बुद्ध या कार्ल मार्क्स

बुद्ध या कार्ल मार्क्स

November 15, 2021 1 By admin

[दूसरी किश्त]

प्यारेलाल ‘शकुन’

बुद्ध और महावीर का समय उपनिषद् और आरण्यक काल से पहले का है। ये बात इतिहासकार कौसाम्बी कहते हैं। बुद्ध के समय 16 जनपद थे। जिनमें तीन गणसत्तात्मक थे एक बज्जी और दो मल्लों के छोटे राज्य थे और ये भी एक सत्तात्मक शासन प्रणाली में फंसते जा रहे थे। यानी राजतंत्र का विकास होता जा रहा था। कौसाम्बी लिखते हैं कि ” मेरे मत से गणसत्ताओं की विलासिता और राजनीति में ब्राह्मणों का प्रभाव ही इस क्रांति का प्रमुख कारण रहा होगा।” आगे उन्होंने लिखा है कि ” गण राजा गाँव – गाँव में रहते थे। अतः उनके जुल्म से शायद ही कोई बच सकता था। करों और बेगार के रूप में ये राजा सभी को सताते होंगे। … एक सत्तात्मक राज्य में पुरोहित का काम बंश परंपरा से या ब्राह्मण समुदाय की सम्मति से ब्राह्मण को ही मिलता था। प्रधानमंत्री आदि के कार्य भी ब्राह्मणों को ही मिलते थे। इससे ब्राह्मण लोग एक सत्तात्मक शासन प्रणाली के प्रबल समर्थक बन गये।” उन्होंने लिखा है कि “यह बात बिचारने योग्य है कि ब्राह्मण- ग्रंथों में गणसत्तात्मक शासन प्रणाली में ब्राह्मणों का नाम निर्देश भी नहीं है। इससे ऐसा लगता है कि ब्राह्मणों को गणसत्तात्मक शासन प्रणाली बिल्कुल पसंद नहीं थी। गणराज्यों में यज्ञ – यागों को बिल्कुल प्रोत्साहन नहीं मिलता था। और एक सत्तात्मक राज्यों में तो महाराज यज्ञ -याग चलाने के लिए ब्राह्मणों को बंशपरंपरा से भूमि या अन्य इनाम देते थे। ” डी.डी. कौसाम्बी ने ‘भगवान बुद्ध- जीवन और दर्शन’ में उल्लेख किया है कि “बुद्ध के अनुयायियों ने तो गणसत्तात्मक राज्यों की कल्पना को बिल्कुल छोड़ ही दिया” ‘दीघनिकाय’ में आदर्श शासन प्रणाली बताने वाले ‘चक्कवित्तसुत्त’ और ‘महासूदस्सन सुत्त’ नाम के दो सुत्त हैं। उनमें चक्रवर्ती राजा का महत्त्व अतिशयोक्ति पूर्वक बताया गया है। ब्राह्मणों के संम्राट और इस चक्रवर्ती सम्राट में इतना ही अंतर है कि पहला साधारण जनता की चिंता न करके बहुत से यज्ञ -याग करके केवल ब्राह्मणों की चिंता करता है और दूसरा सारी जनता के साथ अच्छा वर्ताव करके उसे सुखी बनाने में दक्ष रहता है और राज्य में शांति स्थापना होते ही वह लोगों को उपदेश देता है कि: ” प्राणियों की हत्या नहीं करनी चाहिए, चोरी नहीं करनी चाहिए, व्यभिचार नहीं करना चाहिए, झूठ नहीं बोलना चाहिए और शराब नहीं पीनी चाहिए। यानी बौद्ध गृहस्तों के जो पांच शील नियम हैं उनका पालन करने का उपदेश ये चक्रवर्ती राजा करते थे। स्वयं गौतम बुद्ध पर गणसत्तात्मक शासन प्रणाली का स्पष्ट प्रभाव था। संघ की रचना बुद्ध ने गणसत्तात्मक राज्यों की शासन प्रणाली के आधार पर ही की होगी।    इसी गणसत्तात्मक शासन प्रणाली की चक्रवर्ती राजाओं की कथा डॉ अम्बेडकर ने अपने लेख बुद्ध या कार्ल  में करके इसे बुद्ध की विचारधारा का साम्यवाद बताया है और इसे मार्क्सवादी साम्यवाद के साथ तुलना करके बुद्ध और मार्क्स के साध्य को समान बताया है। डॉ अम्बेडकर ने अपने लेख में बौद्ध संघ में भिक्षुओं के पास केवल 8 उपयोगी वस्तुओं के अलावा और किसी प्रकार की निजी संम्पत्ति रखने को बर्जित बताना, निजी स्वामित्व के निषेध के रूप में माना है। और गणसत्तात्मक शासन प्रणाली में चक्रवर्ती राजा जिन पांच शील संसकारों को अपनाने का प्रचार करते हैं। ये सब मिलाकर बुद्ध की विचारधारा का साम्यवाद है। प्रश्न यह है कि क्या मार्क्स ने जिस साम्यवाद की बात की है क्या वह आधुनिक वैज्ञानिक साम्यवाद भी इसी प्रकार का बताया है?  