नीट पेपर लीक प्रकरण : पतनशील पूंजीवाद व आक्रामक फासीवाद के दौर में युवाओं के भविष्य पर एक और बड़ा प्रहार

नीट पेपर लीक प्रकरण : पतनशील पूंजीवाद व आक्रामक फासीवाद के दौर में युवाओं के भविष्य पर एक और बड़ा प्रहार

July 5, 2024 0 By Yatharth

नीट (यूजी) 2024 पेपर लीक घोटाले से आहत लगभग 24 लाख युवा आवेदक अभी उबरे नहीं थे कि केंद्रीय सरकार द्वारा यूजीसी नेट परीक्षा के परिणाम रद्द किये जाने एवं सीएसआईआर नेट व नीट (पीजी) परीक्षाओं के स्थगित किये जाने के फरमान से अन्य युवा उम्मीदवार भी स्तब्ध, निराश और आक्रोशित हैं। सरकार का दावा है कि उसने ‘छात्रों के सर्वोत्तम हित’,’परीक्षा प्रक्रिया की पवित्रता बनाए रखने’ और ‘तार्किक कारणों’ से यह फैसले लिए। हालाकि, वास्तव में यह फैसले एकतरफा, अनुचित और आपत्तिजनक हैं जिसने न सिर्फ लाखों युवाओं के वर्त्तमान और भविष्य को दाव पर लगा डाला है बल्कि सरकार के चरित्र और नैतिकता पर भी बड़ा सवाल खड़ा किया है। सरकार की बहानेबाजी और झांसे में युवा उलझते हुए नहीं दिख रहे।

बिहार, गुजरात, ओडिशा समेत अन्य जगहों में पेपर लीक की घटनाओं में कई अभिनेताओं की मिलीभगत, कोचिंग सेंटरों और पेपर लीक माफिया में आपसी सांठ गांठ की खबरें, भारी कटऑफ, अंकन प्रणाली में विसंगति के कारण 67 छात्रों को 720/720 के पूर्ण स्कोर के साथ आल इंडिया रैंक 1 प्राप्त होना, एक स्थानीय भाजपा नेता के स्वामित्व वाले परीक्षा केंद्र (झज्जर, हरियाणा) से छह टॉपरों का अविश्वसनीय ‘संयोग’ के तहत उभरना, राष्ट्रीय परिक्षण एजेंसी (एनटीऐ) द्वारा 1563 उम्मीदवारों को अनुग्रह अंक (ग्रेस मार्क्स) देने का मनमाना निर्णय, जांच से बचने के लिए लोकसभा चुनाव के नतीजे के दिन ही परिणामों की घोषणा किया जाना और प्रदीप जोशी (वर्तमान एनटीए अध्यक्ष) को उन्ही के कार्यकाल में हुए घोटाले की जांच हेतु प्रमुख बनाया जाना – यह सब भ्रष्टाचार की कई सतहों को उजागर करता है और इसने उन तमाम महत्वाकांक्षी युवा-युवतियों को एक बेहद गंभीर झटका दिया है। लगातार तीन वर्षों से तैयारी में समर्पित रही 18 वर्षीय बागीशा का नीट (यूजी) परिणाम आने उपरांत आत्महत्या कर लेना, शिक्षा प्रणाली में व्याप्त बहुआयामी संकट की अभिव्यक्ति है। यह यूंही नहीं है कि 2021 में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार 13,000 से भी अधिक छात्रों ने (पांच सालों में उच्चतम स्तर) आत्महत्या की। 2020 में हर 42 मिनट में एक छात्र ने अपनी जान गवाई। हालांकि लांसेट अध्ययन (ग्लोबल बर्डन ऑफ डिसीज रिपोर्ट) अनुसार एनसीआरबी द्वारा जारी आत्महत्या दर लगभग 37 प्रतिशत कम थी!

