एंगेल्स: एक पुनरावलोकन

November 16, 2021 0 By admin

पितृसत्ता की ऐतिहासिक भौतिकवादी पुनर्रचना

अमिता कुमारी

वर्तमान में हमारे बीच के करीब सभी समुदाय पितृसत्तात्मक हैं; और जब से लिखित दस्तावेजों द्वारा हमें इतिहास ज्ञात हैं, तब से समाज ऐसा ही है। तब क्या यह समझा जाए कि पितृसत्ता हमारे बीच हमेशा से है? क्या स्त्री-परवशता एक स्वाभाविक/ प्राकृतिक परिघटना है? एक मार्क्सवादी इस पारंपरिक मत को मानने वाला आखिरी व्यक्ति होगा। मार्क्सवाद एक ऐसा सिद्धान्त है जो मानता है कि समस्त ब्रह्मांड, पृथ्वी और मानव समाज निरंतर गतिशील हैं, लगातार बदल रहे हैं। अपरिवर्तनीयता जैसी अवधारणा मार्क्सवाद के लिए बिल्कुल अनजानी है, असत्य है। स्त्री की सामाजिक स्थिति के संदर्भ में भी यह लागू होती है। एंगेल्स का कहना है – “समाज के आदिकाल में नारी पुरुष की दासी थी, यह उन बिल्कुल बेतुकी धारणाओं में से एक है, जो हमें अठारवीं सदी के जागरण काल से विरासत में मिली है”। इतिहासकार गर्डा लर्नर (Gerda Lerner) भी कुछ ऐसा ही कहती हैं – “एक व्यवस्था के रूप में पितृसत्ता ऐतिहासिक है; इतिहास में ही इसका उद्भव है। अगर ऐसा है, तो एक ऐतिहासिक प्रक्रिया द्वारा इसे समाप्त किया जा सकता है। अगर पितृसत्ता प्राकृतिक होती, यानि यह जैविक नियतिवाद पर आधारित होती, तो इसे बदलने का अर्थ प्रकृति को परिवर्तित करना होता”।

यह दुखद है कि स्त्री परवशता के उद्भव के सवाल को या तो प्राकृतिक, स्त्री-पुरुष के बीच लैंगिक भिन्नताओं द्वारा निर्धारित, मान लिया जाता है या फिर पितृसत्ता पर व्यापक चर्चाओं में यह सवाल अधिकांशतः शामिल ही नहीं किया जाता। इस सवाल के प्रति अनदेखी एक बहुत बड़ा कारण है कि जब हम पितृसत्ता को समाप्त करने का रास्ता ढूंढते हैं तो या तो कोई निश्चित उत्तर नहीं मिलता, या फिर हम काल्पनिक, आदर्शवादी उपाय प्रस्तुत करने लगते हैं।

यह अनदेखी या अज्ञानता इसलिए नहीं है कि इस विषय का आज तक किसी ने ऐतिहासिक अध्ययन नहीं किया हो। दरअसल इस प्रश्न पर कुछ उम्दा रचनाएँ लिखीं गयी हैं तथा तार्किक उत्तर पेश करने के प्रयास भी किए गए हैं। इन रचनाकारों की अगुवाई करने वाले सिद्धांतकार हैं फ़्रेडरिक एंगेल्स, जिनकी पुस्तक, परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति, इस विषय पर ऐतिहासिक भौतिकवादी विश्लेषण की नींव रखती है। यह पुस्तक 1884 में पहली बार प्रकाशित हुई थी। एल. एच. मॉर्गन व जे. जे. बेचोफेन जैसे मानवशास्त्रियों के शोधों पर आधारित यह पुस्तक पहला प्रयास थी जो स्त्री-परवशता को समग्र सामाजिक-आर्थिक संरचना में अवस्थित कर उसे समझने की कोशिश करती है। एंगेल्स का यह सविस्तार विश्लेषण ऐतिहासिक भौतिकवादी तर्क पर आधारित है – “इतिहास में अंततोगत्वा निर्णायक तत्व तात्कालिक जीवन का उत्पादन और पुनरुत्पादन है”। एंगेल्स आगे समझाते हैं कि – “ऐतिहासिक युग विशेष तथा देश विदेश के लोग जिन सामाजिक व्यवस्थाओं के अंतर्गत रहते हैं, वे इन दोनों प्रकार के उत्पादनों से, अर्थात एक ओर श्रम के विकास की अवस्था और, दूसरी ओर, परिवार के विकास की अवस्था से निर्धारित होती है”।

यह अपने आप में एक शक्तिशाली तर्क है। पितृसत्ता के जटिल एवं विराट व्यवस्था को ऐतिहासिक प्रक्रियाओं में अवस्थित कर, यह तर्क, उसे समझने का साधन देता है। साथ इस ऐतिहासिक अवस्थिति में पितृसत्ता के अंतिम खात्मे का सकारात्मक संदेश भी है क्योंकि अगर किसी का ‘प्रारम्भ’ हुआ है तो ‘अंत’ भी निश्चित होगा। अतः इस तर्क की महत्ता इस बात में है कि यह हमें पितृसत्ता की भौतिक नींव के साथ साथ उसके वैचारिक अवशेष को ध्वस्त करने की अंतर्दृष्टि देता है।

एंगेल्स की रचना, एक ओर उत्पादन प्रक्रिया, अधिशेष, निजी संपत्ति, रक्त-संबंध आधारित समाज व परिवार, एवं दूसरी ओर, स्त्री परवशता के प्रारम्भ, घरेलू कार्यों के अवमूल्यन, स्त्री यौनिकता पर नियंत्रण एवं पितृसत्ता की स्थापना, के बीच सम्बन्धों को उजागर करती है। वर्तमान अध्ययनों ने एंगेल्स द्वारा उपयोग किए कई मानवशास्त्रीय प्रमाणों का खंडन किया है। परंतु एंगेल्स ने अपने विश्लेषण द्वारा जो मुख्य ढांचा दिया है वह इस खंडन से प्रभावित नहीं होता। दरअसल, नए शोध और खोज एंगेल्स के तर्कों की पुष्टि ही करते हैं। जैसा करेन सैक्स (Karen Sacks) कहती हैं, “एंगेल्स द्वारा किए गए कई विशेष नृजातीय त्रुटियों के बावजूद, मैं सोचती हूँ कि उनके मुख्य विचार सही हैं, और वे उनके बाद संचित प्रदत्तों को समझने का सर्वोत्तम माध्यम हैं”। एंगेल्स के पश्चात कई सिद्धांतकारों ने नए शोधों के आधार पर उनके द्वारा दिये गए विश्लेषण को परिष्कृत व विस्तारित किया है। परिणामस्वरूप इस विषय पर वर्तमान ऐतिहासिक भौतिकवादी समझ काफी समृद्ध हुई है; एंगेल्स के विश्लेषण की कमियों व अस्पष्टताओं को वर्तमान शोधों ने भरने का प्रयास कर एक समग्र निरूपण प्रस्तुत किया है।

प्रस्तुत आलेख एंगेल्स द्वारा दी गयी रूपरेखा को आधार मानते हुए, एवं वर्तमान विद्वानों, जैसे गर्डा लर्नर, करेन सैक्स, रायना राइटर, स्टेफनी कूँज, इत्यादि, के विश्लेषणों को ग्रहण करते हुए, स्त्री परवशता के उद्भव की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के पुनर्निर्माण का प्रयास है। इसे तीन भागों में बांटा गया है।  ये तीन भाग क्रमशः उत्पादन प्रक्रिया के तीनों चरणों – शिकारी-संग्राहक, पशुपालन एवं कृषक – का वर्णन प्रस्तुत करते हैं।

I

शिकारी-संग्राहक समाज : समानता व संपूरकता का चरण

एंगेल्स अपनी चर्चा प्रारम्भिक समाजों से शुरू करते हैं जब शिकार व संग्रहण उत्पादन प्रक्रिया का आधार थे। वे बताते हैं कि समाज समतामूलक था व स्त्रियों को स्वतन्त्रता एवं सम्मानित दर्जा प्राप्त था। स्त्री पुरुष के बीच श्रम विभाजन सरल एवं व्यावहारिक था। एंगेल्स के शब्दों में :

पुरुष युद्ध में भाग लेते थे, शिकार करते थे, मछली मारते थे, आहार की सामग्री जुटाते थे और इन तमाम कामों के लिए आवश्यक औज़ार तैयार करते थे। स्त्रियाँ घर की देखभाल करती थीं और खाना-कपड़ा तैयार करती थीं। वे खाना पकाती थीं, बुनती थीं और सीतीं थीं।प्रत्येक अपने अपने कार्य क्षेत्र का स्वामी था : पुरुष का जंगल में प्राधान्य था, तो स्त्रियों का घर में।

