भाजपा को हराना जरूरी है,
लेकिन क्रांतिकारी जन-उभार की सरकार ही फासीवाद का अंत कर सकती है संपादकीय, अप्रैल 2024…
काम और रोजी-रोटी के लिए देश और दुनिया के हर कोने में आवागमन की आजादी की मांग एक ऐसी मजदूर पक्षीय मांग है जो सभी क्षेत्रों व देशों के मजदूरों की, स्थानीय और प्रवासी दोनों तरह के मजदूरों की एक साझा मांग है, और आज जबकि घुसपैठिया का सवाल उठाकर व उनका अमानवीय दमन और उत्पीड़न करके उनका और भी अमानुषिक शोषण की तैयारी चल रही है, वैसी परिस्थिति में इस साझी मांग के लिए एकताबद्ध संघर्ष करना एक अहम आवश्यकता बन चुका है। साथ ही, इसके लिए भी संघर्ष करना और मांग उठाना जरूरी है कि न्यूनतम मजदूरी के नीचे वेतन/मजदूरी पूंजीपति नहीं दे।न्यूनतम मजदूरी से नीचे जाकर काम न करने की मांग भी हमारी, स्थानीय एवं प्रवासी मजदूरों की, एक साझा मांग है। इसी तरह न्यूनतम जनवादी अधिकार की मांग, जैसे मालिकों के मनमाने व्यवहार और लूट का विरोध करने, तथा यूनियन बनाने के अधिकार की मांग भी एक साझा मांग बनती है जिसके लिए स्थानीय और प्रवासी मजदूरों को मिलकर लड़ना आवश्यक है।
It is true, anti-caste struggle is needed inside class unity so that class struggle remains unpolluted by caste prejudice and caste mentality. It must become the acid test of real class unity. The real challenge – and the task of this convention – is to fuse anti-caste and anti-class struggle inside and outside the movement, in theory and in daily practice.
वर्ग एकता के अंदर भी जाति-विरोधी और जातीय मानसिकता-विरोधी संघर्ष की जरूरत है ताकि वर्ग-संघर्ष जाति के भेदभाव और जाति की मानसिकता से दूषित न हो। इसे असली वर्ग एकता की अग्नि परीक्षा होना चाहिए। असली चुनौती – और इस कन्वेंशन का असली उद्देश्य व काम – आंदोलन के अंदर और बाहर, सिद्धांत रूप में और रोजाना व्यवहार में, जाति-विरोधी और वर्ग-विरोधी संघर्ष का परस्पर संलयन कैसे हो, यही है।
जोड़-तोड़ व धर्म-जाति के चुनावी समीकरणों की राजनीति से नहीं, मजदूरों मेहनतकशों उत्पीड़ित जनता की मुक्तिकामी राजनीति से ही फासीवाद की पराजय मुमकिन संपादकीय, सर्वहारा, 1-30 नवंबर बिहार चुनाव परिणामों में बीजेपी की बड़ी जीत से उन्हें भारी धक्का लगा है, जो इस चुनाव में विपक्षी महागठबंधन की ‘तय विजय’ के भरोसे फासीवादी बीजेपी को…
लेकिन क्रांतिकारी जन-उभार की सरकार ही फासीवाद का अंत कर सकती है संपादकीय, अप्रैल 2024 पूरे देश में चुनाव की सरगर्मियां शबाब पर हैं। जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ रहा है, देश के राजनीतिक हालात तेजी से बदल रहे हैं। हम देख सकते हैं कि जैसे ही चुनाव ने जन-सरोकार के मुद्दों के इर्द-गिर्द घुमना शुरू…
[14-15 दिसंबर 2024 को दिल्ली में ‘रेडिकल वामपंथी ताकतों की अखिल भारतीय परामर्श बैठक’ हेतु अंग्रेजी पेपर का अनुवाद] पी आर सी, सीपीआई (एमएल) 1. फासीवाद की परिभाषा और वर्ग चरित्र जब फासीवाद सत्ता में होता है, तो यह वित्तीय पूंजी के सबसे प्रतिक्रियावादी, सबसे अंधराष्ट्रवादी और सबसे साम्राज्यवादी तत्वों की खुली आतंकवादी तानाशाही होता…
संपादकीय, दिसंबर 2024 पूंजी का मानवद्रोही चरित्र ही ऐसा है कि उसका संकट उसे हमेशा ही ध्वंसात्मक दिशा में ले जाता है क्योंकि यह विनाश ही उसके लिए एक तात्कालिक राहत लाता है। कोविड के नाम पर निर्मम लॉकडाउन पूंजी के लिए ऐसी ही एक तात्कालिक राहत थी जब आर्थिक गतिविधियों के बंद होने से…
फासीवाद के विरुद्ध वैचारिक–राजनीतिक एकता एवं व्यवहारिक एकजुटता कायम करें! (जनचेतना यात्रा के बिहार चैप्टर द्वारा जारी पर्चे को संदर्भ में लेते हुए एक त्वरित टिप्पणी) पीआरसीसीपीआई (एमएल) जन चेतना यात्रा के बिहार चैप्टर द्वारा जारी पर्चे में यह बिल्कुल सही बात कही गई है कि आज हमारे देश भारत की पुरानी शक्ल-सूरत कहीं दिखाई…
इतिहास और वर्तमान का मूल्यांकन करते हुए सामाजिक संघर्ष खासकर जाति-उन्मूलन के मोर्चे पर हमारे कार्यभार (यथार्थ के मार्च 2023 अंक से) चार भागों में– I प्रस्तावना II डॉ अंबेदकर की वैचारिकी एवं उस पर आधारित दलितवाद की सीमा III अंग्रेजों के जाने के बाद बने भारतीय पूंजीवादी राज्य के आईने में क्रांतिकारी दलित उभार की…
फासीवाद के खतरे को पहचानें और इसके खिलाफ कमर कसने की तैयारी करें! आईएफटीयू (सर्वहारा) मजदूर-मेहनतकश साथियो! फासीवाद क्या है? फासीवाद सांप्रदायिक नफरत, नस्लीय घृणा और उग्र राष्ट्रवाद पर आधारित एक घोर प्रतिक्रियावादी राजनीतिक मुहिम व आंदोलन का नाम है। फासीवादी तानाशाही क्या है? जब फासीवाद सतारूढ़ हो जाता है, तब फासीवादी तानाशाही का…