राज्य पुलिस द्वारा गिरफ्तारियां, सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालयों में दायर याचिकाओं की बौछार को देखने के लिए एनटीए द्वारा शिकायत निवारण समिति का गठन, दोषियों के खिलाफ कार्यवाई करने के लिए राज्य स्तर पर आर्थिक अपराध शाखा (इकनोमिक ओफेंसेज विंग) और सीबीआई का शामिल किया जाना, केंद्र सरकार द्वारा एनटीए की संरचना, प्रक्रियाओं, डेटा प्रबंधन और सुरक्षा प्रोटोकॉल को बढ़ाने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन, 21 जून को सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों का रोकथाम) अधिनियम, 2024 का पारित किया जाना जिसमें 10 साल की जेल की सजा व 1 करोड़ तक के जुर्माने का सख्त दंड प्रावधान है और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप में यह कहा जाना कि ‘यदि किसी की भी ओर से 0.001% लापरवाही है, तो उस पर कार्यवाई की जानी चाहिए। बच्चों ने परीक्षा की तैयारी की है। हम उनके श्रम को नहीं भूल सकते’- इन सारे कदमों के उठाये जाने के बावजूद पीड़ितों को यह खोखले ‘न्याय’ जैसा ही प्रतीत हो रहा है क्योंकि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सम्मानजनक रोजगार करोड़ों के लिए महज एक सपना बनकर रह गया है। जमीनी परिस्थितियों में ठोस बदलाव नहीं होते देख यह सतही कार्यवाइयों के पीछे की मंशा को युवा वर्ग समझने लगा है। हालांकि सत्ता में बैठी सरकार की क्षति नियंत्रण और प्रतिष्ठा बचाने की इन रणनीतियों से अस्थायी रूप से आक्रोश पर काबू पाने में इस बार सफलता मिली है, लेकिन पतनशील पूंजीवाद के दौर की नवउदारवादी नीतियों के बहुमुखी हमलों से जनित सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली की दयनीय स्थिति ने युवा आबादी और केंद्र में बैठी फासीवादी सरकार के बीच बुनियादी दरार को बढ़ाना शुरू कर दिया है और यह आगामी दिनों में संघर्षशील मेहनतकश जनता के विस्फोट में अपना योगदान अवश्य ही देगी।

नीट यूजी परीक्षा को रद्द करने और पुनर्परीक्षा या पुनर्मूल्यांकन की मांगें छात्रों और उनके परिवारों द्वारा विरोध प्रदर्शनों में जोरदार तरीके से अभी भी उठाई जा रही हैं। देश भर में असंतोष कम नहीं हुआ है। विडंबना यह है कि धांधलीयुक्त परीक्षा होने के बावजूद, सर्वोच्च न्यायालय ने बिना रोक लगाए काउंसलिंग प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का निर्दयी फैसला सुनाया, जिससे घोटाले को एक तरह से हरी झंडी मिल गई! जब पेपर लीक की घटनाएं पहली बार सामने आई थीं, तो यह उल्लेखनीय है कि सत्तारूढ़ सरकार ने पेपर लीक की घटनाओं को ‘पूरी तरह से निराधार और बेबुनियाद’ बताकर खारिज कर दिया था। वो तो बाद में जनता के दबाव में उनको कार्यवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ा। अभी हाल ही में यह देखा गया कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान, जो कई दिनों से विवादों के केंद्र में हैं, ने 21 जून को ‘योग दिवस’ कार्यक्रम के अवसर पर दिल्ली विश्वविद्यालय का दौरा करने का दुस्साहस दिखाया। छात्रों के तीखे विरोध ने उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।

यह भी गौर किया जाना चाहिए कि हाल ही में एक कार्यकर्ता द्वारा दायर आरटीआई ने वर्तमान एनटीए अध्यक्ष प्रदीप जोशी और आरएसएस-बीजेपी के बीच घनिष्ठ संबंधों को उजागर किया है। आरटीआई के जवाब में बताया गया है कि जोशी, जो एनटीए प्रमुख बनने से पहले एमपीपीएससी (एमपी लोक सेवा आयोग), सीपीएससी (छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग) और यूपीएससी के अध्यक्ष के रूप में कार्य कर चुके थे, ने आरएसएस कार्यकर्ताओं द्वारा दबाव बनाये जाने के माध्यम से नियुक्तियां हासिल की थीं। यह उनके कार्यकाल के घोटालों और जनविरोधी नीतिगत निर्णयों के पीछे की सच्चाई और उनके प्रतिगामी वैचारिक झुकाव को दिखलाता है।

