किसानों में कड़वा वर्ग संघर्ष चला। जनवरी 1924  में लेनिन की मृत्यु के बाद उनके क़ाबिल उत्तराधिकारी स्टालिन ने क्रांति को देश के कोने कोने में फैलाया, साथ ही एक भूखे कंगाल हो चुके देश को अनाज उत्पादन और औद्योगिक उत्पादन दोनों ही क्षेत्रों में बुलंदी पर पहुँचाया। तीसरे दशक में एक और गंभीर समस्या से जूझना पड़ा। 1 दिसम्बर 1934 को केन्द्रीय कमेटी के वरिष्ठ सदस्य कॉमरेड किरोव की हत्या हुई और उस हत्या की जाँच में कम्युनिस्ट पार्टी में षडयंत्रकारियों, गद्दारों, ट्रोट्स्की और जर्मन नाजियों के भाड़े के टट्टुओं का एक बहुत डरावना कंकाल नज़र पड़ा जिसको अगर गंभीरता और कठोरता से ना लिया गया होता तो सोवियत संघ में दूसरा ही विनाशकारी मंज़र दिखाई पड़ता। उस चुनौती के सामने भी स्टालिन कम नहीं पड़े। तब ही फासिस्टों ने अमेरिका, इंग्लॅण्ड और फ़्रांस से सांठ-गाँठ कर द्वितीय विश्व युद्ध में सोवियत सत्ता को नेस्तनाबूद करने के षडयंत्र रचे जिसके तहत हिटलर ने सोवियत संघ पर सबसे प्रचंड हमला बोल दिया। भयंकर विश्व युद्ध में जान-माल का  सबसे ज्यादा नुकसान सोवियत संघ को ही झेलना पड़ा लेकिन सारी दुनिया ने देखा कि हिटलर की उस प्रलयकारी युद्ध मशीन को रुसी लाल सेना ने नेस्तोनाबूद कर दिया और सर्वहारा की सत्ता को बुलंदी के सर्वोच्च मुकाम तक पहुँचाया। आधी दुनिया में लाल परचम लहराने लगा। इस सब के बाद, लेकिन, 5 मार्च 1953 में स्टालिन की मृत्यु के कुछ दिन बाद ही कम्युनिस्ट पार्टी में छुपे हुए गद्दारों जिनका नेतृत्व ख्रुश्चोव कर रहा था, मज़दूरों के अरमानों के उस महल को मिटटी में मिला दिया। जो काम सारी दुनिया मिलकर नहीं कर पाई वो भीतरघातियों ने कर डाला और रूस के मज़दूर ठगे रह गए। पेरिस कम्यून की विफलता की तरह इस प्रति-क्रांति का भी सही, वस्तुपरक एवं दुराग्रह रहित मूल्यांकन कम्युनिस्ट आन्दोलन की ज़िम्मेदारी है जिससे बीमारी की असली जड़ तक पहुंचा जा सके, उसका  निदान किया जा सके। ये आत्मालोचना कम्युनिस्ट आन्दोलन को मज़बूत बनाएगी और ये महत्वपूर्ण काम अभी बाक़ी है।

कम्युनिस्ट आन्दोलन में संशोधनवाद नाम से जानी जाने वाली घातक बीमारी बहुत पुरानी है। इस रोग से प्रभावशाली रोकथाम किए बगैर आन्दोलन को मज़बूत नहीं बनाया जा सकता। संशोधनवाद कोई नया रोग नहीं है 1840 के दशक से ही मार्क्स-एंगेल्स को इस बीमारी से लड़ना पड़ा था। ‘मार्क्सवाद और संशोधनवाद शीर्षक से अप्रैल 3,1908 में लिखे लेख में लेनिन बताते हैं कि कैसे मार्क्स और एंगेल्स को युवा हेगेलपंथी, प्रूदों, बाकुनिन, बर्नस्टीन, नरोदवादियों, ड्यूरिंग आदि द्वारा मार्क्सवाद को विकृत करने के प्रयासों से लड़ना पड़ा। उनके बाद संशोधनवादियों का नेतृत्व कोउत्स्की और प्लेखानेव ने संभाला। संशोधनवाद के आधार को परिभाषित करते हुए लेनिन लिखते हैं,