वर्तमान के अध्ययन एंगेल्स के इस विवरण में नए तथ्य जोड़कर इसे और विस्तृत करते हैं। आज हमारे पास पर्याप्त प्रमाण हैं जो यह साबित करते हैं कि इन प्रारम्भिक समाजों में स्त्रियों की भूमिका व कार्य मात्र घरेलू क्रियाकलापों तक सीमित नहीं थे। उनके शिकार व संग्रहण में हिस्सेदारी को नए शोधों ने प्रभावशाली तरीके से रेखांकित किया है। गर्डा लर्नर अपनी पुस्तक में “शिकार-पुरुष” की अवधारणा को नकारते हुए लिखती हैं कि बड़े जानवरों का शिकार कभी कभी ही होता था, तथा खाद्य आपूर्ति को, संग्रहण व छोटे जानवरों के शिकार, जिन्हें स्त्रियाँ व बच्चे भी करते थे, के द्वारा ही प्रायः पूरा किया जाता था। सेल्ली स्लोकम (Sally Slocum) प्रारम्भिक महिलाओं के क्रियाकलापों पर प्रकाश डालती हैं व बताती हैं कि महिलाएं संग्रहण व छोटे जानवरों के शिकार के अलावा कई सांस्कृतिक आविष्कारों से भी संबन्धित थीं – जैसे संग्रहीत चीजों को रखने का पात्र या बच्चों को पीठ पर टाँगने के रस्सी का लटकन या जाल, इत्यादि। टोकरी, चमड़े के सामान, पोशाक, बर्तन, इत्यादि बनाने का श्रेय भी कई मानवशास्त्री महिलाओं को देते हैं। स्लोकम दो प्रमुख पूर्वाग्रही अवधारणाओं के खंडन का प्रयास करती हैं – एक यह कि प्रारम्भिक समाजों में शिकार प्रमुख व्यवसाय था तथा दूसरा यह कि प्रारम्भिक युग के प्राप्त औज़ार मात्र शिकार के लिए प्रयुक्त होते थे। स्लोकम कहती हैं कि पाषाणकालीन युग में संग्रहण भी एक प्रमुख कार्य हुआ करता था जो स्त्रियाँ व बच्चे दोनों करते थे। साथ वे बताती हैं कि प्राप्त औजारों के अवशेष शिकार के साथ संग्रहण में प्रयुक्त किए जाने वाले साधन भी हो सकते थे – फल-सब्जियों को तोड़ने एवं खाद्य जड़ों को उखाड़ने के लिए। इन तथ्यों के आधार पर वर्तमान मानवशास्त्री “शिकार-पुरुष” के युग्म व अन्य संबन्धित पूर्वाग्रहों से बाहर निकलने की वकालत करते हैं। उनका मानना है कि ये पूर्वाग्रह मानव सभ्यता की समृद्धि में महिलाओं के योगदान की अनदेखी करते हैं। हम गलत धारणा बनाते हुए प्रारम्भिक पुरुषों को वास्तविक अन्नदाता व घर के संरक्षक व महिलाओं को घर की चहारदीवारी तक सीमित कर कल्पना करने लगते हैं। स्टेफनी कूँज व पेटा हेण्डेर्सन (Stefanie Coontz and Peta Hendersen) कहती हैं – “स्त्री क्रियाकलाप हर दिन के लिए आवश्यक थे। स्त्री श्रम तब भी ज़रूरी होता था जब पुरुष द्वारा लाई गयी सामाग्री को उपयोगी बनाना होता था और तब भी जब पुरुष घर कुछ लाने में नाकाम होते थे”।

इस तरह इस चरण में स्त्रियाँ न सिर्फ बच्चो के भरण पोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं बल्कि वह भोजन जुटाने वाली व कई शिल्पों की आविष्कारक भी थी।  यही व्यवस्था आरंभिक समाज में स्त्री-पुरुष संपूरकता का आधार थी और इसी आधार पर इस युग के लैंगिक समानता के मानक भी तैयार होते हैं। इस स्त्री-पुरुष पूरकता व आपसी आर्थिक निर्भरता को ध्यान में रखना ज़रूरी है ताकि हम भूल वश इस काल में स्त्री-पुरुष कार्य-क्षेत्रों को पृथक न मान बैठें, जैसा एंगेल्स गलती से वर्णित करते हैं – “प्रत्येक अपने अपने कार्य क्षेत्र का स्वामी था : पुरुष का जंगल में प्राधान्य था, तो स्त्रियों का घर में”।

परंतु, यहाँ यह भी रेखांकित करना आवश्यक है कि महिलाएं अपने प्रजनन संबंधी भूमिका के कारण घरेलू क्रियाकलापों में ही मुख्यतः संलग्न होती थीं। गर्भवती स्त्रियाँ या नवजात शिशुओं की माताएँ संग्रहण कार्य या छोटे जानवरों का शिकार घर से बहुत दूर नहीं कर सकती थीं। यह सच है कि ऐसा दरअसल प्राकृतिक/ जैविक कारणों की वजह से था, परंतु इसके पीछे के सामाजिक कारण, जो शायद अधिक महत्वपूर्ण थे, की अनदेखी हमें नहीं करनी चाहिए। गर्डा लर्नर इसे बखूबी व्याख्यायित करती हैं। उनके अनुसार स्त्रियों का मुख्यतः घर एवं घर के नजदीकी क्रियाकलापों में संलग्न होना एक सामाजिक आवश्यकता इसलिए थी क्योंकि जिस दौर की चर्चा हो रही है, उस दौरान जीवन की परिस्थितियाँ अत्यधिक अनिश्चित व संकटपूर्ण थी। स्त्रियों को गर्भधारण कई बार करना होता था क्योंकि जीवित शिशु के जन्म लेने की दर बहुत कम थी। बच्चे के लिए दूध के सिवा कोई अन्य विकल्प न होने के कारण, उनका शैशव काल भी लंबा होता था और माताओं को दो-तीन वर्षों तक शिशु का पोषण करना होता था। साथ, पुरुष व महिला की जीवन अवधि छोटी होती थी (महिलाओं की अधिक कम) और खाद्य सामग्री के बचत व संचय के विकल्प भी अत्यधिक सीमित थे। ऐसी परिस्थितियों में यह आवश्यक था कि स्त्रियाँ अपने जीवन काल का एक बड़ा हिस्सा गर्भधारण, प्रजनन व शिशु पोषण में बिताएँ। इसके अलावा उन्हें शिकार जैसे जोखिम भरे गतिविधियों में शामिल करने का खतरा भी समाज नहीं ले सकता था। दरअसल समाज के इसी प्रबंधन को अपनाकर मानव अपने नस्ल के अस्तित्व को सुरक्षित व निरंतर जारी रख सकता था। लर्नर सविस्तार बताती हैं :

स्पष्टतः, नवपाषाणकालीन अनिश्चित व लघु जीवन काल को ध्यान में रखते हुए, वे कबीले जो अपनी युवा स्त्रियों का जीवन शिकार व युद्धों में संलग्नता से खतरे में डालते थे, साथ उनके दुर्घटनाओं में क्षतिग्रस्त होने की संभाव्यता बढ़ाते थे, उनका वैसे कबीले, जो ऐसा नहीं करते थे, की तुलना में जीवित रहने की आशा कम होगी। अतः, प्रथम लैंगिक विभाजन, जिसमें पुरुष बड़े जानवरों का शिकार एवं स्त्री व बच्चे छोटे जानवरों का शिकार तथा संग्रहण करते हैं, जैविक लैंगिक भिन्नताओं द्वारा निर्धारित थी।

अतः, यह व्यवस्था जो जैविक रूप से निर्धारित थी, दरअसल सामाजिक रुप से आवश्यक थी। यह समीकरण कबीले के जीवित रहने के लिए ज़रूरी था और यह ऐसा ही बना रहा जब तक परिवर्तन की नयी शक्तियाँ उत्पादन प्रक्रिया के विकास के साथ नहीं उभरीं।

एंगेल्स स्त्री अधीनता के प्रश्न को लैंगिक सम्बन्धों व परिवार की बदलती संरचना में अवस्थित करते हैं। उनके अनुसार प्रारम्भिक समाजों में लैंगिक सम्बन्धों के लिए कोई नियम अथवा मानक नहीं थे तथा स्त्री-पुरुष आपस में अनियंत्रित यौन संबंध (promiscuity) बनाते थे जहां, एंगेल्स के शब्दों में, “हर स्त्री पर हर पुरुष का और उसी प्रकार हर पुरुष पर हर स्त्री का समान अधिकार होता था”। धीरे-धीरे कौटुंबिक व्यभिचार के निषेध (incest taboos) व विजातीय विवाह (exogamy) के नियम निर्मित किए गए। समाज इस तरह अनियंत्रित यौन संबंध के दौर से परिवार की संस्था की ओर बढ़ा। एंगेल्स ने परिवार के क्रमशः विकास का खाका खींचते हुए एकविवाह परिवार के पहले के तीन चरणों का जिक्र किया है – रक्त-संबंध, पुनालुआन या यूथ, तथा युग्म परिवार। इस क्रमिक विकास का आधार एंगेल्स ने “नैसर्गिक वरण” (natural selection) को माना है। परिवार के क्रमिक चरण की चर्चा के साथ एंगेल्स ने इसकी भी संभावना प्रस्तुत की है कि “यूथ विवाह की प्रथा के, जो आम तौर पर कायम रहती है, साथ-साथ और उसके भीतर एकांतिक संबंध, न्यूनाधिक समय के लिए युग्म जीवन और बहु-पत्नी विवाह भी पाए जाते हैं”।