नीट यूजी घोटाला परीक्षा के संचालन में निहित भ्रष्टाचार का एक अकेला मामला नहीं है। वास्तव में, रिपोर्टें बताती हैं कि पिछले सात वर्षों में अकेले 70 से भी अधिक पेपर लीक हुए हैं, जिससे औसतन दो करोड़ उम्मीदवारों का रोजगार प्रभावित हुआ है। इस वर्ष उत्तर प्रदेश पुलिस कांस्टेबल भर्ती परीक्षा में पेपर लीक का मामला, शिक्षा क्षेत्र में निजीकरण द्वारा बनायी गई गहरी पैठ का एक सटीक उदाहरण है। जिस परीक्षा में 43 लाख उम्मीदवार मात्र 60,244 सीटों के लिए बैठे, उसमें सरकार ने एक अहमदाबाद की कंपनी एडुटेस्ट सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड को परीक्षा आयोजित करने का ठेका दिया जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न शहरों में पेपर लीक की घटनाएं सामने आईं, 402 लोगों की गिरफ्तारी हुई और परीक्षा रद्द कर दी गई। फर्म के मालिक विनीत आर्य फरार हैं और यूपी पुलिस के समन से बच रहे हैं। द वायर की रिपोर्ट में सामने आया कि यह कंपनी कई राज्यों में पेपर लीक और भर्ती घोटाले के आरोपों से घिरी हुई है और इसके संस्थापक निदेशक सुरेशचंद्र आर्य ‘सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा’ नामक एक प्रमुख हिंदू संगठन के अध्यक्ष हैं जिनके कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री समेत तमाम बड़े भाजपा नेता शामिल होते आये हैं। बावजूद इसके कि विनीत आर्य को 2017 में जेल हो चुकी थी, उन्हें धड़ल्ले से परीक्षा आयोजन के संबंध में कॉन्ट्रैक्ट दिए गए! किस तरह से हिंदुत्ववादी संगठनों और कॉर्पोरेट कंपनियों का गठजोड़ मुनाफे के चक्के तले युवाओं के जीवन में तबाही ला रहा है, यह समय के साथ और भी स्पष्ट होता जा रहा है।

इन प्रकरणों को भाजपा शासित राज्य मध्य प्रदेश में हुए कुख्यात व्यापम (मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा बोर्ड) घोटाले (1990-2013) के आलोक में भी देखा जाना चाहिए। व्यापम, एक ‘स्व-वित्तपोषित और स्वायत्त’ निकाय जिसे राज्य सरकार ने मेडिकल छात्रों, राज्य सरकार के कर्मचारियों (कांस्टेबल, पुलिस कर्मचारी, स्कूल शिक्षक आदि) के लिए कई प्रवेश परीक्षाएं आयोजित करने के लिए शामिल किया था, ने एक ऐसी प्रणाली को जन्म दिया जिसमें उत्तर पुस्तिकाओं में हेराफेरी, नकल करने वालों को अनुमति, उत्तर कुंजी का लीक होना और बिचौलियों, राजनेताओं, नौकरशाही, कोचिंग संस्थानों और अयोग्य छात्रों के एक समूह के हितों के अनुरूप उत्तर पुस्तिकाओं और अभिलेखों में हेराफेरी करना आम बात बन गई। असल में, निराशाजनक वस्तुगत स्थिति ऐसी है कि शीर्ष पर बैठी फासीवादी सरकार, मेधावी छात्रों और कामकाजी उम्र के युवाओं के विशाल समूह को असंतुलित एवं एकतर्फी शिक्षा प्रणाली की अश्लील वास्तविकता को आत्मसात करने और एकाधिकारी पूंजीवादी वर्ग के लिए उजरती मजदूर बनने के लिए मजबूर कर रही है। जो कुछ हजार लोग इस बाधा (परीक्षा) को पार कर शिक्षा और नौकरी पाने में सफल होते भी हैं, उन्हें भी ऐसे दमघोंटू वातावरण में काम करना पड़ता है जो उनकी बौद्धिक क्षमताओं और वैज्ञानिक-प्रगतिशील दृष्टिकोण को बलपूर्वक रूप से दबाता है, उन्हें असुरक्षित कार्य और जीवन स्थितियों के अधीन करता है तथा उन्हें पूंजीवाद के हित व अपने अहित में कार्य करने के लिए मजबूर करता है।

शिक्षा में संकट की व्यापकता और युवा उम्मीदवारों की कठिन वास्तविकताओं ने उन पर एक भ्रमित करने वाला प्रभाव भी डाला है कि अंततः आखिर किसको घोटालों के लिए जवाबदेह व दोषी ठहराया जाए? क्या यह संकट की दास्तां नीट जैसी ‘केंद्रीकृत’ परीक्षाओं को लाने से शुरू होती है या सभी प्रकार की परीक्षाओं के संचालन के लिए एनटीए नामक एक ‘केंद्रीकृत, स्वायत्त’ एजेंसी के लाये जाने से या राष्ट्रीय शिक्षा नीति (नेप) 2020 से जो शिक्षा को पूरी तरह से ‘बाजारी माल’ में बदलने का एक मॉडल है या फिर 1990 के दशक में अस्तित्व में आई नव-उदारवादी नीतियों से या खुद सड़ती हुई पूंजीवादी व्यवस्था से? हम जितना उंचाई से देखेंगे, व्यवस्थागत सड़न व टूट-फूट की तस्वीर उतनी ही स्पष्ट होती जाएगी।

