ये मोदी की सरकार है, एनडीए की नहीं

ये मोदी की सरकार है, एनडीए की नहीं

July 5, 2024 0 By Yatharth

जनवाद और जनवादी अधिकारों की पूर्ण बहाली की लड़ाई आज मजदूर वर्ग का वास्तविक तात्कालिक राजनीतिक कार्यभार है; मजदूर वर्ग को इसे हर हाल में जीतना होगा, अन्यथा मजदूर वर्ग का अस्तित्व मिट जाएगा तथा दूरगामी लक्ष्य बेमानी हो जाएगा।

I

बैसाखियों पर ही टिकी, लेकिन नरेंद्र मोदी की सरकार फिर से, यानी लगातार तीसरी बार स्थापित हो गई है। इसका मतलब है, हिंदू राष्ट्र के जयघोष के बीच एकाधिकारी वित्तीय पूंजी की खुली-नंगी एवं आतंकी तानाशाही आगे भी जारी रहेगी। पूर्ण विजय की तरफ इसके बढ़ते कदम कुछ देर के लिए मंद और धीमें हो सकते हैं, लेकिन अब और अधिक सधे हुए तथा खतरनाक होंगे। साजिशों का रंग और ज्यादा स्याह हो जाएगा। कोशिशें अधिक गहरी व रहस्यमयी हो जाएंगी। बैसाखियों पर टिके होने का यही वास्तविक अर्थ है।

जाहिर है, देश की आम जनता की बदहाली और बढ़ेगी। विशेषकर इसलिए कि मोदी सरकार द्वारा एक जुलाई से लागू की जा रही भारतीय न्याय संहिता जनता के वे सारे अधिकारों पर ताला लगा देगी जिसके बल पर वह सरकार की गलत नीतियों का अब तक विरोध करती आ रही थी। कोई थानेदार जब चाहे किसी भी सरकार-विरोधी आंदोलनकारी को जेल में सड़ा देने वाली धारा में बंद कर सकता है, इसमें ऐसी व्यवस्था की गई है। अगर इसका माकूल और सफल विरोध नहीं हुआ, तो भारत जल्द ही एक पुलिस स्टेट बन जाएगा। एक स्थाई आपातकाल वाली व्यवस्था बन जाएगी जो इंदिरा गांधी के आपातकाल को भी मात देगी। दूसरा फर्क यह है कि यह चुपके-चुपके और अघोषित रूप से आया है, जबकि इंदिरा गांधी का आपातकाल गाजे-बाजे के साथ आया था।

इसलिए यह एक महत्वपूर्ण सवाल है कि बैसाखियों पर टिके होने का यहां क्या अर्थ लगाए जाए। सोशल मीडिया के एक बड़े हिस्से द्वारा, जो विपक्षी दलों के नेताओं, खासकर राहुल गांधी के स्वर के साथ अपना स्वर मिलाता है, लगातार नरेंद्र मोदी को चेताया जा रहा था कि वे यह याद रखें कि मौजूदा सरकार एनडीए की सरकार है, भाजपा की नहीं। विपक्षी दल के नेता भी इसी स्वर में बात कर रहे थे। वे कहना चाहते थे या मानते थे कि मोदी अब मनमानी नहीं कर सकेंगे। और अगर करेंगे, तो सरकार कभी भी गिर सकती हैं। लेकिन संसद सत्र शुरू होते ही ऐसे तमाम लोगों की बोली बदल गई। विपक्षी समर्थक सोशल मीडिया की तो यह देखकर आंखें फटी जा रही हैं कि भाजपा 303 सीटों से 240 पर आ गई, फिर भी मोदी वही पुराना तेवर कैसे दिखा रहे हैं। स्वयं राहुल गांधी की खुशी काफूर हो गई, जब उनका और खड़गे का लोक सभा और राज्य सभा में माइक बंद कर दिया गया।

सोशल मीडिया और विपक्षी नेताओं की बात ही क्यों करें, सच तो यह है कि प्रगतिशील और मार्क्सवाद-लेनिनवाद जैसे वैज्ञानिक चिंतन से लैस कुछ क्रांतिकारी लोग भी भ्रम में थे कि कुछ हद तक ही सही, लेकिन मोदी के पुराने रवैये में फर्क आएगा और वे मनमानी नहीं कर सकेंगे। इसलिए आज भाजपा विरोधी बड़बोले सोशल मीडिया की तरह ऐसे सारे लोग ही आश्चर्य मिश्रित दुख और भय प्रकट कर रहे हैं। तो क्या वे इससे कुछ सबक लेंगे? शायद नहीं। इसके लिए पहले ईमानदारी से आत्मालोचना करनी होती है जो वे करेंगे नहीं। इसके बदले, वे कुछ और ही तर्क करेंगे। उदाहरण के लिए, वे अब यह कह सकते हैं, या क्या पता कह भी रहे होंगे (क्योंकि वे पहले से भी ऐसा ही मानते रहे हैं) कि ”अगर अमुक राज्य में अमुक पार्टी ये गलती नहीं करती, या चुनाव आयोग वोटों की गिनती और परिणाम घोषित करने में धांधली, आदि नहीं करता, ईवीएम का प्रयोग नहीं होता, तो इंडिया की सरकार बन जाती और मोदी का सारा घमंड चूर-चूर हो जाता तथा फासीवादी ताकतों के होश ठिकाने आ जाते!”