वर्तमान मानवशास्त्रियों का विश्लेषण एंगेल्स द्वारा खींचे इस चित्रण से सहमति रखता है। पर इन नए शोधों ने इस सरल, रैखिक विकास के ढांचे की जटिलता को भी दिखाने का प्रयास किया है। यौन संबंध के नियमों के न होने पर अधिकांश विद्वान सहमत होने के साथ यह तर्क भी प्रस्तुत करते हैं कि आदिमानव अधिकांशतः एकविवाह परिवारों में रहते थे। वर्तमान के शिकारी-संग्राहक कबीलों के अध्ययन के आधार पर केथलीन गफ़ (Kathleen Gough) इस संदर्भ का निम्नलिखित मूल्यांकन प्रस्तुत करती हैं :

सभी ज्ञात शिकारी-संग्राहक समुदाय परिवारों में रहते हैं, ना कि सामुदायिक यौनिक व्यवस्था में। अधिकांश शिकारी तो वृहत रक्त संबंधी समूह के बदले एकविवाह परिवारों में रहते हैं। यौन संबंध व्यक्तिगत होते हैं, हालांकि एक पुरुष कभी कभी दो पत्नियों और अपवाद स्वरूप एक औरत दो पतियों के साथ रहते हैं। आर्थिक जीवन वैयक्तिक स्त्री-पुरुष के आपसी सहयोग व श्रम विभाजन पर आधारित होता है। उच्च पाषाण कालीन घर, गुफाएँ व अन्य अवशेष इसी व्यवस्था की ओर इशारा करते हैं।

विद्वानों ने एंगेल्स के “नैसर्गिक वरण” के सिद्धान्त जिसकी यौन सम्बन्धों के नियमों के क्रमिक प्रतिपादन में बड़ी भूमिका थी, से भी सहमति जताई है । सी. डी. डार्लिंगटन (C D Darlington) भी कहते हैं हैं कि विजातीय विवाह संबंध एक सांस्कृतिक नवीनता थी, जिसे समाज द्वारा इसलिए अपनाया गया क्योंकि यह “विकासमूलक लाभ” प्रस्तुत करता था। इस तरह जैसे-जैसे सजातीय/ विजातीय विवाह के नियम बनते चले गए, समाज सामुदायिक से रक्त-संबंधी/ गोत्र व्यवस्था की ओर बढ़ता चला गया।

राजनीतिक अर्थशास्त्रियों का दावा है कि श्रम समस्त संपदा का स्त्रोत है। वास्तव में वह स्रोत है लेकिन प्रकृति के बाद। वही इसे यह सामग्री प्रदान करती है जिसे श्रम संपदा में परिवर्तित करता है। पर वह इससे भी कहीं बड़ी चीज है। वह समूचे मानव अस्तित्व की प्रथम मौलिक शर्त है और इस हद तक प्रथम मौलिक शर्त है कि एक अर्थ में हमें यह कहना होगा कि मानव का सृजन भी श्रम ने ही किया है।
– एंगेल्स
(वानर से नर बनने में श्रम की भूमिका, 1876)

II

पशुपालन व रक्त-संबंध आधारित व्यवस्था : पुरुष सत्ता एवं स्त्री यौनिकता पर नियंत्रण का प्रारम्भ

प्राकृतिक चयन की गतिकी से लैंगिक सम्बन्धों व विवाह का वृत्त क्रमशः छोटा तथा सीमित हो रहा था। इससे समाज धीरे धीरे एक रक्त-संबंध/ गोत्र आधारित सामाजिक संरचना की ओर परिवर्तित होता गया। साथ, समाज आर्थिक दृष्टि से शिकारी-संग्राहक से पशुपालन की ओर भी विकसित हो चला। यह ऐतिहासिक रूप से एक अभूतपूर्व पड़ाव था क्योंकि पहली बार धन के नए स्रोत व अधिशेष उत्पन्न हो रहे थे। एंगेल्स इन परिवर्तनों का शानदार चित्रण प्रस्तुत करते हैं :

यहाँ पशुपालन ने संपदा का एक ऐसा स्रोत उन्मुक्त कर दिया था, जिसकी पहले कल्पना भी नहीं की गयी थी, और सर्वथा नए सामाजिक सम्बन्धों को जन्म दिया था। बर्बर युग की निम्न अवस्था तक मकान, कपड़े, अनगढ़ जेवर और आहार तथा तैयार करने के औज़ार : नाव, हथियार और बहुत मामूली ढंग के घरेलू बर्तन-भांडे ही स्थायी संपत्ति थे। आहार हर रोज़ नए सिरे से प्राप्त करना पड़ता था। परंतु अब घोड़ों, ऊंटों, गधों, गाय-बैलों, भेड़-बकरियों और सूअरों के रेवड़ों के रूप में गड़रियों का जीवन बितानेवाले उन्नत लोगों को … एक ऐसी संपदा मिल गयी थी, जिसकी केवल देख-रेख और अत्यंत साधारण निगरानी करने से ही काम चल जाता था। यह संपदा दिन-दूनी रात-चौगुनी बढ़ती जाती थी और इससे लोगों को दूध और मांस के रूप में अत्यधिक स्वास्थ्यकर भोजन मिल जाता था।

धन के इस नए स्रोत ने अधिशेष और संपत्ति को निर्मित किया। यह संपत्ति गोत्र (gens) के अधिकार में होती थी। इससे मानव सम्बन्धों में एक नया तत्व जुड़ा – अधिशेष वस्तुओं के नियमित विनिमय की प्रथा। इस संदर्भ में फिर से एंगेल्स का ही उद्धरण नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है :

ये पशुपालक कबीले अन्य बर्बर कबीलों से न सिर्फ ज्यादा खाने-पीने का सामान तैयार करते थे, बल्कि अधिक विविधतापूर्ण सामान तैयार करते थे। उनके पास न केवल दूध, दूध से बनाई वस्तुएँ और गोश्त दूसरे कबीलों की तुलना में अधिक मात्रा में होता था, बल्कि उनके पास खालें, ऊन, बकरियों के बाल और ऊन कातकर और बुनकर बनाए गए कपड़े भी थे, जिनका इस्तेमाल, कच्चे माल की मात्रा में दिनोंदिन होने वाली बढ़ती के साथ-साथ, लगातार बढ़ रहा था। इससे पहली बार नियमित रूप से विनिमय संभव हुआ। इसके पहले की अवस्थाओं में केवल कभी-कभी ही विनिमय संभव था … परंतु जब पशुपालक कबीलों ने स्पष्ट आकार ग्रहण किया, तो भिन्न भिन्न कबीलों के सदस्यों के बीच विनिमय आरंभ होने और विकास करने तथा एक नियमित सामाजिक प्रथा के रूप में समाज में जड़ जमा लेने के लिए सभी अनुकूल परिस्थितियाँ पैदा हो गईं। “   

रक्त-संबंध आधारित समाजों की इस नयी व्यवस्था जिसमें धन, अधिशेष एवं विनिमय है, ने स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की गतिकी को भी बदला। इसे बेहतर समझने के लिए उन प्रक्रियाओं का मूल्यांकन आवश्यक है जो सामुदायिक से गोत्र व्यवस्था के बीच के संक्रमण काल में घटित हो रहे थे।

इस आलेख के प्रथम भाग में उल्लेखित है कि प्रारम्भ में स्त्री-पुरुष श्रम विभाजन स्वाभाविक एवं आर्थिक परस्परता पर आधारित था। दोनों के कार्यक्षेत्र एक दूसरे पर आश्रित थे एवं उनके बीच कोई सख्त विभाजन रेखा नहीं थी। परंतु, जैसे-जैसे औज़ार निर्माण एवं शिकार के तकनीकी ज्ञान में विस्तार हुआ, स्त्री व पुरुष, दोनों, के कार्यक्षेत्र जटिल होते चले गए। लीला लिबोवीज (Leila Leibowitz) इस संदर्भ में प्रक्षेप्य अस्त्र से शिकार की तकनीक से आए परिवर्तनों का विश्लेषण प्रस्तुत करती हैं। वे बताती हैं कि प्रक्षेप्य यानि दूर से फेंक कर शिकार करने वाले औज़ार के प्रयोग से नयी परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं – जैसे शिकार में वृद्धि से खाने के मांस में अधिकता, शिकार करने के लिए कुशलता व प्रशिक्षण की आवश्यकता, परिपक्व व कुशल अधिक-उम्र के शिकारियों द्वारा शिकार जिसके कारण बच्चे व कम उम्र के अकुशल शिकारियों की आवश्यकता का समाप्त हो जाना तथा इस वजह से बच्चे व अवयस्कों का आश्रितों में परिवर्तित हो जाना। घरेलू कार्यों में भी विविधता आई – भोजन पकाने व उसकी आवश्यक तैयारी में अधिक समय का लगना, कच्चे खाद्य सामाग्री को तैयार करने के लिए नए औजारों का निर्माण, चमड़े को पहनावे व अन्य उपयोगी वस्तुओं में परिवर्तित करना एवं इन सब के लिए आवश्यक कुशलताओं में प्रशिक्षित होना। स्त्री-पुरुष के कार्यों में आए विस्तार और जटिलता ने क्रमशः लैंगिक श्रम विभाजित क्षेत्रों के अलगाव में भूमिका निभाई। चूंकि निपुणता व प्रशिक्षण आवश्यक था, इसलिए स्त्री-पुरुष दोनों पर एक नयी ज़िम्मेदारी आई – अवयस्क सदस्यों को भविष्य की भूमिका के लिए ज़रूरी शिक्षा देना।