2021 में प्रकाशित हुई ए.के. राजन समिति की रिपोर्ट ने नीट जैसी केंद्रीकृत प्रतियोगी परीक्षाओं में सामाजिक-आर्थिक पूर्वाग्रह को उजागर किया था, जिसके चलते छात्रों के नामांकन में भारी कमी आई है। कम पारिवारिक आय, ग्रामीण और गैर-अंग्रेजी पृष्ठभूमि के कारण युवाओं का एक बड़ा हिस्सा प्रवेश स्तर पर ही छंट जाता है एवं हाशिए पर खड़े समुदायों के छात्र भी असमान रूप से प्रभावित होते हैं। 140 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले देश में 35 साल से कम उम्र के 65% से ज्यादा लोग हैं और दूसरी ओर 706 मेडिकल कॉलेजों में सिर्फ 1,08,915 सीटें उपलब्ध हैं, जिनमें से महज 55,000 सीटें सरकारी मेडिकल कॉलेजों में हैं! बाकी सीटें महंगे निजी मेडिकल कॉलेजों के खाते में चली गयी हैं। 2023 तक, शिक्षा में निजी मेडिकल कॉलेजों की हिस्सेदारी बढ़कर 47.6% हो गई जो कि लगभग आधे के बराबर है! उन एक लाख सीटों के लिए (प्रभावी रूप से 55,000 सीटें क्योंकि निजी कॉलेजों की फीस 60 लाख से शुरू होती है!), कुल 24 लाख आवेदकों ने इस साल पंजीकरण कराया, जिससे अकेले प्रवेश शुल्क के रूप में 400 करोड़ की राशि सीधे एनटीए की जेब में गई! यदि भोजन, आवास, यात्रा और कोचिंग के खर्चों का हिसाब लगाया जाए, तो अत्यधिक हस्तगतकरण (appropriation) स्पष्ट हो जाएगा।

ऑक्सफैम वेल्थ इनइक्वालिटी रिपोर्ट जिसमें कि देश की 77.4% संपत्ति पर 10% आबादी और 4.8% संपत्ति पर सबसे निचले 60% आबादी के स्वामित्व को रेखांकित किया गया है, भौतिक स्थितियों की कड़वी सच्चाई पर प्रकाश डालती है। इसके अलावा, शोध से पता चलता है कि ऐसी परीक्षाएं शिक्षा के ‘फैक्ट्री मॉडल’ पर आधारित हैं, जो एक ओर याद रखने की क्षमता एवं ज्ञान के दुहराव को पुरस्कृत करने और दूसरी ओर संज्ञानात्मक तर्क व आलोचनात्मक सोच को कम करने के लिए संरचित हैं, जिसकी वजह से अकुशल डॉक्टरों की संख्या में बढ़ोत्तरी आई है। मुनाफे की हवस से संचालित यह प्रतिगामी व्यवस्था की ‘अराजकता’ इससे साबित होती है कि एक तरफ डॉक्टर-मरीज का अनुपात बेहद खराब है (1000 मरीजों पर 0.7 डॉक्टर है, जबकि एक आम इंसान स्वास्थ्य सेवा का 70% खर्च खुद की जेब से करता है!) तो दूसरी तरफ सार्वजनिक बुनियादी ढांचे की सिकुड़न, योग्य एवं कर्मठ युवाओं की विशाल आबादी को एक बढ़िया जीवनस्तर एवं सामाजिक उत्थान में योगदान करने से लगातार वंचित करती आ रही है! यह ‘आपदा में अवसर खोजने’ वाली व्यवस्था बल्कि निजीकृत स्वास्थ्य एवं शिक्षा प्रणाली के बल पर मरीजों के अधिभार और युवा उम्मीदवारों की बड़ी संख्या का सरमायेदारों के हित में इस्तेमाल करती है। कोचिंग ‘उद्योग’ इस हद तक फल-फूल रहा है कि वह अपनी आय को ‘वित्त बाजार की सट्टेबाजी’ में एवं जन-विरोधी राज्य तंत्र को बनाए रखने के लिए ‘चुनावी बांड’ में निवेश करता आ रहा है।