निश्चित ही कोई भी सामान्य विवेक वाला व्यक्ति यही कहेगा कि आज विज्ञान का जो इतना विकास हो गया है और  गणसत्तात्मक राज्य से सामंती राज्य व्यवस्था का विकास करते हुए पूंजीवादी व्यवस्था ने लोकतंत्र के नाम से विभिन्न देशों में जिस राज्य व्यवस्था के एक बहुत ही मजबूत ढांचे का विकास किया है। जिसमें सेना, पुलिस, न्याय पालिक और एक विशाल नौकरशाही अत्यंत विशाल अस्त्र -शस्त्रों के साथ सज्जित है। ऐसे समय में क्या हम निजी स्वामित्व से रहित एक वर्ग विहीन और राज्य विहीनव्यवस्था,  बौद्ध धर्म या धम्म के उन प्राचीन सिद्धांतों से स्थापित कर सकते हैं जिसकी कल्पना डॉ अम्बेडकर ने की थी? इसलिए डॉ अम्बेडकर का यह साम्यवाद उसी साम्यवाद की तरह काल्पनिक है जो काल्पनिक साम्यवादियों ने कार्ल मार्क्स के वैज्ञानिक साम्यवाद के आविष्कार से पहले कल्पना की थी। इनमें मुख्य रूप से चार काल्पनिक साम्यवादी विचारकों के नाम उल्लेखनीय हैं – 1- अंग्रेज लेखक और दार्शनिक टामस मूर, 2- अंग्रेज राबर्ट ओबेन , 3- फ्रांसीसी सें – सिनो तथा 4- शार्ल फूरिये । इनके सिद्धांतों का नाम युटोपियाई समाजवाद पड़ा। ये युटोपियाई शब्द अवास्तविक और काल्पनिक का पर्याय बन गया। युटोपियाई समाजवादियों ने बड़े बढ़िया ढंग से मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का पर्दाफ़ाश किया। वे शोषण पर आधारित सामाजिक व्यवस्था की जगह समाजवाद लाये जाने के उत्कट समर्थक थे। किन्तु उन्होंने उस सामाजिक शक्ति को न देखा, जो नये समाज की निर्माता बन सकती थी। वे मात्र समाजवादी विचारों के शांतिपूर्ण प्रचार, कानूनों और घोषणाओं के जरिये प्रथ्वी पर सुख का राज कायम करना चाहते थे। उन्हें यकीन न था कि महान परिवर्तन मेहनतकश ही ला सकते हैं। वे वर्ग संघर्ष से डरते थे और इसलिए उन्होंने अपने को शोषकों से शोषितों की मुश्किलें कम करने की अपीलों तक ही सीमित रखा। इसमें कोई दो राय नहीं कि युटोपियाई समाजवादियों के विचारों ने रचनात्मक एतिहासिक भूमिका निभाई। उन्होंने शोषण पर आधारित समाज के सामाजिक अन्याय का पर्दाफ़ाश करने और भावी समाजवादी समाज की कल्पना को सुस्पष्ट बनाने में मदद की। परंतु कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंजिल्स ने पहली बार सिद्ध किया कि समाजवाद प्रभावशाली स्वप्न  दृष्टाओं की कपोल कल्पना नहीं, अपितु मानव समाज के सारे विकास का एक अपरिहार्य परिणाम और तर्क संगत परिणति है। मनुष्य जाति समाजवाद की ओर इस सिद्धांत के समर्थकों के नेक इरादों के कारण नहीं, बल्कि सामाजिक विकास के वस्तुपरक नियमों, यानी जो नियम लोगों की इच्छा और चेतना से स्वतंत्र संबंधों और रिश्तों को व्यक्त करते हैं, उनके फलस्वरूप विकास के रास्ते पर आगे बढ़ते हैं। लोग इन नियमों को जानकर उनके सहारे अपने उद्देश्यों को पा सकते हैं।   