एक प्रसिद्ध कहावत है कि यदि ज्यामितीय स्वयंसिद्ध सिद्धांत मानव हितों को प्रभावित करते हैं तो निश्चित रूप से उनका खंडन करने का प्रयास किया जाएगा। प्राकृतिक इतिहास के सिद्धांत, जो धर्मशास्त्र के पुराने पूर्वाग्रहों के साथ संघर्ष करते थे, उन्होंने सबसे उग्र विरोध को झेला, और अभी भी झेल रहे हैं। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि मार्क्सवादी सिद्धांत, जो सीधे तौर पर आधुनिक समाज में उन्नत वर्ग को प्रबुद्ध और संगठित करने का काम करता है, इस वर्ग के सामने आने वाले कार्यों की पहचान कराता है और एक नए कार्यक्रम द्वारा वर्तमान व्यवस्था के निश्चित रूप से पलट डालने (आर्थिक विकास के आधार पर) का रास्ता दिखाता है। —कोई आश्चर्य नहीं कि इस सिद्धांत को अपने जीवन के प्रत्येक चरण में आगे बढ़ने के लिए संघर्ष करना पड़ा है।” 

दरअसल, पूंजीवाद, सर्वहारा और पूंजीपति वर्गों के अलावा मध्यम वर्ग की कई परतों को भी जन्म देता है। छोटे स्तर का उत्पादन स्वामी, किसान जो भले छोटी हो पूंजी का मलिक होता है और इसके साथ ही असंख्य छोटे दुकानदार-व्यवसायी जो क्रांति के वक़्त मज़दूर वर्ग में शामिल हो जाते हैं लेकिन मध्यम वर्गीय पेटी बुर्जुआ मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाते; संशोधनवाद की उपजाऊ ज़मीन का निर्माण करते हैं। हम हर रोज़ देखते हैं कि बिलकुल सर्वहारा बन चुके या बनने जा रहे कई लोग भी मज़दूरों से अलग दिखना चाहते हैं; मैं कोई मज़दूर नहीं हूँ , 2 एकड़ ज़मीन का मलिक हूँ, या मेरी अपनी दुकान है, या मैं एक लाख वेतन पाता हूँ, ये मानसिकता बार-बार उन्हें सर्वहारा वर्ग और पूंजीपति वर्ग के बीच का रास्ता ढूंढते जाने को प्रेरित करती जाती है। बीच का कोई रास्ता होता नहीं, जो बीच का रास्ता नज़र आता है वो, दरअसल, मालिक वर्ग के कैंप में जाकर रुकता है, देर-सबेर उसी गटर गंगा में मिल जाता है। अपने उक्त लेख का समापन करते हुए लेनिन लिखते हैं;

“उन्नीसवीं सदी के अंत में संशोधनवाद के खिलाफ क्रांतिकारी मार्क्सवाद द्वारा छेड़ा गया वैचारिक संघर्ष, सर्वहारा वर्ग की महान क्रांतिकारी लड़ाई की प्रस्तावना है, जो निम्न पूंजीपति वर्ग की सभी कमजोरियों और कमियों के बावजूद अपने उद्देश्य की अन्तिम जीत की ओर अग्रसर है।”

सोवियत संघ में मौजूद इस रोग को स्टालिन ने पहचान लिया था, उसका डायग्नोसिस भी ठीक तरह से कर लिया था लेकिन इतिहास ने उन्हें वक़्त नहीं दिया कि वे ये महती काम पूर्ण कर पाते। कॉमरेड यारोशेनको के पत्र का जवाब देते हुए और उनके इस आग्रह कि ‘समाजवाद की अर्थ-राजनीति’ के संकलन करने का काम उन्हें दिया जाए, को नकारते हुए  कॉमरेड स्टालिन 20 मार्च 1952 में, मतलब अपनी मृत्य के महज एक साल पहले, लिखते हैं,

कॉमरेड यारोशेनको सही नहीं हैं, जब वह दावा करते हैं कि समाजवाद के तहत उत्पादन के संबंधों और समाज की उत्पादक शक्तियों के बीच कोई विरोधाभास नहीं है। बेशक, हमारे उत्पादन के वर्तमान संबंध ऐसे दौर में हैं जब वे उत्पादक शक्तियों के विकास के पूरी तरह से अनुरूप हैं और उन्हें सात-लीग की प्रगति पर आगे बढ़ने में मदद कर रहे हैं। लेकिन उससे संतुष्ट होकर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना और यह सोचना गलत होगा कि हमारी उत्पादक शक्तियों और उत्पादन के संबंधों के बीच कोई विरोधाभास नहीं है। निश्चित रूप से विरोधाभास हैं, और होंगे, जब तक की उत्पादन संबंधों का विकास, उत्पादक शक्तियों के विकास से पिछड़ा हुआ रहेगा। चूँकि नीति निर्धारण निकायों की ओर से एक सही नीति का पालन किया जा रहा है इसलिए ये विरोधाभास विध्वंसक विरोध (antagonism) में नहीं बदल सकते हैं और उत्पादन के संबंधों और समाज की उत्पादक शक्तियों के बीच संघर्ष पैदा होने की कोई संभावना नहीं है।  लेकिन, ये अलग बात होगी यदि हम एक गलत नीति का संचालन करें, जैसे कि कॉमरेड यारोशेंको ने सिफारिश की थी, उस स्थिति में संघर्ष अवश्यंभावी होगा, और हमारे उत्पादन संबंध उत्पादक शक्तियों के आगे विकास पर एक गंभीर ब्रेक बन सकते हैं।

