Author: Yatharth

September 11, 2021 0

देश की अर्थव्यवस्था का बुरा हाल

By Yatharth

आज अर्थव्यवस्था का अत्यंत बुरा हाल है। मोदी सरकार की बदइंतजामी, नाकामी तथा पूंजी की खुली-नंगी तरफदारी ने आर्थिक संकट को और बढ़ा दिया है। आम लोगों की खस्ताहाल स्थिति बढ़ती जा रही है। पहले की तुलना में एक बहुत बड़ी आबादी भुखमरी के कगार पर पहुंच गयी है।
बात साफ है कि गरीबों और मेहनतकशों को अपने वर्ग हित के लिए आवाज बुलंद करनी होगी और संघर्ष की राह पर चलते हुए एक नयी दुनिया व समाज बनाने के लिए कमर कसना होगा।

September 11, 2021 0

पार्टी के अंदर नस्लवाद से कैसे लड़े अमरीकी कम्युनिस्ट?

By Yatharth

हालांकि नस्लवाद, जातिवाद, राष्ट्रवाद, आदि अलग-अलग समस्याएं हैं और इनकी अपनी अलग विशिष्टतायें हैं, परंतु नीचे दिया गया अंश इस बात का एक प्रेरणादायक उदाहरण है कि एक क्रांतिकारी पार्टी को अपने भीतर इन प्रभुत्ववादी प्रवृत्तियों से निपटने के लिए कैसे एक सजग एवं सिद्धांत पर दृढ़ पार्टी के रूप में संघर्ष चलाना चाहिए। यह इसलिए भी खास है कि भारतीय समाज में ये सभी प्रवृत्तियां अभी गहराई तक मौजूद हैं

September 11, 2021 0

पेगासस गेट – क्या जजों और संवैधानिक संस्थाओं को आतंकी मानती है सरकार?

By Yatharth

जिस तरह से नागरिकों, जजों, मंत्रियों, सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री से जुड़े अधिकारियों, पत्रकारों, चुनाव आयुक्त और सुप्रीम कोर्ट के जजों के नाम पेगासस जासूसी के टारगेट सूची में उजागर हो रहे हैं उसे देखते हुए, इस मामले की जांच सरकार द्वारा करा ली जानी चाहिए। अब सुप्रीम कोर्ट इन याचिकाओं पर क्या निर्णय लेता है यह तो बाद में ही पता चलेगा, फिलहाल यह एक ज्वलंत बिंदु है और सरकार द्वारा इस मामले में की गयी कोई भी नजरअंदाजी घातक हो सकती है। 

September 11, 2021 0

संताल हुल: एक अशेष विद्रोह

By Yatharth

1855 का संताल हुल आदिवासियों के साहस और प्रतिशोध की गाथा है; शोषण के प्रतिकार और अपने अस्तित्व को बचाने की कहानी है। इतिहास के पन्नों में हुल को एक ऐसी घटना के रूप में अंकित किया जाता है जिसकी एक निश्चित शुरुआत हुई और फिर एक निश्चित अंत हुआ। प्रस्तुत लेख का मानना है कि हुल की शुरुआत तो हुई, लेकिन उसका अंत नहीं हुआ।

September 11, 2021 0

पूंजीवाद के डूबते जहाज का कप्तान चिल्ला रहा है; बचाओ, बचाओ!!

By Yatharth

एकाधिकारी पूंजीवादी एसोसिएशन, कार्टेल, सिंडिकेट और ट्रस्ट पहले देश के पूरे बाज़ार को आपस में बाँट लेते हैं और अपने देश के कमोबेश पूरे बाज़ार पर अपना क़ब्ज़ा जमा लेते हैं। देशी और विदेशी बाज़ार एकीकृत हो जाता है। जैसे जैसे पूंजी का निर्यात बढ़ता जाता है और विदेशी तथा औपनिवेशिक संबंधों द्वारा प्रभाव क्षेत्र बढ़ता जाता है, विशालकाय एकाधिकारी एसोसिएशन का और विस्तार होता जाता है, परिस्थितियां ‘स्वाभाविक’ रूप से अंतर्राष्ट्रीय एसोसिएशन की ओर बढ़ती हैं और अंतर्राष्ट्रीय कार्टेल अस्तित्व में आते हैं।

September 11, 2021 0

खोरी बस्ती ढह चुकी है, मी लॉर्ड!!

By Yatharth

देश के सारे संसाधन चंद हाथों में सिमटते जा रहे हैं, पूंजी के पहाड़ संख्या में कम लेकिन दैत्याकार होते जा रहे हैं। अर्थनीति के अनुरूप ही सत्ता का राजनीतिक स्वरूप भी तेज़ी से राज्यों के हाथों से निकलकर केंद्र के हाथों में केंद्रीकृत होता जा रहा है। ‘हम दो – हमारे दो’ का नारा संसद से सडकों, किसान आन्दोलनों तक फैलता जा रहा है। क्रांतिकारी राजनीति का दावा करने वालों का, लेकिन, इस वस्तुस्थिति से बे-खबर, वही ‘अपनी ढपली-अपना राग’ यथावत ज़ारी है।

September 11, 2021 0

फासिस्ट चंगुल के दौर में उ.प्र. विधान सभा चुनाव

By Yatharth

यद्यपि यह सही है कि फासिस्ट सत्ता व राजनीति के विरुद्ध चुनावी-संसदीय संघर्ष के दायरे का पूरा और हरमुमकिन इस्तेमाल करना जरूरी है और भाजपा की चुनावी हार की संभावना को पूरी तरह से नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए, पर देश और खास तौर पर फासिस्ट राजनीति की सबसे बड़ी प्रयोगशाला बने उप्र में यह काम भी केवल बुर्जुआ संसदीय दलों की सामान्य चुनावी राजनीति तक सीमित रहने के आधार पर पूरा नहीं किया जा सकता।

May 23, 2021 0

कृषि मालों पर इजारेदार पूंजी के आधिपत्य का अर्थ, इजारेदाराना कीमतों के सीमित संदर्भ में

By Yatharth

सवाल छोटी पूंजियों को बचाने का नहीं है, क्योंकि इसे बचाया ही नहीं जा सकता है। मुख्‍य सवाल यह है कि आज जो स्थिति है और यह जिस ओर बढ़ रही है उसको देखते हुए मजदूर वर्ग की मुक्ति का रास्‍ता सिवाय इसके और कुछ नहीं हो सकता है कि सर्वहारा क्रांति के जरिये समाज के पुनर्गठन और समाजवाद की पूर्ण विजय के लक्ष्‍य को सामने रखते हुए आगे के रास्‍तों का अनुसरण किया जाए। किसानों को यह बात बतानी जरूरी है, उनके निर्धनतम हिस्से को इस रास्ते पर लाना जरूरी है और इसलिये किसान आंदोलन में इस दिशा से हस्तक्षेप अत्यावश्यक है। अन्‍य छोटी व मंझोली पूंजियों के साथ भी यही बात है कि उन्‍हें भी सर्वहारा वर्ग की अधीनता में आना होगा तभी उनके जीवन का सार बचेगा। जहां तक उनकी वर्तमान उत्‍पादन पद्धति का है, उसका सर्वहारा वर्ग का राज्‍य अंत कर देगा, क्‍योंकि उसके अंत में ही मानवजाति के सार को बचाने का मूलमंत्र छिपा है। पूंजीवादी उत्‍पादन संबंध के नाश में उन सबका बचाव है जिसमें बड़ी पूंजी की मार से तबाह होते सारे तबके व संस्‍तर शामिल हैं।