इसी तरह, एनटीए की स्थापना, जिसे ‘स्वायत्त और आत्मनिर्भर परीक्षण संगठन’ के रूप में प्रचारित किया गया –  वह कॉरपोरेट हाथों में नियंत्रण के केंद्रीकरण की दिशा में बढ़ाया गया एक और कदम के अलावा और कुछ नहीं था। वह परीक्षा प्रणाली के लोकतंत्रीकरण के खिलाफ था। एक ही झटके में, अब इसके पास डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, नौकरशाह, सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारी आदि बनने के इच्छुक उम्मीदवारों का भविष्य तय करने की शक्ति आ गयी! यह नई शिक्षा नीति का एक उप-उत्पाद (by product) है। एक ऐसी नीति जिसने शिक्षा के व्यावसायीकरण के लिए बहुराष्ट्रीय निगमों और बड़े निजी निवेशकों को खुली छूट देने का मास्टर प्लान तैयार किया, शिक्षा के उद्देश्य से उलट उसे एकरूपता पर आधारित किया, फासीवादी व्यवस्था के लिए प्रतिक्रियावादी जन आंदोलन को मजबूत करने हेतु सांप्रदायिक-जातिवादी-पितृसत्तात्मक-राष्ट्रवादी विचारों के बीज बोए और बेरोजगारों की रिजर्व सेना (वास्तविक मजदूरी पर नीचे की ओर दबाव बनाए रखने के लिए) एवं निम्न वेतन वाले ठेका मजदूरों के उत्पादन को आगे बढ़ाने की जमीन निर्मित की। बेहतर भविष्य के झूठे और खोखले वायदों से लिप्त, निजीकरण की अपनी संतान ‘एनईपी’, युवाओं को मध्ययुगीन बर्बरता की ओर धकेले जाने के लिए ही निर्मित है। बहुत ही चतुराई से, शिक्षा नीति ने पाठ्यक्रम-शिक्षणशास्त्र (curriculum-pedagogy) को उत्तर-आधुनिक तर्कसंगतता को प्रधानता देने हेतु ढाला है ताकि वस्तुनिष्ठ सत्यता (objective truth) के दृष्टिकोण से छात्रों को अलग किया जा सके। यह विचारों को दबाने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करने की ओर एक व्यवस्थित कदम है जो कि संस्थानों को फासीवादी गुंडों के शासन के अंतर्गत डाल देता है। अगर कोई इस गलतफहमी में है भी कि ऐसी व्यवस्था कम से कम ‘सबसे योग्य लोगों’ को जीवित रहने की अनुमति देती है, तो यह याद रखने की जरूरत है कि ऐसे लोग जो प्रमुख संस्थानों तक पहुंचते हैं, उन्हें भी कॉर्पोरेट आकाओं के हुक्म का पूरे अनुशासन से पालन करना पड़ता है!

सरकार के दुस्साहस की पराकाष्ठा को तो देखिये जरा – उसने ‘परीक्षा आयोजित करने’ जैसे बुनियादी काम को भी निजी हाथों में सौंप दिया जिससे कि एजेंसी पैसे बनाने और लाखों लोगों के भविष्य से खिलवाड़ करने के लिए कानून से प्रतिरक्षित और स्वतंत्र रहे! क्या सरकार सीधे स्वतंत्र, निष्पक्ष और सुरक्षित तरीके से परीक्षा आयोजित नहीं कर सकती थी? जी हां, सरकार इसकी पूरी जिम्मेदारी ले सकती थी लेकिन हम सब जानते हैं कि वह इस काम को अपने मत्थे क्यों ही लेगी जब उसके अस्तित्व का एकमात्र उद्देश्य अपने पूंजीवादी आकाओं की सेवा करना और समाज के हर वर्ग – मजदूर, किसान, छोटे व निम्न पूंजीपति, उत्पीड़ित व अल्पसंख्यक समुदाय, युवा और महिला, का शोषण और अधिग्रहण करके, उनके खजानों को सुपर प्रॉफिट से भरना है। दिन प्रतिदिन बदलती परिस्थितियां इस ओर इशारा कर रही हैं कि राज्य और उसके नागरिकों के बीच का ‘सामाजिक अनुबंध’ अर्थविहीन हो चुका है क्योंकि तानाशाही ने उसकी जगह ले ली है। इस सवाल का हमें ईमानदारी से जवाब देना चाहिए – क्या लोकतंत्र के सूक्षतम रूप में जीत के प्रति असहिष्णु होने पर एवं अपनी बुनियादी मौलिक जिम्मेदारियों का पूर्णत्याग करने पर, राज्य ने अपना नैतिक आधार नहीं खो दिया है?