सबसे पहली बात तो यह कि जब हम फासीवादियों की ताकत का मूल्यांकन या सार-संकलन करते हैं और इस पर आधारित हो हार-जीत पर या हार-जीत के बाद की परिस्थिति पर विचार करते हैं और फिर इस आधार पर अपने संघर्ष आदि की रणनीति तय करते हैं, तो ये ही वे चीजें हैं (खासकर बुर्जुआ राज्य की मशीनरियों पर फासीवादी ताकतों की पकड़, जिसमें चुनाव आयोग ही नहीं न्यायपालिका सहित अन्य सारे संस्थान भी शामिल हैं) जिन्हें ध्यान में रखा जाना चाहिए। इसके अलावे फासीवादियों के वर्ग-चरित्र और उसकी खास चारित्रिक विशेषताओं और आज के विश्वपूंजीवाद को अपने पूर्ण आगोश में ले चुके अपरिवर्तनशील चरित्र वाले आर्थिक संकट, आदि को भी ध्यान में रखकर ही मूल्यांकन करना चाहिए और तदनुरूप रणनीति व कार्यनीति बनानी चाहिए। अगर इन सबका ध्यान हम नहीं रखते हैं, तो फिर किसी तरह के मूल्यांकन की जरूरत ही क्या है? बस अपनी आत्मगत इच्छा प्रकट करना ही काफी है। इसलिए हम ऐसे तमाम क्रांतिकारी लोगों को बिरादराना रूप से आगाह करना चाहते हैं कि ”नहीं साथियों, कांग्रेस या विपक्ष की सरकार बनने से फासीवादियों की पराजय सुनिश्चित हो जाएगी इस तरह के भ्रम में मत रहिए। कम से कम अति भ्रम की स्थिति में तो मत ही रहिए। अन्यथा, वास्तविक परिणाम आने पर भारी अवसाद में पड़ जाइएगा। हम जानते हैं, आप यह तो नहीं ही मानते हैं कि विपक्ष के सरकार में आने से मेहनतकशों के जीवन में कोई बुनियादी बदलाव होगा। आप निश्चिंत रहिए, हम भी आपसे इसके बारे में बात नहीं कर रहे हैं। हम आपसे बिना किसी लाग-लपेट के यह कह रहे हैं कि इस अर्थ में भी भ्रम में नहीं रहिए कि आज के विपक्ष की सरकार बन जाने से फासीवादी ताकतों को रोका या इसकी शक्ति को नियंत्रित किया जा सकता है या उसकी वास्तविक पराजय सुनिश्चित की जा सकती है। याद रखिए कि हम उसके समूल नाश की बात भी नहीं उठा रहे हैं। नहीं, बिल्कुल ही नहीं, क्योंकि इसके लिए स्वयं पूंजीवाद का खात्मा जरूरी है। हम तो बस उन्हें रोकने व नियंत्रित करने की बात कर रहे हैं और इस संबंध में ही आपसे यह साफ-साफ कह रहे हैं कि आप अपने आपको शासकवर्गीय (एकाधिकार वित्तीय पूंजी के हितों से घनिष्ठता से जुड़े एवं आलिंगनबद्ध) विपक्ष की सरकार के सहारे फासीवादी ताकतों की बढ़त को रोकने के भ्रम में नहीं रखिए। अन्यथा, आपको और भी ज्यादा विस्मय होगा। दरअसल, जब विपक्ष की सरकार बनेगी, तब कुछ वैसी चीजें एकाएक प्रकट हो जाएंगी, जिसके बारे में आपको आज अंदाजा भी नहीं है। आपको अंदाजा इसलिए नहीं है, क्योंकि आपका मूल्यांकन वस्तुगत नहीं आत्मगत है। आप अतिसुरक्षात्मक तरीके की लड़ाई की बात तक अपने-आपको सीमित कर लेते हैं। इसलिए कई वैसी चीजों का पूर्वानुमान लगाना आपके लिए मुश्किल ही नहीं असंभव हो जाता है। ठीक वैसे ही जैसे 4 जून को चुनाव परिणाम आने के बाद भी आपको यह नहीं पता था कि मोदी सरकार का घमंड चूर-चूर नहीं होने वाला है, या 4 जून को चुनाव परिणाम के आने के ठीक बाद ही मध्य प्रदेश से मुसलमानों का फिर से मॉब लिंचिंग हो जाएगा, या पूरे देश में मुसलमानों पर अत्याचार होने लगेंगे, उनके घरों को ध्वस्त करने का काम शुरू हो जाएगा,  और उससे भी बड़ी बात यह कि संसद के पहले सत्र में आत्मविश्वास से लबरेज विपक्ष और राहुल गांधी द्वारा उसे संसद में उठाया तक नहीं जाएगा या इसका उल्लेख तक नहीं किया जाएगा। इसे आम बात (new normal) मान लिया गया है जबकि यही वह घृणा और वैमनस्य का हथियार है जिसका उपयोग करके मोदी सरकार और उसके लोग वर्तमान संसद में अपने विरुद्ध हो चुके शक्ति संतुलन को अपने पक्ष मे लाने के लिए आगे की योजना बनाएंगे या बनाना शुरू कर चुके होंगे। वर्तमान सत्र में जो मुद्दे विपक्ष उठाने की सोच रहा है, आपको शायद आश्चर्य होगा, उनकी सूचि में भी मुसलमानों पर फिर से शुरू हुआ यह नया अत्याचार का मामला शामिल ही नहीं है। क्या यह सब, जो ‘इंडिया’ विपक्षी गठबंधन कर रहा है, आपकी उम्मीदों के अनुरूप है? अगर हां, तब तो आपको स्वयं ही अपनी सोंच पर विचार करना चाहिए जिसके आधार पर इस विपक्ष की जीत में फासीवादियों की पराजय के बारे में उम्मीद करते हैं। मजदूर वर्ग पर हो रहे हमले तो जाहिर है उनकी प्राथमिकता में नहीं ही है। हम इसके लिए आपको कह भी नहीं रहे हैं।