लिबोविज़ के अनुसार जब लैंगिक श्रम विभाजन में स्पष्टता आ जाती है, तब यह शुरू से ही निर्धारित करना पड़ता है कि किस बच्चे को भविष्य में माता की भूमिका निभानी है और किसे नहीं, कौन से गुण किसे सीखने हैं किसे नहीं, इत्यादि। इस तरह बालक-बालिकाएँ, स्त्री-पुरुष एक दूसरे से अलग होते चले जाते हैं। लड़कियां महिलाओं से प्रशिक्षित होती है और लड़के पुरुषों से, और जैसे जैसे शिकार व घरेलू कार्य जटिल व निपुणता आधारित होते चले जाते हैं, जेंडर भेद भी बनने लगते हैं।

इस तरह मानव सभ्यता के प्रथम दौर यानि शिकारी-संग्राहक के आदिम साम्यवादी अवस्था में ही हम एक ऐसे चरण पर पहुँच जाते हैं जब गृहस्थी मुख्य रूप से स्त्रियों व युवतियों का क्षेत्र बन जाता है एवं पुरुष व युवक बाहरी दुनिया तथा सार्वजनिक क्षेत्र से अधिकाधिक संबंधित हो जाते हैं। परंतु इस अवस्था में अब तक लैंगिक श्रम विभाजन संस्थागत नहीं हो पाता है। यानि दोनों के कार्य क्षेत्र के बँटवारे का कोई दृढ़ नियम या मानक नहीं। इस लचीलेपन के बावजूद यह कहना आवश्यक होगा कि इसी कार्य विभाजन की आधारशिला पर भविष्य में इसका अंतिम संस्थानिकरण होता है।

इस दिशा में प्राथमिक कदम था कौटुंबिक व्यभिचार व विजातीय विवाह के निषेधात्मक नियमों का स्पष्ट निर्धारण। यह संभवतः शिकारी-संग्रहण के दौर से पशुपालन के चरण के बीच हुआ था। लिबोवीज बताती हैं कि इस नियम निर्धारण ने स्त्री-पुरुष के अंतर-कबीले/ अंतर-गोत्रीय लेन-देन या विवाह को आवश्यक किया। इस तरह का लेन-देन तभी लाभकारी हो सकता था अगर कबीले में आने वाला नया सदस्य – चाहे वह स्त्री हो या पुरुष – अपने कार्यक्षेत्र के पारंपरिक दायित्वों को निभाने में पर्याप्त रूप से निपुण हो। लिबोवीज के शब्दों में :

विवाह व कौटुंबिक व्यभिचार निषेध के आविष्कार ने एक ऐसी स्थिति पैदा की जिसमें हर एक अथवा लगभग हर पुरुष, चाहे वह अपनी युवावस्था में कितना भी शक्तिशाली, ऊंचे कद का या खासकर ऊर्जावान रहा हो, एक पति के रूप में उसका योग्य मूल्य तब ही होगा जब उसने एक वयस्क पुरुष की कुशलताओं को हासिल कर रखा हो। ठीक इसी तरह, एक विवाह योग्य कन्या वह है जिसने स्त्रियॉं की निपुणताओं को अर्जित किया हो। ”            

यौन व विवाह संबंधी नियमों का निर्धारण एक और मायने में ऐतिहासिक तौर पर महत्वपूर्ण था। इसी प्रक्रिया में स्त्री-यौनिकता के नियंत्रण संबंधी विचार के बीज भी मिलते हैं। यह सत्य है कि इसके तहत स्त्री-पुरुष, दोनों के लिए निषेधात्मक नियम होंगे, परंतु प्रजनन को नियंत्रित करने की ज़रूरत में स्त्री यौनिकता पर नियंत्रण कहीं अधिक आवश्यक था।

इस नयी उत्पादन प्रक्रिया, जिसमें अधिशेष, संपत्ति एवं नियमित विनिमय आरंभ हो चुके थे, ने अब तक के आपसी समानता व निर्भरता आधारित स्त्री-पुरुष समीकरण को बदला। यहाँ दो प्रक्रियाएँ देखने को मिलती हैं। पहला, गोत्र-संपत्ति के उदय के बाद समूह की सदस्यता का प्रश्न पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया, क्योंकि जो समूह का सदस्य होगा समूह के संसाधन में हिस्सेदार भी होगा। अतः अब प्रजनन को समूह की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर नियम में बांधने की आवश्यकता और बढ़ गयी, जिसका अर्थ था स्त्री यौनिकता पर पहले से अधिक सामाजिक नियंत्रण। दूसरे, अधिशेष के आने से विनिमय और संसाधनों के पुनर्वितरण नयी उत्पादन प्रणाली के नियमित लक्षण बन गए। चूंकि यह कार्य पारंपरिक तौर पर पुरुषों द्वारा किए जा रहे थे, अतः उनके कार्यक्षेत्र में विस्तार हुआ। इसके अलावा संपत्ति अंतर-कबीलाई गुटों की लड़ाईयों का कारण भी बनी। इस वजह से पुरुष की भूमिकाओं, जैसे युद्ध करना, रक्षा करना, इत्यादि, की महत्ता भी बढ़ी। आगे जब समाज कृषक उत्पादन प्रणाली की ओर बढ़ता है, तो पुरुष का कार्यक्षेत्र और विस्तारित होता है, साथ पुरुष सत्ता में भी वृद्धि होती है।

III

कृषक समाज : निजी संपत्ति, एकविवाह व पितृसत्ता की स्थापना

एंगेल्स पुरुष सत्ता के उदय को पशुपालन से कृषि उत्पादन के संक्रमण काल में होने वाली दो समानान्तर प्रक्रियाओं में ढूंढते हैं – पहले, परिवार के युग्म, पितृसतातमक व अंततः एकविवाह चरण की ओर क्रमशः विकास, तथा दूसरे, रक्त-सम्बन्धों पर आधारित गोत्र व्यवस्था के टूटने व परिवार का समाज की महत्वपूर्ण इकाई के रूप में उदय। इस दूसरी प्रक्रिया का अर्थ सामुदायिक संपत्ति का व्यक्तिगत या निजी संपत्ति में परिवर्तन भी था। इसी संक्रमण काल में जब बहुआयामी परिवर्तन हो रहे थे – यानि उत्पादन प्रणाली, परिवार तथा संपत्ति अधिकार निरंतर निर्णायक तौर पर बदल रहे थे – इसी बिन्दु पर एंगेल्स मातृवंश व मातृ-अधिकार के विघटन एवं स्त्री परवशता व पुरुष सत्ता के अंतिम संस्थानिकरण को अवस्थित करते हैं। वे सविस्तार बताते हैं :

इस प्रकार जैसे-जैसे संपत्ति बढ़ती गयी, वैसे वैसे इसके कारण एक ओर तो परिवार के अंदर नारी की तुलना में पुरुष का दर्जा ज्यादा महत्वपूर्ण होता गया और दूसरी ओर, पुरुष के मन में यह इच्छा ज़ोर पकड़ती गयी कि अपनी मजबूत स्थिति का फायदा उठाकर उत्तराधिकार की पुरानी प्रथा को उलट दिया जाए, ताकि उसके अपने बच्चे हकदार हो सकें। परंतु जब तक मातृ-अधिकार के अनुसार वंश चल रहा था, तब तक ऐसा करना असंभव था। इसलिए आवश्यक था की मातृ-अधिकार को उलट दिया जाए और ऐसा किया भी गया… यह क्रान्ति सभ्य जनगण में कब और कैसे हुई, इसके बारे में हम कुछ नहीं जानते। यह पूर्णतः प्रागैतिहासिक काल की बात है। 