मित्रों, पतनशील, घिसटते और आक्रामक होते पूंजीवाद व उसकी प्रभंधन कमिटी यानी ‘फासीवादी सरकार’ के हित शिक्षा और रोजगार के उद्देश्य के बिल्कुल विपरीत हैं एवं सामाजिक विकास के क्रम के ठीक उलट है। मोदी शासन के एक दशक पर नजर डालें तो भौतिक साक्ष्य बताते हैं कि सरकार ने हर साल शिक्षा के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का केवल 0.44% ही आवंटित किया, छात्रवृत्ति योजनाएं छीन लीं, प्राथमिक-माध्यमिक विद्यालयों के बुनियादी ढांचे को तहस-नहस कर दिया जिससे नामांकन में भारी कमी आई, निरक्षरता बढ़ी, उच्च शिक्षा में HEFA ऋण फीस वृद्धि के जरिये थोपा गया, शोध के लिए फंड में कटौती, वजीफे (स्टाइपेंड) में विलम्ब और शिक्षकों में तदर्थवाद (ad-hocism) को बढ़ावा दिया गया। देश की अर्थव्यवस्था में रोजगार का संकट गहराता जा रहा है, बेरोजगारी दर 45 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है और काम का बड़े पैमाने पर अनौपचारिकीकरण हो गया है। एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग के लिए अतिउत्पादन का संकट और मुनाफे की गिरती दर उन्हें उत्पादक शक्तियों को नष्ट करने, वास्तविक मजदूरी को नीचे धकेलने और रोजगारविहीन विकास के लिए अग्रसर कर रहा है।

अच्छे सरकारी कॉलेज में दाखिला लेने व सम्मानजनक रोजगार पाने की असंभव चढ़ाई और अंतहीन प्रयासों, रहने-खाने-पीने-इलाज के दामों में आसमान छूती महंगाई, कर्ज का बोझ और जानलेवा जीवन स्थितियों की दलदल में फंसे देश के युवाओं को यह हकीकत आज या कल समझनी ही होगी कि जीर्ण-शीर्ण पूंजीवादी व्यवस्था ढहने के कगार पर है और इसके पूर्ण रूप से खात्मे के संघर्ष में अगर नहीं उतरा गया तब बर्बरता का दमनचक्र समस्त मानव समाज को सदियों पीछे ले चला जाएगा।

यह व्यवस्था अब ‘तर्कहीन’ हो चुकी है – खाद्यान्नों का उत्पादन अधिक है लेकिन फिर भी कुपोषण और भुखमरी अपने चरम पर है, अनगिनत गुणवत्तापूर्ण अस्पताल बनाने के लिए संसाधन प्रचुर हैं फिर भी गैर-घातक बीमारियों में भी मृत्यु दर ऊंची है, सभी मनुष्यों की मानसिक योग्यता के विकास हेतु अत्याधुनिक स्कूल और विश्वविद्यालय स्थापित करने के लिए संसाधन हैं फिर भी निरक्षरता अधिक है, लाखों इमारतें खाली पड़ी हैं फिर भी हर नुक्कड़-चौक-फूटपाथ पर बेघर लोग तड़पते हुए दिखते हैं। कुछ ऐसा ही है सड़ते हुए पूंजीवाद का नजारा जो अपने जड़मूल से उखाड़े जाने की परिस्थितियां स्वयं पैदा कर रहा है। पुलिस, सेना, अदालतें, मीडिया और नौकरशाही पूंजीवादी तंत्र के औजार ही तो हैं और इन्हीं में शामिल हैं ‘विपक्षी दल’ जो पूंजीपति वर्ग के प्रतिनिधि बनने की प्रतिस्पर्धा में ‘जनता के पक्षधर’ होने के दावे और लोक लुभावने वायदे करते हैं पर असल में वह कॉरपोरेट आकाओं के ही ‘उदार’ मित्र हैं जो इस सड़ी-गली व्यवस्था में रियायत की चंद टुकड़ियां देने पर सहमति जताएंगे पर जन आंदोलनों की तपन से शोषणकारी व्यवस्था के धाराशायी होने के पक्षधर कभी नहीं होंगे।