दरअसल, फासीवाद के उभार के बारे में ऐसे लोग वर्ग आधारित ठोस विश्लेषण नहीं करते हैं। वे इससे प्राय: कतराते हैं। असली बात उनका यह विश्वास है कि फासीवादी ताकतों की बढ़त को रोकने का काम ये विपक्षी दल ही करेंगे या कर सकते हैं, जबकि सच्चाई कुछ और है। चुनावोपरांत यह जल्द ही दिख भी जाता है। लेकिन फिर भी जब चुनाव का वक्त आता है तो वे शासक वर्गीय विपक्षी ताकतों को जिताने की दिशा मात्र पर ही भरोसा करते हैं। यही कारण है कि मजदूर वर्ग तथा आम जनता के उभार के प्रारंभिक लक्षणों को भी देखने या पहचानने, आर्थिक संकट और फासीवादी हमलों के कारण आम जनता पर हो रहे चौतरफा अत्याचार के मद्देनजर निकट भविष्य में किसी जन विस्फोट को आकार लेते देखना, निकट भविष्य में किसी तरह के जन उभार की संभावना पर आश्रित हो ऐसी क्रांतिकारी रणनीति व कार्यनीति बनाने और फासीवादी ताकतों को समूल नष्ट करने और जनवाद की लड़ाई को क्रांतिकारी मजदूर वर्गीय दृष्टि से जीतने की बात करने, और इस तरह फासीवादी ताकतों के विरुद्ध मजदूर वर्गीय क्रांतिकारी दिशा को अभी से जमीन पर उतारने की बात करने से ये पूरी तरह से इनकार करते हैं। यहां तक कि वे व्यवहार में उस जन-असंतोष को भी नकारते हैं जिसके भरोसे ही वे मानते हैं कि विपक्षी दल नरेंद्र मोदी को हरा सकते हैं। एक तरीके से ये जनता की ताकत पर भरोसा करने से अधिक शासक वर्गीय विपक्षी दलों व ताकतों पर भरोसा करते हैं। हालांकि, ऐसा वे इतने खुले रूप में नहीं, लुका-छिपा कर कहते हैं।        