एंगेल्स द्वारा प्रतिपादित इस रूपरेखा से उत्तरोत्तर विद्वान सहमत हैं। वे स्त्री परवशता की निर्णायत्मकता को एंगेल्स की तरह ही निजी संपत्ति के उदय से जोड़ते हैं। हालांकि उन्होने नए तथ्यों के आधार पर इस रूपरेखा की जटिलता को दिखाने का भी प्रयास किया है। इसके साथ इन विद्वानों का मानना है कि मातृवंशीय व्यवस्था का उन्मूलन एक अकस्मात घटने वाली क्रांतिकारी घटना नहीं थी और ना ही यह मात्र “पुरुष इच्छा” या उत्तराधिकार को लेकर पुरुष चिंता का परिणाम थी।

अधिकांश मानवशास्त्री इस तथ्य को लेकर एकमत हैं कि मातृवंशीय व्यवस्था पितृवंश से अधिक प्राचीन है। स्टेफनी कूँज ने अपने अध्ययन में बेहद तार्किक तरीके से मातृवंश से पितृवंश तक के संक्रमण को चित्रित किया है। उनका प्रमुख तर्क है कि अधिशेष के संचय एवं घरेलू श्रम के संचालन में पितृवंशीय व्यवस्था अधिक कुशल साबित होती है। दोनों व्यवस्थाओं की आंतरिक गतिकी व कार्य प्रणालियों में कुछ निर्णायक अंतर हैं जो पितृवंशीय संरचना के पक्ष में काम करती हैं। हम जानते हैं कि पुनर्वितरण गोत्र समाज की एक प्रमुख प्रथा है। मातृवंशीय समाज में पुनर्वितरण का दायरा पितृवंशीय व्यवस्था से अधिक बड़ा हो जाता है। मातृवंशीय पुरुष को स्वयं द्वारा संचित संसाधन अपनी बहनों के परिवारों, पत्नियों व पूर्वजों तक वितरित करना होता है। जबकि पितृवंशीय गोत्र के सभी पुरुष एक साथ एक नातेदारी में रहते हैं, अतः पुरुष द्वारा संचित संसाधन उसी गोत्र में रह जाता है। फिर पितृवंशीय व्यवस्था से संबन्धित पुरुष उत्पादन और विनिमय को नियंत्रित करने के साथ धन इकट्ठा करने में घरेलू श्रम की भूमिका को पहचानते हुए स्त्री श्रम को बेहतर रूप से संचालित करने के लिए अभिप्रेरित रहते हैं। मातृवंशीय व्यवस्था में यह मुमकिन नहीं। इसका एक कारण यह भी है कि स्त्रियों का घरेलू काम पुरुषों के बाहरी कामों की तुलना में हर दिन आवश्यक रूप से किया जाना ज़रूरी होता है। ऐसे में एक पितृवंशीय व्यवस्था घरेलू श्रम पर नियंत्रण व प्रभुत्व बनाने की अधिक स्वतन्त्रता व उत्प्रेरणा देती है। इस तरह पितृवंशीय सामाजिक संरचना घरेलू व बाहरी, दोनों, को बेहतर नियंत्रित व संचालित कर अधिशेष व संपत्ति संचय में अधिक कुशल साबित होता है। इस कारण इस व्यवस्था की उत्तरजीविता व क्षमता उसे मातृवंशीय व्यवस्था से अधिक श्रेष्ठ बनाती है। एक ऐसे ऐतिहासिक पड़ाव में जब धन व संपत्ति का संचय अस्तित्व को बनाए रखने के लिए सबसे ज्यादा आवश्यक हो, वैसे समय में पितृवंशीय व्यवस्था का बने रहना स्वाभाविक था। कूँज कहती हैं कि इसी तार्किक प्रक्रिया के आधार पर अधिकांश मातृवंशीय समाज पितृवंशीय व्यवस्था में परिवर्तित होते चले गए। अतः एंगेल्स द्वारा प्रस्तावित तर्क कि पुरुष इच्छा के कारण मातृवंशीय व्यवस्था की पराजय हुई, के साथ साथ इस क्रमिक प्रक्रिया की गणना भी ज़रूरी है जिसकी वजह से पितृवंश की अंतिम स्थापना हो पायी।    

इन सभी परिवर्तनों की पृष्ठभूमि में एक शक्तिशाली कारक काम कर रहा था – धन व संपत्ति का संचय जो फिलहाल क़बायली वंश के नियंत्रण में था। परंतु कबायली वंशीय प्रणाली में भी निजी संपत्ति के बीज छिपे थे। एंगेल्स उदाहरण देते हैं कि पालतू पशु परिवारों के मुखिया की पृथक संपत्ति हुआ करती थी। जैसे जैसे उत्पादन प्रक्रिया का क्रमिक विकास हुआ एवं कृषि में उन्नति हुई, वंशीय संरचना के भीतर पुरुषों की व्यक्तिगत संचित संपत्ति में बढ़ोत्तरी हुई। इससे आगे चलकर गोत्र आधारित सामुदायिक स्वामित्व का विघटन हुआ एवं व्यक्तिगत स्वामित्व अपनी पूर्णता में अस्तित्व में आई। एंगेल्स निजी संपत्ति के आगमन को उत्पादन प्रक्रिया के इसी चरण में अवस्थित करते हैं जब उत्पादन के हर क्षेत्र में – मवेशी प्रजनन, कृषि तथा हस्तशिल्प – में वृद्धि हो रही थी। यह कैसे हुआ, इसके बारे में एंगेल्स अधिक बताते नहीं। परंतु एथेंस के संदर्भ में उन्होने रक्त-संबंध आधारित समाजों के विघटन की प्रक्रिया को व्याख्यायित किया है। यह व्याख्या सामुदायिक से निजी स्वामित्व की ओर संक्रमण को समझने में महत्वपूर्ण है :

उद्योग धंधों और विनिमय की उन्नति के साथ-साथ उत्पादन की विभिन्न शाखाओं के बीच – जैसे कि खेती, दस्तकारी, दस्तकारी के अंदर विभिन्न शिल्पों, व्यापार, जहाजरानी, इत्यादि के बीच – श्रम विभाजन और भी पूर्ण रूप से विकसित हो गया था। अब लोग अपने-अपने पेशों के अनुसार काफी सुनिश्चित समूहों में बंट गए थे और प्रत्येक समूह के कुछ ऐसे नए समान हित पैदा हो गए थे, जिनके लिए गोत्र में या बिरादरी में कोई स्थान न था और इसलिए उनकी देखभाल करने के लिए नए पदों को कायम करना आवश्यक था। दासों की संख्या बहुत अधिक बढ़ गयी थी और उस प्रारम्भिक अवस्था में भी वह स्वतंत्र एथेन्सवासियों की संख्या में कहीं अधिक रही होगी। गोत्र व्यवस्था शुरू में दास व्यवस्था से अनभिज्ञ थी और इसलिए वह ऐसे उपाय को भी नहीं जानती थी, जिसके द्वारा दासों के इस विशाल जन समुदाय को दबाकर रखा जा सकता। और अंतिम बात यह है कि व्यापार के आकर्षण से बहुत से अजनबी एथेंस में आकर बस गए थे, क्योंकि वहाँ धन कमाना आसान था; पुरानी व्यवस्था के अनुसार इन अजनबियों को न तो कोई अधिकार प्राप्त था और न कानून उनकी किसी तरह रक्षा करता था।

इस तरह सगोत्रीय रक्त संबंध आधारित व्यवस्था के विघटन की परिस्थितियाँ तैयार हुईं जिसके साथ निजी स्वामित्व का उदय हुआ। निजी स्वामित्व के आगमन ने एकविवाह परिवार एवं श्रम के लैंगिक विभाजन को संस्थागत किया। साथ निजी संपत्ति का अस्तित्व वस्तु विनिमय व पुरुष के सार्वजनिक शक्ति के विस्तार से भी गहराई से जुड़ा है। इन सब ने मिलकर स्त्री स्वतन्त्रता व सामाजिक प्रतिष्ठा पर अंतिम प्रहार किया। आगे बढने से पहले हमें दोबारा स्मरण कर लेना चाहिए कि जिस दौर की हम बात कर रहे हैं वह पिछले चरणों से कई मामले में भिन्न थी – कृषि के विस्तार ने अधिशेष की एक नियमित आपूर्ति को सुनिश्चित कर दिया था और इसका स्वाभाविक परिणाम था निजी संपत्ति के हुकूमत का प्रबलन; शिल्प विशिष्टीकरण के आने से विनिमय प्रक्रिया में तेज़ी, जिसने जिंस और व्यापार को उत्पादन प्रक्रिया का प्रमुख आधार बनाया; वर्ग विभेद उत्पन्न हो चुका था तथा “समाज के पहले बड़े विभाजन का उदय हुआ, समाज दो वर्गों में बंट गया : एक ओर दासों के मालिक हो गए और दूसरी ओर दास, एक ओर शोषक हो गए और दूसरी ओर शोषित” (एंगेल्स)। निम्नलिखित चर्चा इसी सामाजिक-आर्थिक संदर्भ में स्त्रियों की अधीनता की अंतिम स्थापना को अवस्थित करने का प्रयास करेगा। 