विश्व सर्वहारा के महान नेता कॉमरेड स्टालिन की आशंका बिलकुल सही साबित हुई।  ग़द्दार और झूठे ख्रुश्चेव और उसकी चंडाल चौकड़ी ने ‘स्टालिन पंथ’ का विरोध करने के नाम पर एक-एक कर हर सही नीति को पलटना शुरू कर दिया और सर्वहारा का वो ख़्वाब बिखर गया, खून पसीने से तामीर किया वो किला ढह गया। लेकिन सर्वहारा और लुटेरे पूंजीपतियों की कुश्ती का ये आखरी राउंड नहीं है। अन्तिम निर्णायक लड़ाई, नॉक आउट राउंड अभी बाक़ी है और उसमें, मध्यम वर्ग, उच्च वर्ग के तेज़ी से पिघलने से विशाल होती जा रही सर्वहारा की अजेय सेना का बलशाली घूंसा इस मुनाफ़ाखोर व्यवस्था को धराशायी करके ही रहेगा क्योंकि सर्वहारा समाज को आगे ले जाने की लड़ाई लड़ रहा है जबकि पूंजीवाद-साम्राज्यवाद चंद लोगों के मुनाफ़े के लिए उत्पादन के सारे साधनों को बन्दी बना लेना चाहता है, प्रगति के रास्ते को रोक देना चाहता है। एक प्रिय कॉमरेड के शब्दों में, ‘पलटवार अब और करारा तय है साथी रे…’

पूंजीवाद मानव विकास का अन्तिम पड़ाव नहीं हो सकता, इसे जाना ही होगा 7 नवम्बर 1927 को महान नवम्बर क्रांति की दसवीं साल गिरह सोवियत संघ में बहुत शानदार ढंग से मनाई गई थी। मास्को में हुए विशेष प्रोग्राम में दुनिया भर से क्रांतिकारी नेताओं को बुलाया गया था। उसमें एक खुली गाड़ी जो फूलों से सजी हुई थी, प्रस्तुत हुई जिसपर आगे लिखा हुआ था, “लेनिन की धरती पर आपका स्वागत है (V Strane Lenine)”  और उसके पीछे-पीछे एक विशालकाय अर्थी लाई गई थी जिसपर मोटे अक्षरों में लिखा हुआ था,  “ये रुसी पूंजीवाद की अर्थी है जहाँ जल्दी ही दुनिया भर का पूंजीवाद पहुँचने वाला है”। भले प्रोग्राम में थोडा बदलाव हो गया है, कुछ देर हो गई है लेकिन, कार्यक्रम लागू बिलकुल उसी तरह होना है। सृजन कर्ताओं के लूटे गए श्रम से निर्मित पूंजी के प्रचंड पहाड़ों पर बैठे लुटेरे, अपने टुकड़खोर बैंड मास्टरों, कीर्तनकारों की कितनी भी बड़ी फौज तैयार कर लें और वो मिरगी के दौरे वाले मरीजों की तरह कितना भी बाल बिखेरकर चिल्लाएं, ‘समाजवाद फेल हो गया, मार्क्सवाद-लेनिनवाद पुराना पड़ गया, अब तो बस पूंजी का ही नंगा नाच रहने वाला है’ लेकिन ऐसा होने नहीं वाला। प्रकृति की नैसर्गिक गति को रोकने की कोशिशें पहले भी, जाते हुए वर्गों द्वारा कई बार की जा चुकी हैं लेकिन वैज्ञानिक नियमों से संचालित द्वंद्वात्मक विकास की धारा बहती जाएगी। क्रांति की सूनामी लहरें ऐसा सारा कूड़ा-करकट बहा ले जाने वाली हैं। जहाँ राजे-रजवाड़े गए, उनकी ख़ूनी तोपें-तलवारें गईं , ठीक वहीं ये पूंजी के टीन-टप्पर पहुँचने वाले हैं। पूंजीवाद को इतिहास ज़मा होने से कोई नहीं बचा सकता। महान नवम्बर क्रांति शोषक लुटेरों को इसी तरह भयाक्रांत करती रहेगी। मुक्तिदाता सर्वहारा को इसी तरह दिशा और रोशनी दिखाती रहेगी।