II

दरअसल हमारे समक्ष यह सवाल भी है, क्या एनडीए एक ऐसा गठबंधन है जिसमें वास्तव में भिन्न-भिन्न आर्थिक-सामाजिक वैचारिकी वाले दल हैं? या, क्या एनडीए कभी भी भाजपा विरोधी या मोदी विरोधी था या आगे हो सकता है? सवाल तो यह भी बनता है कि क्या भाजपा-आरएसएस और एनडीए अंतर्वस्तु में अलग-अलग हैं या अलग-अलग बचे रह गए हैं? जिन पिछले दस सालों में देश में जनतंत्र और जनवादी अधिकारों पर तेजी से तथा बड़े हमले हुए, हिंदू राष्ट्र के जयघोष को तेज करते हुए तथा धर्म-राष्ट्र या धार्मिक राज्य की तरफ तेजी से कदम बढ़ाते हुए जनतंत्र के संपूर्ण नाश की ओर कदम बढ़ाए गए, इसी के साथ गरीब तथा मेहनतकश दलितों एवं आदिवासियों पर हमले तेज हुए और जातिगत-समुदायगत अत्याचार में भी काफी इजाफा हुआ, गौ-रक्षा और लव जिहाद तथा हाल में वोट जिहाद का नारा उठाकर मुसलमानों पर हर तरीके से हमले को बढ़ाया गया और उसके खिलाफ बहुमत हिंदू समुदाय को हिंसक रूप से भड़काने की अहर्निश कोशिश की गई, मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने की कोशिश करते हुए उनका दड़वाकरण (ghettoisation) करने की कोशिश की गई और उनके खिलाफ तमाम तरह की साजिशें हुईं, संविधान की अंतर्वस्तु पर अंदर ही अंदर, और यहां तक कि बाहर से भी बड़े हमले हुए, उन दस सालों में अधिकांश समय तक क्या नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू, चिराग पासवान और जीतनराम मांझी, आदि उनके साथ नहीं थे? अगर थे, तो ठीक इन्हीं सवालों पर वे आज भाजपा से अलग क्यों होंगे? हां, वे जरूर उनसे यदाकदा अलग होते रहे हैं, लेकिन तब हुए हैं जब उनको अपने अस्तित्व पर खतरा महसूस हुआ और यह लगा कि भाजपा या मोदी उनके अपने वजूद को या उनके दल के वजूद को खत्म कर देगी। आज भी अगर वैसी कोई परिस्थिति पैदा होती है और अगर उनके समक्ष दूसरा कोई ऑप्सन दिखेगा, तो यह सही है कि वे छिटक सकते हैं। लेकिन दिक्कतें और भी हैं। सीटों की संख्या का गणित कुछ ऐसा है कि उनके हटने से मोदीनीत एनडीए सरकार तो अल्पमत में आती है, लेकिन ‘इंडिया’ की सरकार बनती नहीं दिखती है। दूसरी तरफ, वे यह भी जानते हैं कि देश और दुनिया के बड़े से बड़े वित्तीय थैलीशाह फासीवादी शासन के पक्ष में हैं। वे जानते हैं कि विश्व–पूंजीवाद की आम दिशा जनतंत्र के क्षरण को तेज करने और उसकी जगह फासीवादी तानाशाही या उसके किसी न किसी स्वरूप को स्थापित करने की ओर लक्षित है जिसके अंतर्गत जनवादी अधिकारों का लगभग पूर्ण सफाया होना तय है (जिससे हमारा अर्थ यहां यह है कि एकमात्र क्रांतिकारी उन उभार से ये सब रूक सकता है), और इसलिए आम तौर पर बड़े पूंजीपतियों का वर्ग मोदी के साथ खड़ा है। इसलिए वे जानते हैं कि वे नरेंद्र मोदी से एक सीमा के भीतर ही मोलतोल कर सकते हैं। इससे अधिक की स्थिति न तो है, न ही मोदी देंगे। एक और बात यह है कि सत्ता के लालची लोगों की यह विशेषता होती है कि वे उधर रहते हैं जिधर सत्ता के होने की संभावना अधिक होती है। इसलिए वे जिधर सत्ता है और जिधर उसके आगे भी बने रहने की संभावना अधिक है, उसे छोड़कर वे ऐसे गठबंधन में जाएंगे जहां सत्ता के आने की संभावना न के बराबर है, ऐसी बात भी सोंचना हमारे लिए भारी मूर्खता की बात होगी। तभी तो प्रधानमंत्री का पद ऑफर करने के बावजूद वे मोदी के साथ रहे। यही नहीं, नरेंद्र मोदी ने जो चाहा, वही किया और किसी ने चूं तक नहीं की। जाहिर है, मोदी भी इन दलों के चरित्र और आचरण दोनों से तथा वे क्या कर सकते हैं उससे भली भांति परिचित हैं।      

यह तो स्पष्ट ही है अगर नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी सब कुछ अपनी मर्जी से और अपने पूर्व के फासीवादी एजेंडे के अनुसार ही करने में सफल है या सफल होती दिख रही है, जैसा कि नई लोकसभा के गठन के बाद शुरू हुए पहले संसद सत्र की शुरुआत में दिखा, तो फिर अंतर्वस्तु में तो यह मोदी सरकार ही है। हम इसे चाहे जिस भी नाम से पुकारें, इससे इस सरकार की अंतर्वस्तु पर और जो स्थिति है उसके अंतर्य पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि एनडीए चाहे जो भी हो लेकिन भाजपा की लाइन पर चलने वाला एक पुराना, चिर-परिचित और पूरी तरह परीक्षित (tested) गठबंधन है। कहने का अर्थ है, यह गठबंधन भाजपा-आरएसएस और मोदी-अमित शाह के फासीवादी षड्यंत्रों, योजनाओं व कुकृत्यों का पहले से ही मूकदर्शक बने रहने के साथ-साथ सहभागी रहा है, उसके सारे जनवाद विरोधी, जनतंत्र विरोधी और कम्युनिस्ट एवं अल्पसंख्यक विरोधी, खासकर मुसलमान विरोधी कुकर्मों का बोझ पहले से ही उठाता रहा है। वे आपस में लड़े हैं या एक दूसरे से जुदा हुए भी हैं, तो बस अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिए। मोदी सरकार के एजेंडे से, चाहे वो फासीवादी तानाशाही थोपने का एजेंडा हो या हिंदू राष्ट्र का एजेंडा थोपने का हो, गठबंधन के दलों को कभी कोई परहेज नहीं रहा है। ऐसे दलों का पूरा इतिहास इस अर्थ में दागदार है। ये दल मोदी के फासीवादी एजेंडे के समक्ष बाधा उत्पन्न करेंगे, ऐसी बात सोंचना भी मूर्खता है। ये तो सब कुछ समझते हुए ही इनके साथ पहले से बने हुए हैं। इसलिए मौजूदा सरकार को एनडीए सरकार कहना एक बात है, लेकिन हम अगर इसे वास्तव में एनडीए की सरकार इस अर्थ में समझते हैं कि यह मोदी सरकार नहीं है उससे कुछ भिन्न है, तो ऐसा कर के दरअसल हम अपने को बस मुगालते में रखने का ही काम करेंगे। शब्दों के अंतर से अंतर्वस्तु में फर्क नहीं लाया जा सकता है।