नीट प्रकरण के संदर्भ में विपक्षी दल, खासकर कांग्रेस पार्टी के नेतागण, यह बात जोरों-शोरों से उठाते हुए नजर आये कि भाजपा ने सभी शैक्षणिक संस्थानों पर संस्थागत कब्जा जमा लिया है जिसके चलते ‘स्वतंत्र और उद्देश्यपूर्ण शिक्षा प्रणाली’ खत्म हो चुकी है और खुले रूप से स्कूलों व कॉलेजों में भगवाकरण की राजनीती फैलाई जा रही है। उपरोक्त बातें शत-प्रतिशत सही हैं परन्तु विपक्षी दल के लीडर के तौर पर राहुल गांधी क्या रास्ता अपना रहे हैं? वे प्रेस कांफ्रेंस, सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक्शन, फॉरेंसिक जांच, गिरफ्तारी, संसद में इस विषय पर चर्चा आदि से बढ़कर कुछ नहीं करते हुए दिखाई दे रहे। पेपर लीक होने के पीछे के असली कारणों – ‘निजीकरण’, ‘नवउदारवादी नीतियां’ और ‘विश्वपूंजीवाद के संकट की गर्भ से उभरी फासीवादी सरकारें’ की ओर वे कभी नहीं इशारा करेंगे चुकी उन्हें खुद कठघरे में खड़े होना पड़ेगा। विपक्षी दल, न तो संसद के भीतर और न ही बाहर में, युवाओं के तात्कालिक एवं दूरगामी हकों-अधिकारों को लेकर संघर्ष छेड़ता हुआ दिख रहा है। खुद राहुल गांधी चुप्पी साध लेंगे जब उनसे पुछा जाएगा कि – क्या वे नवउदारवादी नीतियों और निजीकरण के खात्मे को लेकर संसद के भीतर एवं सड़क पर निर्णायक संघर्ष छेड़ेंगे? क्या वे देश के सभी छात्र-छात्राओं के लिए मुफ्त गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रणाली एवं सभी के लिए सम्मानजनक रोजगार की गारंटी के लिए संघर्ष के मैदान में उतरेंगे? नहीं, बिलकुल भी नहीं। ‘विपक्षी दलों’ को ‘जनपक्षीय’ मान बैठना एक बड़ी भूल है। विपक्ष का हित भी बड़ी एकाधिकारी पूंजी और साम्राज्यवाद से बंधा हुआ है और इसलिए जनता में व्याप्त भारी असंतोष एवं आक्रोश पर वो कभी भी सवार नहीं हो सकेगा। एक तानाशाह सरकार को रोकने का नैतिक बल, साहस और तत्परता ‘विपक्ष’ में नहीं बल्कि जनता के क्रांतिकारी चेतना से लैस जमीनी संघर्षों में है। खुद विपक्षी दल की राज्य सरकारें लिप्त रही हैं पेपर लीक जैसे तमाम घोटालों में। कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में ही पारित की गयीं नवउदारवादी नीतियों ने बड़ी पूंजी के लिए 1991 में दरवाजा खोला जिसके आधार पर फासीवादी तानाशाही के तंत्र को खड़ा किया गया। कल को अगर इंडिया गठबंधन की सरकार बनती भी है तो वह भी युवाओं के हक-हकूक की बातों को दरकिनार कर देगी, मजदूरों के हितों के विरुद्ध लेबर कोड को लागू करेगी, काले दमनकारी कानूनों को जारी रखेगी और तमाम ऐसी जन-विरोधी कार्यवाईयों को हरी झंडी दिखाएगी ताकि पूंजीवादी तंत्र के अंतर्गत निर्मम शोषण व उत्पीड़न बरकरार रहे। इसलिए छात्रों-युवाओं को यह हमेशा याद रखना चाहिए कि ‘सरकार चाहे जिसकी भी हो, मौजूदा व्यवस्था मुट्ठी भर बड़े पूंजीपतियों, साम्राज्यवादियों और जमींदारों की तरफदारी की नीति पर खड़ी हैं’[1]

तब आखिर समाधान क्या है? विश्वपूंजीवाद के संकट से देश और दुनिया की जनता ऐतिहासिक पश्चगमन के कठिनतम दौर से गुजर रही है और जाहिर है तमाम छात्रों-युवाओं का भविष्य भी डांवाडोल स्थिति में है। एक ओर सत्तासीन फासीवादी सरकारें पूंजी की नंगी तानाशाही लागू करने में जुटी हैं तो दूसरी ओर मेहनतकश जनता जीवन-मरण के संघर्ष से जूझ रही है। ऐसे में, छात्र-युवाओं के कार्यभार के संदर्भ में भगत सिंह के शब्दों को (‘विद्यार्थी और राजनीति’, 1928) दोहराना बेहद जरूरी है – ‘जिन नौजवानों को कल देश की बागडोर संभालनी है, उन्हें अक्ल का अंधा बनाया जा रहा है। विद्यार्थियों का मुख्य काम पढ़ाई करना है, लेकिन क्या देश की परिस्थितियों का ज्ञान और उनके सुधार सोचने की योग्यता पैदा करना उस शिक्षा में शामिल नहीं?’ इसलिए पेपर लीक धांधली जैसे विभिन्न जरूरी ‘तात्कालिक’ मुद्दों पर लड़ाकू और जुझारू संघर्ष छेड़े जाने के साथ-साथ संघर्षशील मेहनतकश जनता के आंदोलनों से अपनी लड़ाई को जोड़कर देखना, फासीवाद के खिलाफ एक निर्णायक संघर्ष की तैयारी में अपना योगदान देना चुकी इस अहम ठौर को पार लगाये बिना शोषणमुक्त समाज, हमारा दूरगामी लक्ष्य साकार नहीं हो सकेगा एवं आगामी समय में जन-उभार से तपी हुई क्रांतिकारी सरकार (असली विपक्ष) द्वारा हस्तक्षेप में अपना पूर्ण बल लगाना जिससे कि जनवादी अधिकारों की पूर्ण बहाली और पूंजीवाद के खात्मे की ओर निर्णायक रूप से बढ़ा जा सके। हालात कुछ यूं परिवर्तित हो चुके हैं कि तात्कालिक मांगों की पूर्ती भी राजनीतिक लड़ाई की मजबूती पर आश्रित हो चुकी है यानी राजनीतिक संघर्ष अपने आप में सभी संघर्षों को समाहित किया रहता है।