मार्क्स और एंगेल्स ने समाजवाद को युटोपिया से विज्ञान में परिवर्तित किया। मार्क्सवाद मानव समाज के विकास को एक सामाजिक -आर्थिक व्यवस्था के स्थान पर दूसरी अधिक प्रगतिशील व्यवस्था आने की नियम संगत प्रक्रिया मानता है। मार्क्स ने दिखाया कि मानव जाति का पूंजीवाद से समाजवाद की ओर बढ़ना अपरिहार्य है। मार्क्स से पहले दार्शनिकों ने विश्व की विभिन्न तरीकों से व्याख्या ही की थी। परंतु मार्क्स ने एक ऐसा वस्तुतः वैज्ञानिक सिद्धांत दिया,जो इस विश्व को बेहतर बनाने के ठोस तरीके, रास्ते बताता है। लेनिन ने मार्क्स के सिद्धांत को नयीएतिहासिक परिस्थितियों में आगे विकसित और समृद्ध किया। आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी घटना 1917 की महान अक्तूवर समाजवादी क्रांति है जिसने विश्वव्यापी पैमाने पर पूंजीवाद से समाजवाद की ओर संक्रमण का सूत्रपात किया। इस क्रांति का नेतृत्व लेनिन ने किया, इसलिए यह क्रांति लेनिन के ही नाम से जुड़ी हुई है। इसलिए 20 वीं शदी को उचित ही लेनिनवाद का युग कहा जाता है। महान अक्तूवर समाजवादी क्रांति और विश्व में पहले समाजवादी राज्य की स्थापना ने विश्व इतिहास में एक नये युग की शुरुआत की। लेनिन के शब्दों में, “मानवजाति दासता के अन्तिम रूप से, अर्थात पूंजीवाद या उजरती गुलामी से, मुक्त हो रही है।” अब से विश्व के कौने – कौने में करोड़ों लोगों को प्रत्यक्ष विश्वास हो गया कि इतिहास के रुख को मोड़ा जा सकता है, इतिहास के रुख को बदलने का लक्ष्य युटोपिया नहीं, अपितु एक ऐसा लक्ष्य है, जिसे पाया जा सकता है और जो सर्वथा यथार्थ है। डॉ अम्बेडकर  पूरी जिंदगी कष्ट भोगते हुए ब्राह्मणवादी तिलिस्म के भाववाद (अध्यात्मवाद) से टकराते रहे और उन्होंने इस भववादी दर्शन का विकल्प भववादी दर्शन बुद्धिज्म को चुना। स्पष्ट है कि आप चाहे समाज के प्रति कितने ही ईमानदार हों किन्तु भाववाद से भाववाद को खत्म नहीं किया जा सकता है, ये एक वैज्ञानिक सत्य है। ब्राह्मणवादी वर्ण व्यवस्था भारत में एक भौतिक सत्य है। इस भौतिक सत्य को खत्म करने के लिए हमें एक ऐसा दर्शन चाहिए जो इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या करता हो और घटनाओं का विश्लेषण करने का उसका तरीका वैज्ञानिक हो अर्थात वह घटनाओं का विश्लेषण द्वंदवादी ढंग से करता हो। यानी घटनाएं हमारे माइंड के बाहर भौतिक रूप से घटित होती हैं और उनमें दो विरोधी शक्तियों के मध्य द्वंद्व होता है तभी गति होती है। एंगेल्स ने बताया कि “गति पदार्थ के अस्तित्व की विधि है। बिना गति के पदार्थ कहीं पर और कभी नहीं हुआ है और न हो सकता है। … गति के बिना पदार्थ ठीक उतना ही अकल्पनीय है जितनी पदार्थ के बिना गति। अत: गति उतनी ही असर्जनीय तथा अविनाश्य है जितना स्वयं पदार्थ है। जैसाकि पुराने दर्शन शास्त्र (देकार्त) ने कहा था, संसार में पायी जाने वाली गति की मात्रा सदा एकसी रहती है। अत: गति का सृजन नहीं हो सकता; उसको केवल स्थानांतरित किया जा सकता है।” (डूहरिंग मत खंडन- एंजिल्स)  उस गणतांत्रिक कबीलाई युग में बुद्ध ने यह बताया था जगत गतिशील है, परिवर्तनशील है, जगत एक ही स्थान पर ठहरा हुआ नहीं है। परंतु उन भौतिक परिस्थितियों की सीमाओं में वे गति और परिवर्तन के नियमों को बताने में सक्षम नहीं हो सके।