निजी संपत्ति ने स्त्री स्वतन्त्रता व सामाजिक स्थिति पर दो निर्णायक तरीकों से प्रतिकूल प्रभाव डाला – सर्वप्रथम, निजी संपत्ति व एकविवाह पारिवारिक संरचना ने व्यक्तिगत उत्तराधिकार की अवधारणा को संस्थागत किया। अब स्त्री यौनिकता पर सख्त नियंत्रण अति आवश्यक हो गया – वैध संतान को उत्तराधिकार सुनिश्चित करने के लिए स्त्री व्यवहार व चाल चलन पर पहरा लगाना अनिवार्य हो गया। एंगेल्स स्पष्ट विवरण देते हैं :

एकविवाह परिवार पुरुष की प्रधानता पर आधारित होता है। उसका स्पष्ट उद्देश्य ऐसे बच्चे पैदा करना होता है, जिनके पितृत्व के बारे में कोई विवाद न हो। यह इसलिए ज़रूरी होता है कि समय आने पर ये बच्चे अपने पिता के सीधे उत्तराधिकारियों के रूप में दौलत विरासत में पा सकें … अपनी पत्नी के प्रति वफादार न रहने का उसका अधिकार अब भी कायम रहता है, कम से कम रीति रिवाज इस अधिकार को मान्यता प्रदान करते हैं … और समाज के विकास के साथ-साथ पुरुष इस अधिकार का अधिकाधिक प्रयोग करता है। परंतु यदि पत्नी प्राचीन यौन-सम्बन्धों की प्रथा की याद करके उन्हें फिर से लागू करना चाहे, तो उसे पहले से भी अधिक सज़ा दी जाएगी।

इस संदर्भ में एंगेल्स ने वफादारी एवं व्यक्तिगत प्रेम, जो कि एकविवाह से संबन्धित है, जैसे आधुनिक विचारों के ढोंग की कलई खोली तथा उसे हेटरिज़्म (hetaerism, यानि शादीशुदा पुरुष द्वारा अन्य स्त्रियों के साथ विवाहेत्तर संबंध बनाना), वेश्यावृत्ति, व व्यभिचार से जोड़ा। एंगेल्स इस विषय की शानदार व्याख्या करते हैं :

लेकिन इससे स्वयं एकविवाह प्रथा के भीतर एक दूसरा अंतर्विरोध पैदा हो जाता है। पति के साथ-साथ, जिसके जीवन में हेटरिज़्म रंगीनी लाती थी, उपेक्षित पत्नी भी तो खड़ी है। जिस प्रकार आधे सेब खाने के बाद पूरा सेब हाथ में रखना असंभव है, उसी प्रकार विरोध के दूसरे पहलू के बिना पहले पहलू का होना नामुमकिन है। परंतु यह मालूम होता है कि जब तक उनकी पत्नियों ने उन्हें सबक नहीं सिखाया, तब तक पुरुष ऐसा नहीं सोचते थे। एकविवाह के साथ-साथ दो नए पात्र समाज के रंगमंच पर स्थायी रूप से उतर आए : एक – पत्नी का प्रेमी, यानि यार, दूसरा – यारनी का पति। इसके पहले ये पात्र इतिहास में नहीं देखे गए… परपुरुषगमन व्यभिचार पर प्रतिबंध था, उसके लिए सख्त सज़ा मिलती थी, फिर भी वह दबाया नहीं जा सकता था। वह एकविवाह प्रथा और हटेरिज़्म के साथ-साथ एक लाजिमी सामाजिक रिवाज बन गया था। पहले की तरह अब भी बच्चों के पितृत्व का निश्चित होना केवल नैतिक विश्वास पर आधारित था।

निजी संपत्ति तथा उसकी सहगामी एकविवाह परिवार व्यवस्था स्त्री यौनिकता पर पुरुषों के कड़े नियंत्रण व पहरेदारी को अंजाम देते हैं। महिला का प्रजनन कार्य भी निजी संपत्ति की भांति पुरुष स्वामित्व के अधीन आ जाता है। सामाजिक चेतना में यह कई रूपों में अभिव्यक्त होता है – पुरुष का स्त्री का रक्षक होना; कौमार्य व चरित्र-शुचिता स्त्री के परम कर्तव्य होना; पुरुष, परिवार व स्वयं स्त्री की प्रतिष्ठा उसकी यौनिकता द्वारा निर्धारित होना; और, स्त्री का अंतिम आदर्श एक समर्पित पत्नी और पुत्र को जन्म देने वाली माँ बनना। यही सामाजिक चेतना अंतिम छोर पर अपने निम्न स्तरों में परिलक्षित होती है – स्त्री देह का वस्तुकरण व पन्यीकरण एवं स्त्री अस्तित्व का न्यूनीकरण कर उसे पुरुष कामुकता को संतुष्ट करने का मात्र साधन समझना। अपने सबसे विकृत रूप में यह चेतना यौन शोषण व बलात्कार द्वारा अभिव्यक्त होती है। सबसे पहले स्त्री-देह उसके पुरुष की निजी संपत्ति बनती है जिसका एकमात्र उद्देश्य उसकी जरूरतों और इच्छाओं की पूर्ति करना होता है। इसी विचार से स्वाभाविक रूप से जो व्यापक सोच निकलती है वह है सम्पूर्ण नारी जाति के अस्तित्व की एकमात्र सार्थकता पुरुष समाज के हरेक व हर अजीबोगरीब मांग और सनक को पूरा करने में होना। महिला के शरीर व यौनिकता पर पुरुष समाज के क्रमिक नियंत्रण, व उसका स्वयं पुरुष की निजी संपत्ति के रूप में अंतिम परिवर्तन, इन दोनों ऐतिहासिक प्रक्रियाओं में ही हमें बलात्कार व यौन उत्पीड़न जैसी घटनाओं को अवस्थित कर समझना होगा। यह दोहराना ज़रूरी होगा कि इन सबके लिए भौतिक आधार बीते हुए अतीत में तैयार हो रहे थे। यहाँ यह भी याद कर सकते हैं कि स्त्री यौनिकता पर पहरेदारी व नियंत्रण प्रागैतिहासिक काल में ही शुरू हो गए थे जब कौटुंबिक व्यभिचार व विजातीय विवाह के नियम निर्धारित किए जा रहे थे। निजी संपत्ति व एकविवाह प्रथा ने इस प्रक्रिया को सुदृढ़ व औपचारिक बनाया तथा पुरुष सत्ता पर अंतिम मोहर लगाई।         

स्त्री परवशता व पुरुष आधिपत्य के संस्थानिकरण में निजी संपत्ति की दूसरी महत्वपूर्ण भूमिका उत्पाद विनिमय की प्रक्रिया के विस्तार से जुड़ी है। जैसा कि पिछली चर्चा में उल्लेख किया गया है, विनिमय पशुचारण आधारित कबीलाई/ गोत्र संपत्ति के अस्तित्व में आने पर शुरू होती है। लैंगिक श्रम विभाजन के होने का अर्थ था कि विनिमय का क्षेत्र पुरुषों द्वारा संभाला जाएगा। कृषि उत्पादन प्रक्रिया में जैसे जैसे विस्तार हुआ, शिल्प का विशेषीकरण संभव हुआ तथा विनिमय व व्यापार अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन गए। जैसे-जैसे इसका क्षेत्र बढ़ा, उसी तरह निजी संपत्ति व अधिशेष में भी वृद्धि हुई। चूंकि बाहरी दुनिया पुरुषों का क्षेत्र थी, उसमें विस्तार हुआ और पुरुष प्रभुता बढ़ी। एंगेल्स कहते हैं – “उत्पादन से प्राप्त बेशी पैदावार पुरुष की संपत्ति होती थी; नारी उसके लिए उपभोग में हिस्सा बँटाती थी, परंतु उसके स्वामित्व में नारी का कोई भाग नहीं होता था”। यहाँ यह कहना गैर ज़रूरी होगा कि महिलाएं भी उत्पादन प्रक्रिया व अधिशेष के संचय में समान रूप से योगदान दे रही थीं – वे घरेलू काम काज की ज़िम्मेदारी तो उठा ही रही थीं साथ कृषि व मवेशी की देखभाल में भी अपनी भूमिका निभाती थीं। लेकिन लैंगिक श्रम विभाजन के संस्थागत होने व निजी संपत्ति पर पुरुष के मालिकाने के परिणामस्वरूप, स्त्रियाँ मात्र उत्पादक बन कर सीमित रह गईं, व पुरुष उसके श्रम को हस्तगत करता चला गया। एंगेल्स के शब्दों में “पुरुष बुर्जवा है तथा उसकी पत्नी सर्वहारा”।

दरअसल बाहरी अर्थव्यवस्था में जो नए उत्पादन के संबंध बने जिससे श्रम करने वाले व उसे हथियाने वाले का वर्ग-विभेद तैयार हुआ, उसी का प्रतिबिंब घरेलू उत्पादन सम्बन्धों यानि पुरुष और स्त्री के बीच भी बना। एलिनर लीकोक (Eleanor Leacock) के शब्दों में :