मजदूर वर्ग के नेतृत्व में जनता द्वारा लड़ी गयी 1917 की महान रूसी क्रांति जिसके उपरान्त मजदूर वर्ग का राज ‘समाजवाद’ स्थापित हुआ और जिसने सामाजिक जीवन को चौमुखी विकास और प्रगति का स्वाद चखाया – उस दौर की शिक्षा प्रणाली पर संक्षिप्त चर्चा किये बगैर इस विषय को समाप्त करना उचित नहीं होगा। सोवियत रूस में शिक्षा के सवाल को सीधे साम्यवाद के अस्तित्व और उसके उच्चतम विकास से जोड़कर देखा गया। कॉम लेनिन के शब्द – ‘शिक्षा के बिना ज्ञान नहीं है और ज्ञान के बिना साम्यवाद नहीं है’ शिक्षा की जरूरत एवं एहमियत को सटीकता से दर्शाते हैं। निगेल ग्रांट अपनी किताब में सोवियत शिक्षा को लेकर लिखते हैं कि – ‘सोवियत शिक्षा केवल वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और तकनीशियनों के उत्पादन के लिए एक मशीन के रूप में नहीं बल्कि जन शिक्षा के एक साधन के रूप में डिजाइन की गई है, जिससे युवा पीढ़ी न केवल अपनी औपचारिक शिक्षा प्राप्त करती है, बल्कि अपने सामाजिक, नैतिक और राजनीतिक विचार भी प्राप्त करती है।’  वे यह भी लिखते हैं कि – ‘सोवियत समाज को आबादी के बड़े हिस्से में राजनीतिक जागरूकता की आवश्यकता है। यह केवल अनुरूपता से अधिक है, जो आमतौर पर अज्ञानता के माध्यम से अधिक आसानी से आती है। मूर्खतापूर्ण स्वीकृति काम नहीं करेगी; जो चाहिए वह है ज्ञान और राजनीतिक सिद्धांत के अध्ययन में पारंगत अनुरूपता, सकारात्मक अर्थ में अनुरूपता। यह उल्लेखनीय बात है कि पहली दो पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान जब सोवियत जनता अपनी औद्योगिक उत्पादन क्षमता को सबसे उन्नत साम्राज्यवादी देशों के बराबर लाने के लिए संघर्ष कर रही थी क्योंकि वह जानती थी कि अगर वो सफल नहीं हुई तो यूएसएसआर में मजदूर वर्ग की राज्य शक्ति साम्राज्यवादी सैन्य हस्तक्षेप से खत्म हो जायेगी, फिर भी शिक्षा में भारी संसाधन लगाये गए – वयस्कों और बच्चों की शिक्षा के लिए। 1917 से 1937 के बीच, 40 मिलियन वयस्कों को पढ़ना सिखाया गया। पूर्णकालिक शिक्षा में बच्चों और छात्रों की संख्या 1914 में 8 मिलियन से बढ़कर 1938-39 में 47 मिलियन हो गई। माध्यमिक विद्यालय में उपस्थिति 1914 में 1 मिलियन से बढ़कर 1938-9 में 12 मिलियन से अधिक हो गई। विश्वविद्यालय के छात्रों की संख्या 1914 में 1,12,000 से बढ़कर 1938-39 में 6,01,000 हो गई, और यूएसएसआर में 20 वर्षों में जितने स्कूल बनाए गए, उतने जारिस्ट निरंकुशता ने 200 वर्षों में नहीं बनाए। जारिस्ट रूस की लगभग 73% आबादी निरक्षर थी और मात्र 13% महिलाएं ही साक्षर थीं। यह आंकड़े मजदूर वर्ग के राज के दौर की असंख्य उपलब्धियों को उजागर करते हैं, साबित करते हैं कि वाकई, मेहनतकश आवाम जिसमें युवाओं का भी बड़ा हिस्सा शामिल है, अगर चाह ले तो स्वर्ग को धरती पर उतार सकता है और बड़े से बड़े तानाशाह को घुटनों पर ला सकता है!


[1] यथार्थ के मार्च-अप्रैल 2024 संयुक्तांक के संपादकीय से लिया गया विश्लेषण। पढ़ने के लिए क्लिक करें