हर व्यक्ति चाहे कितना ही महान हो उसका चिंतन उसके युग की भौतिक परिस्थितियों से सीमित होता है, यानी कि वह अपने युग की भौतिक परिस्थितियों को लांघ नहीं सकता है। इसीलिए बुद्ध गति और परिवर्तन के नियमों की व्याख्या नहीं कर सके। जिस युग में मार्क्स ने पदार्पण किया उस समय सामंतवाद खत्म हो रहा था और पूंजीवाद उसके गर्भ से जन्म ले रहा था, प्रायोगिक विज्ञान का विकास हो रहा था। कोपर्निकस्, गैलिलियो, ब्रूनो आदि ने धार्मिक अग्नि कुंडों में अपनी आहुति दे दी थी और न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण बल का आविष्कार कर लिया था , दिन और रात बुद्ध से पहले भी होते थे और अब भी होते हैं। परंतु उस समय यह ज्ञात नहीं हो सका था कि ये किस नियम से होते हैं जब गैलिलियो ने ये बताया कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है और अपनी कीली पर भी घूमती है तो दिन और रात होते हैं। इससे पहले पोप और पादरी लोगों को कहते थे कि सूर्य पृथ्वी का चक्कर लगाता है। हिंदुओं के धर्म शास्त्रों में भी पृथ्वी को स्थिर बताया गया है। बुद्ध ने जगत को गतिशील और परिवर्तनशील बताया परंतु दिन और रात किस नियम से होते हैं ये उनकी जानकारी में नहीं आया। परंतु इसका ये अर्थ निकालना गलत होगा कि जिन वैज्ञानिकों ने ये सब पता लगाया वे बुद्ध से ज्यादा ज्ञानी थे या बुद्ध से अधिक महान थे। नहीं ऐसा निष्कर्ष अनैतिहाासिक और अवैज्ञानिक होगा। कारण है देश और काल की भौतिक सीमाओं का अलग – अलग होना। इसी तरह बुद्ध की तुलना मार्क्स के साथ करना भी बेतुकी बात है। बुद्ध के जमाने में न पूंजीवाद था और न आधुनिक विज्ञान, इसलिए मार्क्स ने वैज्ञानिक नियमों, दर्शन और अर्थशास्त्र आदि विषयों का गहन अध्ययन करके समाज तथा प्रकृति के नियमों का पता लगाया और द्वंद्वात्मक भौतिकवादी नियमों का पता लगाया कि भौतिक जगत किन नियमों से संचालित है और एतिहासिक भौतिकवाद पर द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी नियमों को लागू करके समाज विकास के नियमों का भी पता लगाया और बताया कि उत्पादक शक्तियां और उत्पादन संबंधों का द्वंद्व ही समाज की मुख्य चालक शक्ति है। इसी से समाज आदिम साम्यवादी समाज से दास युग, फिर सामंती युग के रास्ते से पूंजीवादी युग में पहुंचा और अब समाज एक ऐसे युग में प्रवेश कर रहा है जो मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को तो खत्म करेगा ही बल्कि इससे भी आगे वह शोषक और शोषित वर्गों को ही खत्म कर देगा। यह बात मार्क्स और एंगेल्स द्वंद्वात्मक भौतिकवादी दर्शन के आधार पर विश्लेषण करके बताई और साथ ही यह भी बताया कि यह कार्य शोषित मजदूर वर्ग अपना अगुआ दस्ता अर्थात क्रांतिकारी पार्टी बनाकर ही कर सकता है।

[लेख की पहली किश्त यथार्थ (सितंबर 2021) वर्ष 2, अंक 5 में प्रकाशित हुई थी]