III

तो क्या फासीवाद थोपने का प्रयास कमजोर हुआ है और नरेंद्र मोदी का घमंड चूर हुआ है, जैसा कि कहा जा रहा है? क्या मोदी सरकार के अलोकतांत्रिक रवैये में कोई फर्क आया है? 25, 26, 27 और 28 जून को चले संसद के पहले सत्र में ऐसा कुछ नहीं हुआ जिसके आधार पर ऐसा निष्कर्ष निकाला जा सकता है। उल्टे, इस सत्र में जो हुआ वह यही दिखाता है कि मौजूदा सरकार जो भी करती दिख रही है, वह पिछले दस सालों में मोदी सरकार के द्वारा जो कुछ किया गया पूरी तरह उसकी निरंतरता में है। दरअसल फासीवादी ताकतें इतनी आसानी से नहीं झुकती हैं। नीतीश, चंद्रबाबू नायडू, चिराग पासवान और जीतन राम मांझी जैसे लोग वैसे भी नरेंद्र मोदी के लिए कोई चुनौती नहीं हैं। हम देख सकते हैं कि सारे बड़े तथा मुख्य मंत्रालय ही नहीं, लोकसभा के अध्यक्ष के पद पर भी मोदी ने अपने उन्हीं चहेतों को बैठा दिया जिनके घोर अलोकतांत्रिक व्यवहार को देश पहले देख चुका है। मोदी निरंतरता और अपनी निडरता का अहसास कराना चाहते थे और वे इसमें सफल हुए। इसे लेकर नीतीश कुमार और नायडू द्वारा पाला बदलने का अनुमान लगाया गया था, लेकिन सारे अनुमान धराशाई हो गये। मोदी ने जो चाहा, वही किया और नीतीश कुमार एवं नायडू ने चूं तक नहीं की। आशा के ठीक विपरीत, हम देख सकते हैं कि नई मोदी सरकार का तेवर कुछ ज्यादा ही उग्र है। यह इस बात का संकेत है कि फासीवादी इतनी आसानी से झुकने या पीछे हटने वाले जीव नहीं हैं। हालांकि इसे बार-बार भूला दिया जाता है।

इस बार भी लोक सभा में नीट पर बोलते वक्त राहुल गांधी की माइक बंद कर दी गई। राज्य सभा में खड़गे के साथ यही किया गया। शपथ के समय का नजारा और भी गहरे संकेतों से भरा है। भाजपा सांसदों को हिंदू राष्ट्र का नारा लगाने दिया गया, जबकि विपक्षी सांसदों द्वारा ‘जय संविधान’ का नारा लगाने पर लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला ने कई बार टोका और टिप्पणी की। यही नहीं, इसका विरोध करने पर पांच बार के सांसद रहे दिपेंद्र सिंह हुड्डा के साथ ओम बिड़ला ने ‘चलो बैठो’ की भाषा में तू-तड़ाक तक कर दिया। इसी तरह का व्यवहार जम्मू-कश्मीर के एक मुस्लिम सांसद आगा सैय्यद रुहुल्ला के साथ किया गया। उन्होंने बस पिछली लोकसभा में एक भाजपा सांसद द्वारा एक मुस्लिम सासंद को मुसलमान होने के कारण ‘आतंकवादी’ और ‘कटुआ’ कहे जाने की याद दिलाई थी। साथ में यह भी कहा कि तब के अध्यक्ष, जो ओम बिड़ला ही थे, ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की थी। इसी तरह नीट परीक्षा पेपर लीक, नीट परीक्षा दुबारा लिए जाने एवं एनटीए पर चर्चा की मांग की गई, तो सरकार ने इनकार कर दिया। यानी, संसद में विपक्ष को आवाज उठाने की अनुमति नहीं है। जाहिर है, विपक्ष भी अड़ गया और तब संसद को 1 जुलाई तक स्थगित कर दिया गया। जब संसद में यह स्थिति है, तो समझ सकते हैं कि इसके विरोध में सड़क पर उतरने वालों के प्रति इस सरकार का व्यवहार कितना दमनात्मक होगा।