विनिमय आधारित नए आर्थिक संबंध चूंकि पुरुषों के हाथ में थे इसलिए महिलाओं को विशेष रूप से नुकसान हुआ… क्योंकि इन सम्बन्धों ने स्त्रियों द्वारा नियंत्रित सामुदायिक घरेलू क्षेत्र का अवमूल्यन किया एवं स्त्री के घरेलू कार्य को निजी सेवा में परिवर्तित कर दिया। ” 

यह सुनने में व्यंग्यात्मक प्रतीत होता है कि पूर्व का वह प्राकृतिक लैंगिक श्रम विभाजन जिसका आधार सहूलियत व स्त्री-पुरुष संपूरकता थी, वही दरअसल स्त्री अधीनता के निर्णयात्मक स्थापना का आधार बनता है। एंगेल्स के शब्दों में – “जिस कारण से पहले घर में नारी सर्वेसर्वा थी – यानि उसका घरेलू कामकाज तक ही सीमित रहना – उसी ने अब घर में पुरुष का आधिपत्य सुनिश्चित बना दिया”।

वस्तु विनिमय के अलावा कुछ अन्य कारक भी पुरुष क्षेत्र के विस्तार में सहायक हुए। करेन सैक्स (Karen Sacks) इन तत्वों की ओर इशारा करती हैं। वह प्रश्न करती हैं कि वर्ग-विभाजित समाज में हर पुरुष के पास निजी संपत्ति नहीं होती परंतु फिर भी पुरुष सत्ता व्यापक तौर पर हर वर्ग में क्यों दिखाई देती है? इसका उत्तर वे सार्वजनिक श्रम के सामूहिक प्रतिरूपों में देखती हैं, जैसे सार्वजनिक कार्यों में बेगारी, अनिवार्य सैनिक सेवा, युद्ध, शासक वर्ग के लिए सामूहिक श्रम इत्यादि। सैक्स कहती हैं कि इस सार्वजनिक क्षेत्र में पुरुष ही मुख्य भागीदार बना। अतः वर्ग-विभाजित समाजों की यह प्रकृति होती है कि “वे पुरुष कार्यों का सामाजीकरण व महिलाओं का घरेलुकरण करें। इससे महिलाओं  को वयस्कता नकारने का भौतिक व व्यवस्थागत आधार तैयार होता है तथा यह शासक वर्ग द्वारा महिलाओं को पुरुषों के रक्ष्य के रूप में परिभाषित करने को स्वीकार्य भी बनाता है”। यहाँ यह जोड़ा जा सकता है कि उत्पादन का यह सामाजिक क्षेत्र जो पूर्व के विपरीत अब उत्पादन का प्रमुख स्थान बन कर उभरता है, यह हर पुरुष, चाहे वह किसी भी वर्ग का हो, के मन में वास्तविक अन्नदाता होने की भ्रामक चेतना उत्पन्न करता है; साथ महिलाएं मात्र उपभोक्ता, व आश्रित के रूप में देखी जाती हैं। इसके अलावा हम मार्क्स के उस लोकप्रिय कथन से भी वाकिफ हैं कि “हर युग के शासक विचार ही शासक वर्ग के विचार होते हैं, यानि जो समाज की शासक भौतिक शक्ति है, वही समाज की शासक बौद्धिक शक्ति भी होता है”। इस आधार पर यह तर्क दिया जा सकता है कि संपत्तिवान पुरुष, जो न सिर्फ स्त्री श्रम को हस्तगत करता है, बल्कि उसके देह व अस्तित्व पर भी प्रभुत्व कायम करता है, की चेतना को निम्न और सर्वहारा वर्ग अभिभूत कर लेता है। और इसलिए हर वर्ग के पुरुष पितृसत्तात्मक सोच के वाहक बन जाते हैं। यहीं पर आकर स्त्री परवशता और पितृसत्ता की स्थापना की लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया पूर्ण होती है – भौतिक व वैचारिक दोनों स्तरों पर।

निष्कर्ष की ओर : भविष्य के रास्तों की तलाश का प्रयास

ऐतिहासिक भौतिकवाद का मार्क्सवादी सिद्धान्त अतीत के अध्ययन की सर्वाधिक वैज्ञानिक पद्धत्ति तो है ही, साथ यह अपने आप में एक शक्तिशाली उपकरण भी है जो वैध व व्यावहारिक उत्तर देने के वायदे करता है। पितृसत्ता को ऐतिहासिकता प्रदान कर ऐतिहासिक भौतिकवाद जहां इसकी जड़ों का पता लगाता है, वहीं इसकी नींव को ध्वस्त करने के कारगर रास्ते भी दिखाता है। एंगेल्स के विश्लेषण पर आधारित प्रस्तुत चर्चा में स्त्री परवशता की ऐतिहासिक प्रक्रिया को भौतिक परिस्थितियों यानि उत्पादन प्रक्रिया व सामाजिक संगठन में अवस्थित करने का प्रयास किया गया है। इस प्रक्रिया की जड़ें प्रागैतिहासिक काल से जुड़ी हैं जब श्रम के लैंगिक विभाजन के स्वाभाविक स्वरूप को औपचारिकता दी जा रही थी व विजातीय विवाह के नियम बनाए जा रहे थे। हालांकि पितृसत्ता पर अंतिम निर्णायक मोहर निजी संपत्ति के आने के पश्चात ही पड़ती है। जैसे-जैसे निजी संपत्ति समाज में गहरी जड़ें जमाता गया, वैसे वर्ग-विभेद विस्तृत हुआ एवं एक शक्तिशाली राज्य भी निर्मित हुआ। और इसी प्रक्रिया के साथ पितृसत्ता समाज में क्रमशः अधिक ठोस और स्थायी होटी चली गई। यह सब पितृसत्ता के भौतिक आधार हैं। धर्म, संस्कृति, शिक्षा, कानून, प्रशासन एवं अन्य वैचारिक तत्व इसी आधार पर निर्मित अधिरचना के अंग हैं। पितृसत्ता के अंत के लिए इस भौतिक आधार को ध्वस्त करना अनिवार्य है। इस दिशा में सबसे पहला आवश्यक कदम होगा निजी संपत्ति का उन्मूलन।

एक समाजवादी क्रान्ति, अतः, एकमात्र उत्तर है। एक समाजवादी सामाजिक-आर्थिक संरचना, जहां दोनों प्रकार के उत्पादन – श्रम व परिवार – का सामाजीकरण हो , वही स्त्री मुक्ति का अंतिम रास्ता है। हमें एक शोषण रहित समाजवादी उत्पादन व्यवस्था तो चाहिए ही, साथ यह भी आवश्यक है कि परिवार के निजी क्षेत्र की ज़िम्मेदारी व्यापक समाज ले ले। इसी नए भौतिक आधार पर ही पूर्व अधिरचा के अवशेषों के खिलाफ जंग छेड़कर नयी अधिरचना का निर्माण किया जा सकता है – एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण जो वास्तविक स्त्री-पुरुष समानता आधारित दुनिया का वायदा करती हो।

ऐसी समान दुनिया दिखने में कैसी होगी? मार्क्स और एंगेल्स हमें ज्यादा नहीं बताते। उनका मानना था कि वे “भविष्य के रसोइयों के लिए पाक विधियाँ” नहीं लिख रहे। मार्क्स के अनुसार समाजवादी समाज कोई स्थिर आदर्श नहीं जिसके अनुसार वर्तमान को निर्मित करना होगा, बल्कि वह एक वास्तविक आंदोलन होगा जो “वर्तमान परिस्थितियों” का उन्मूलन करेगा।

इस “वर्तमान परिस्थिति” का विश्लेषण मार्क्स और एंगेल्स द्वारा अपनी रचनाओं में बखूबी किया गया है जिससे प्रेरणा लेकर मार्क्सवादी नारीवादी लेखिकाओं ने घरेलू श्रम की आर्थिक राजनीति को समझने का प्रयास किया है। पूंजीवाद पर मार्क्स के वृहत लेखन के आधार पर मार्क्सवादी विद्वानों ने घरेलू श्रम एवं वैतनिक श्रम व जिंस उत्पादन की पूंजीवादी दुनिया के बीच संबंध स्थापित किया है। माग्रेट बेंस्टन (Margaret Benston) बताती हैं कि विनिमय योग्य उत्पाद से चालित एक सामाजिक व्यवस्था में स्त्री का घरेलू श्रम उपयोग मूल्य तो पैदा करता है, परंतु विनिमय मूल्य पैदा करने में नाकाम होता है। इसलिए उत्पादन प्रक्रिया में उसकी गणना ही नहीं हो पाती। रोज़ा लक्ज़मबर्ग (Rosa Luxemburg) इस विसंगति को बखूबी व्यक्त करती हैं :