राष्ट्रपति के अभिभाषण में भी झूठ परोसा गया। पिछले दस सालों में तो यह इसी के लिए पूरी तरह से कुख्यात हो गया है। उदाहरण के लिए, कहा गया कि उत्तर-पूर्व के राज्यों में मोदी सरकार ने स्थाई शांति कायम की है। इस पर विपक्षी सांसदों ने मणिपुर- मणिपुर के नारे भी लगाए, लेकिन संसद टेलीविजन का कैमरा उधर गया ही नहीं। 51 मिनट के राष्ट्रपति अभिभाषण के दौरान नेता सदन मोदी को 73 बार दिखाया गया जबकि नेता प्रतिपक्ष को मात्र 6 बार। इसी तरह सत्तापक्ष को 108 बार दिखा गया जबकि विपक्ष को महज 18 बार। तो हम हर जगह पुराने की निरंतरता का अहसास कर सकते हैं। 

जनतंत्र और जनवाद के प्रति नई मोदी सरकार के हिकारत भरे रवैये में कितनी निरंतरता है यह इससे पता चलता है कि जब राष्ट्रपति महोदया संसद भवन में आ रही थीं तो साथ में, उनके आगे-आगे राजशाही का प्रतीक सेंगौल भी चल रहा था। कैमरे के फ्रेम में भी सेंगौल लगभग हर वक्त छाया रहा।

साफ है, फासीवाद के विरुद्ध संघर्ष में इस विपक्ष की जल्द ही असली अग्नि परीक्षा होने वाली है। साथ में उनकी भी अग्निपरीक्षा होगी जो इन विपक्षी ताकतों पर फासीवाद को हराने के लिए निर्भर होने की दिशा लेते हैं। खासकर, यह देखना है कि गैर-एनडीए या गैर-भाजपा विपक्षी ताकतें फासीवादियों को सत्ताच्यूत करने के लिए और हराने के लिए अगले पांच साल तक, यानी अगले लोकसभा चुनाव तक इंतजार करते हैं या फिर इसका किसी अन्य लोकतांत्रिक तरीके से मुकाबला करने का रास्ता भी लेते हैं।

IV

जहां तक वर्तमान अवस्था एवं परिस्थिति में मजदूर वर्ग की शक्तियों के दायित्व का सवाल है, तो हमें स्पष्टता से यह मानना पड़ेगा कि इसके समक्ष जनवाद और जनवादी अधिकारों की पूर्ण बहाली की लड़ाई को क्रांतिकारी तरीके से जीतने का कार्यभार आ चुका है और वह मजदूर वर्ग से आगे बढ़कर नेतृत्व करने की मांग कर रहा है। जाहिर है, इसमें इसे अपना स्वतंत्र (शासक वर्ग से स्वतंत्र) अस्तित्व, दिशा और रणनीति व कार्यनीति पर सुसंगत एवं वैज्ञानिक रूप से विचार करना होगा।

मजदूर वर्ग के दूरगामी ऐतिहासिक लक्ष्य की बात भी करें, तो इसकी पूर्ति में आज की सबसे बड़ी बाधा फासीवादी शक्तियों व विचारधारा व राजनीति का उभार है जिसकी पूर्ण विजय की संभावना ने तथा इसके द्वारा किये जा रहे चौतरफा हमलों ने एक ऐसी परिस्थिति पैदा कर दी है जिसमें जनवादी अधिकारों की पूर्ण बहाली, सुसंगत मानवोचित न्याय एवं जनवाद के मानकों को नये सिरे से स्थापित करने की लड़ाई एवं इसमें जीत हासिल करना मजदूर वर्ग का तात्कालिक राजनीतिक कार्यक्रम बन गया है। इस जीत को कैसे हासिल किया जाए जिससे हमारे दूरगामी लक्ष्य को धक्का न पहुंचे, आज यह एक यक्ष प्रश्न बन चुका है। यह सच है कि इस तात्कालिक मंजिल की लड़ाई को सफलतापूर्वक लड़े बिना मजदूर वर्ग अपने ऐतिहासिक दूरगामी लक्ष्य को कभी प्राप्त नहीं कर सकेगा। इसलिए मजदूर वर्ग का तात्कालिक लक्ष्य, जिसका अर्थ फासीवादी शक्तियों को जड़मूल से पराजित करना और जनवादी अधिकारों की पूर्ण बहाली की लड़ाई को जीतना है, मजदूर वर्ग के लिए आज इतना महत्वपूर्ण हो गया है। हम मानते हैं कि दोनों उद्देश्यों व कार्यभारों के बीच कोई चीनी दीवार नहीं खड़ी है। लेकिन तात्कालिक कार्यक्रम व कार्यभार को इस तरह से परिभाषित करना जरूरी है जिससे इसकी सफलता के जरिये दूरगामी लक्ष्य तक पहुंचने में मदद मिले।

इसकी पहली शर्त यह है कि मजदूर वर्ग और इसकी अगुआ शक्तियों को जनवादी अधिकारों की रक्षा और इसकी पूर्ण बहाली की लड़ाई की अगुआई करने की प्रतिस्पर्धा में उतरना चाहिए। जैसा कि ऊपर वर्णित है कि इस तात्कालिक मंजिल में जीत हासिल करने का लक्ष्य फासीवादी शक्तियों की पूर्ण पराजय को सुनिश्चित करना और समाज एवं सत्ता के हर प्रतिष्ठान से उन्हें बाहर निकालना है। आज की परिस्थिति में, जबकि पिछले दस सालों के मोदी शासन में फासीवादी शक्तियों का काफी विस्तार हुआ है, इस कार्यभार पर गौर करें, तो हमें पता चलता है कि यह कार्यभार जनता के एक देशव्यापी उभार और इस जन-उभार के अंग के रूप में उभरे जनता के निकायों द्वारा गठित एक असल जनवादी सरकार, जो एकाधिकारी पूंजी के हितों को पूरा करने के बंधन से पूरी तरह मुक्त होगी, और जनता के समस्त हिस्सों के व्यापकतम जनवादी अधिकारों की गारंटी हेतु कटिबद्ध होगी, के गठन के बिना संभव नहीं होगा। इसका मतलब है कि फासीवादियों को हराने एवं जनवादी अधिकारों की पूर्ण बहाली की लड़ाई में नीचे से दबाव बनाने के अलावा ऊपर से यानी जनता की वास्तविक जनवादी सरकार के गठन से लेकर इसमें शामिल होने का मसला उपस्थित होता है। आइए, इस पर संक्षेप में लेकिन थोड़ी गहराई से बात करें।   

क्या नीचे से फासीवादी शक्तियों के खिलाफ होने वाले देशव्यापी जन-उभार का अंतिम परिणाम या ठौर कोई ऐसी जनता की सरकार नहीं हो सकती है जो इसके अंग के रूप में काम करेगी? निस्संदेह, हमारा मानना है कि ऐसा हो सकता है। साथ में, हम ऐसा ही होते देखना चाहेंगे, जबकि एकाधिकारी पूंजी की सभी पार्टियां (सत्तापक्ष या विपक्ष) इसे किसी भी कीमत पर नहीं होने देना चाहेंगी और निस्संदेह इस जन-उभार को अपने दायरे में सीमित रखने की हरचंद कोशिश करेंगी। लेकिन अगर ऐसा जन-उभार फिर भी होता है और इसकी जीत होती है, जिसकी संभावना नजर आती है, तो इसका मतलब यह भी होगा कि एक सरकार भी संसद और सड़कों के मिलेजुले संघर्षों के बल पर कायम होगी जो इस जन-उभार का अंग होगी, और फासीवादी शक्तियों को समाज और सत्ता से बाहर निकालने का काम यही सरकार करेगी। ऐसी जनता की सरकार निश्चित ही एक संक्रमणकारी जनवादी व्यवस्था को जन्म देगी। हमारा मानना है कि ऐसे जन-उभार से निकली सरकार में मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी शक्तियों को शामिल होना चाहिए ताकि जनवाद की लड़ाई को जीतने के संघर्ष में हम नीचे से और ऊपर से, दोनों तरफ कार्रवाई कर सकें। इससे हमें दूरगामी लक्ष्यों को पूरा करने में असाधारण मदद मिलेगी इसमें कोई संदेह नहीं है। इसलिए तात्कालिक लक्ष्य व कार्यभार को पूरा करने में हमें अपनी पूरी ताकत जन-उभार की परिस्थितियों को परिपक्व होने में मदद देने और इसके अंग के रूप में एक जनता की सरकार के गठन में लगानी चाहिए। यह हमारे दूरगामी लक्ष्य और तात्कालिक लक्ष्य के बीच की एक अहम तथा आवश्यक कड़ी है जिसकी प्रकृति जनवादी, अंतर्वर्ती और संक्रमणकारी है। लेकिन इसकी शर्त यह है कि मजदूर वर्ग भी इस जन-उभार का एक बड़ा हिस्सा हो और अन्य तमाम वर्गों की तुलना में हम उसे सचमुच में तथा हर मायने में आगे-आगे चलने के लिए प्रशिक्षित कर सकें। हमें फासीवाद के विरुद्ध अपनी लड़ाइयों में अपना पूरा ध्यान इस संभावना को अमली जामा पहनाने की तरफ केंद्रित करना चाहिए।

हमें अपनी भूमिका को सिर्फ नीचे से दबाव बनाने तक सीमित नहीं करना चाहिए। अपितु, ऊपर से भी दबाव बनाने के काम को हाथ में लेना चाहिए, हालांकि जो तभी संभव है जब देश में एक फासीवाद विरोधी व्यापक जन-उभार की परिस्थिति मौजूद हो और यह जन-उभार एकाधिकारी पूंजी के हितों से बंधी पार्टियों के दायरे और उसकी राजनीति के प्रभाव से मुक्त हो। इसलिए हमें इसकी अगुआई करने के लिए शुरू से ही तैयारी करनी चाहिए। मजदूर वर्ग के वर्तमान एवं तात्कालिक राजनीतिक उद्देश्य व कार्यक्रम की पूर्ति करने का सबसे कारगर, सार्थक एवं जुझारू तरीका यही हो सकता है और है। हमें यह बात याद रखनी चाहिए कि जब हम एक जन-उभार की परिस्थिति में एकमात्र नीचे से दबाव बनाने तक अपने को सीमित रखते हैं, तो इसका अर्थ यह है कि इस लड़ाई के अंतिम ठौर व परिणाम को, यानी इस लड़ाई में प्राप्त हुई जीत के परिेणामस्वरूप बनने वाली सरकार को, हम एकाधिकारी पूंजी की ही पार्टियों के हवाले कर देते हैं। वहीं, अगर हम ऊपर से भी दबाव बनाने की रणनीति पर काम करने की नीति अख्तियार करते हैं, तो जाहिर है कि एक सफल लड़ाई के फलाफल को, यानी जन-उभार से बनने वाली क्रांतिकारी जनवादी सरकार में हम शामिल हो सकते हैं एवं उसकी अगुआई भी कर सकते हैं और अवसर आने पर उसे मजदूर वर्ग के ऐतिहासिक लक्ष्य को पूरा करने के लिए इस्तेमाल भी कर सकते हैं। दोनों लक्ष्यों व कार्यभारों के बीच कोई चीनी दीवार खड़ी नहीं है और न ही करने की जरूरत है।

यहां साफ है कि ऊपर जो कहा गया है उससे जन-असंतोष का उपयोग कर बनने वाली विपक्ष की सरकार, जो एकाधिकारी पूंजी के हितों से ही बंधी सरकार होगी, में शामिल होने की नीति स्वत: ही कट जाती है। दरअसल यह पूरी रणनीति हमें जन-उभार से पैदा हुई एक ऐसी संक्रमणकालीन एवं अंतर्वर्ती व अस्थाई जनता की सरकार की स्थापना की लड़ाई को हाथ में लेने के लिए तैयार करने को प्रेरित करती है जो फासीवादी लूट-खसोट की नीति के खिलाफ मजदूर-मेहनतकश वर्ग के साथ-साथ निम्नपूंजीवादी एवं निम्न मध्यवर्गीय तबकों, किसानों, छोटी एवं मंझोली पूंजी के मालिकों के बीच व्याप्त जन-असंतोष के गर्भ से पैदा हुए एक व्यापक जन-उभार के अंग के बतौर काम करेगी, न कि एकाधिकारी पूंजी के हितों को पूरा करने वाली किसी सामान्य सरकार के बतौर। जन-उभार से निकली और इसके अंग के रूप में कार्य करने वाली ऐसी जनवादी सरकार ही फासीवादियों को पूरी तरह पराजित करने का काम कर सकती है और इसमें मिली सफलता के बाद ही मजदूर वर्ग का अपने ऐतिहासिक लक्ष्य की ओर बढ़ना सुगम हो सकता है। आम जनता के इस गाढ़े वक्त में फासीवादी हमले से उनकी मुक्ति के लिए ली जाने वाली सही रणनीति से ही मजदूर वर्ग के दूरगामी लक्ष्यों की पूर्ति का रास्ता निकलता है।

यहां ध्यान देने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि फासीवादी शक्तियों के खिलाफ एक ऐसा व्यापक जन-उभार, जो अपने अंग के रूप में किसी जनता की सरकार को जन्म दे, एकमात्र तभी उत्पन्न हो सकता है जब जन-असंतोष ज्यादा से ज्यादा गहरा हो, एकाधिकारी पूंजी के हितों से जुड़े सभी दलों से उसका मोहभंग पूरा हो गया हो और उनके तमाम दांवपेंचों से जनता अवगत हो चुकी हो। इसका अर्थ यह है कि मजदूर वर्ग की शक्तियों को अपनी आत्मगत शक्तियों में काफी इजाफा करना होगा, अन्यथा इस पूरी रणनीति का कोई वास्तविक अर्थ या फलाफल नहीं निकलेगा।

इससे जुड़ा अंतिम सवाल यह है कि क्या इसकी जमीन तैयार हो चुकी है? नहीं। लेकिन हम देख सकते हैं कि तैयारी हो रही है। अपेक्षाकृत कम तेजी से हो रही है लेकिन पहले की तुलना में तेजी से तैयार हो रही है। हम इसे वर्तमान लोक सभा के चुनावों के दौरान हुए घटनाक्रम में भी देख सकते हैं। हम देख सकते हैं कि नई सरकार के बाद भी जन उभार की परिस्थितियों में और इजाफा होने की संभावना ही प्रकट हो रही है। चुनाव परिणामों से इतर भी सत्ता पर कब्जे के लिए फासिस्ट ताकतों और विपक्ष के बीच टकराव बढ़ रहा है। साम्राज्यवादी युद्ध के विस्तार से भी जनता की दुख-तकलीफ बढ़ रही है। इन सबसे कुछ वैसी दरारें पैदा ले सकती हैं जिनसे जनता का विक्षोभ एकबारगी फूट पड़े और वस्तुगत परिस्थिति में एकाएक सकारात्मक बदलाव हो जाए। हां, अगर आत्मगत शक्तियां उसी अनुपात में नहीं बढ़ेंगी तो इस शानदार वस्तुगत परिस्थिति का हम फायदा नहीं उठा पाएंगे, यह सच है। हम उम्मीद करते हैं कि आत्मगत शक्तियां भी उपरोक्त वस्तुगत परिस्थितियों के आलोक में तेजी से बढ़ेंगी।