वही काम उत्पादक है जो अधिशेष मूल्य व पूंजीपति के लिए मुनाफा पैदा करता है। इस लिहाज से कैफे (café) की नर्तकी एक श्रमिक स्त्री से अधिक उत्पादक है, जबकि महिलाओं व सर्वहारा की माताओं का परिश्रम जो घर की चहारदीवारी के भीतर होता है, उसे अनुत्पादक मान लिया जाता है। यह सुनने में अशिष्ट व सनकी लगता है पर यही पूंजीवादी व्यवस्था की अशिष्टता व सनक की वास्तविक अभिव्यक्ति है। ”       

पूंजीवाद के इसी बेतुकपन को बेन्स्टन महिलाओं के निम्न स्तर का आधार मानती है। महिलाओं के श्रम का अवमूल्यन पूंजीवाद के नियमों की कारीगरी है, पर यहाँ यह रेखांकित किया जाना चाहिए कि एकाकी परिवार, जिसमें पुरुष वैतनिक श्रमिक तथा स्त्री घरेलू हो, पूंजीवाद को एक व्यवस्था के रूप में संपोषित करता है। महिलाओं के हर दिन के श्रम जिसका कोई भुगतान नहीं किया जाता है और जो पुरुष कामगार को रोज़ के श्रम के लिए पोषित और तैयार करता है, असल में पूंजीपति के लाभ का एक आवश्यक हिस्सा है। बेंस्टन समझाती है – “महिलाओं को उनके श्रम के लिए भुगतान, चाहे वह निम्नतम स्तर पर भी किया जाए, धन का बड़ी मात्रा में पुनर्वितरण करेगा। वर्तमान में परिवार का सहयोग वैतनिक कामगार पर एक छिपा हुआ कर है – उसका वेतन दो व्यक्तियों की श्रम शक्ति को खरीदता है”। इसके अलावा, वर्तमान ढांचे में महिला जो एक प्राकृतिक ज़िम्मेदारी के तहत बच्चे पैदा करती है एवं उसे पालती है, दरअसल पूंजीवाद के लिए मुफ्त में भविष्य के श्रमिकों की फौज तैयार करती है। इस तरह मार्क्स की वह अवधारणा जिसमें पूंजीपति द्वारा श्रमिक के अधिशेष श्रम की जब्ती होती है, उस में स्त्रियों का घरेलू श्रम छिपा होता है। ऐसा स्त्रियों के पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था में स्वयं वैतनिक श्रमिक बन कर काम करने से बदल नहीं जाता। बल्कि वैसी परिस्थितियों में उसके श्रम की दोगुनी जब्ती होती है।

मार्क्स के अनुसार ‘वर्तमान भौतिक परिस्थिति’ यानी पूंजीवादी व्यवस्था जिसके टिके रहने के लिए स्त्रियों का घरेलू कार्य एक अनिवार्य शर्त है, में स्त्री मुक्ति की कुंजी इस व्यवस्था के पूर्णरूपेण उलमूलन में है। तब सवाल यह बनता है कि पूंजीवाद के भीतर जो स्त्रियों के लिए सकारात्मक माहौल बन पाया है उसका क्या? पूंजीवादी व्यवस्था न केवल स्त्रियों को रोजगार देकर उन्हें आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाटी है बल्कि घरेलू कार्यों में आधुनिक मशीनों का उपयोग तथा अन्य सहयोगी संस्थाएं जैसे शिशु पालन केंद्र, बच्चा देखभाल की संस्थाओं, नर्सों इत्यादि के माध्यम से स्त्रियों के घरेलू कार्यों के बोझ को कम भी करती है, उनका क्या? स्त्री मुक्ति में पूंजीवाद की इस भूमिका को नजरअंदाज नहीं क्या जा सकता है। लेकिन जहां तक पूंजीवादी व्यवस्था में स्त्रियों के रोजगार का सवाल है उसे मार्क्स ने बखूबी समझाया है कि किस तरह रोजगार में स्त्रियों की भागीदारी से ज्यादा मजदूरों की आपूर्ति होने के कारण श्रम का बाज़ार मूल्य घट जाता है, तथा किस तरह स्त्रियों तथा बच्चों का अत्यंत सस्ता श्रम अतिरिक्त मूल्य को बढ़ाने में सहायक होता है। इसका निष्कर्ष यह हुआ कि चाहे घरेलू कार्य हो या ‘उत्पादक’ वेतनप्राप्त श्रम, दोनों ही परिस्थिति में स्त्रियां पूंजीवाद के हितों को ही फायदा पहुंचाती हैं। दूसरे, इस बात को भी समझा जाना चाहिए कि पूंजीवाद केवल उन स्त्रियों को ही घरेलू कार्यों से मुक्ति दिलाता है जो इसके बदले भुगतान की क्षमता रखती हैं। यह सर्वविदित है कि कुल जनसंख्या का कितना प्रतिशत ऐसा कर पाने में सक्षम है। आगे हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भुगतान करके देखभाल की यह सुविधा मध्य तथा उच्च वर्ग की महिलाओं को जिनके कारण मिल पाती है वे सेवा देने वाली सर्वहारा वर्ग की महिलाएं खुद इस सेवा से वंचित ही रह जाती हैं। इस पूरी प्रक्रिया के मूल में शोषण आधारित वर्ग-विभाजन है। इस कारण पूंजीवाद में नारी मुक्ति की बात केवल हवा हवाई ही है जिसका वास्तविक जमीनी सच्चाई से कोई लेना देना नहीं। आगे इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि यह व्यवस्था महिलाओं के बीच जबर्दस्त आर्थिक विभाजन पैदा करता है, जिसमें मुट्ठीभर स्त्रियों की सुविधा के लिए स्त्रियों के बड़े समुदाय को जितना मिलना चाहिए उससे कम मजदूरी पर काम करना पड़ता है। यह आर्थिक विभाजन स्त्री मुक्ति आंदोलन के कवच में एक सूराख के समान है तथा इसका दुखद पहलू यह है कि मुख्यधारा की अधिकांश नारीवादी स्त्रियाँ इसकी अनदेखी करती हैं। ऐसी परिस्थिति में सम्पूर्ण स्त्री समुदाय की मुक्ति की बात तथा उनके अधिकारों की लड़ाई काल्पनिक बनकर रह जाती है। इस कारण “वर्तमान परिस्थिति” तथा निजी संपत्ति पूर्ण रूप से खत्म होनी चाहिए।

समाजवाद जिसमें उत्पादन प्रक्रिया तथा घरेलू कार्य दोनों ही सामाजिक हो जाते हैं सही अर्थों में नारी मुक्ति का आधार है। नारी मुक्ति पूंजीवाद के पूर्ण विनाश पर ही सम्भव है। यहां यह भी रेखांकित किया जाना चाहिए कि पूंजीवाद खुद ही समाजवाद के निर्माण का आधार पैदा करता है – सामाजिक उत्पादन व्यवस्था जिसमें औरतें स्वतः बराबरी के स्तर पर आ चुकी होती हैं और ऐसी संस्थाएं जो स्त्रियों को घरेलू कार्यों से मुक्ति देती हैं। परन्तु पूंजीवाद खुद अपने अन्तरविरोधों के कारण न तो सभी स्त्रियों को उत्पादन प्रक्रिया में शामिल कर पाता है और न ही घरेलू सहायक संस्थाओं का सामाजीकीकरण कर पाता है। पूंजीवाद के इस अधूरे कार्य को केवल समाजवाद में ही पूरा किया जा सकता है। अगस्त बेबेल ने सही ही लिखा है कि “बुर्जुआ व्यवस्था केवल सिद्धांतों का प्रतिपादन कर सकती है… क्योंकि इसका व्यवहार में प्रयोग इसका विरोधाभास बन जाता है। सिद्धान्त तथा व्यवहार में सामंजस्य केवल समाजवाद में ही सम्भव है”।

समाजवाद काम के अधिकार को मौलिक अधिकार मानता है – शारीरिक रूप से सक्षम हर मनुष्य बिना लैंगिक भेदभाव के काम पा सकता है और अपने श्रम के आधार पर मेहनताना पा सकता है। मौलिक अधिकार के रूप में यह सैद्धान्तिक तौर पर प्रत्येक सक्षम शरीर वाली महिला को उत्पादन प्रक्रिया के दायरे में ले आता है। आगे समाजवाद में जरूरत होगी लंबे समय तक उत्पादन की अधिकता को बनाये रखना ताकि समाज की हर जरुरत की चीज अधिकता में उपलब्ध हो जिससे समाजवाद से साम्यवाद की ओर प्रस्थान किया जा सके। समाजवाद में उत्पादन की अधिकता ही वह आवश्यक भौतिक आधार पैदा करती है जिससे स्त्रियों के समूचे समुदाय को उत्पादन प्रक्रिया में शामिल किया जा सके। स्त्रियों के स्वावलंबन (सैद्धांतिक और व्यवहारिक, दोनों ही) पर इस बात का क्या प्रभाव पड़ेगा इसे भलीभांति समझा जा सकता है। तब वह पुरुषों की निजी संपत्ति और पराश्रित उपभोक्ता नहीं रह जाएगी। यह भौतिक आधार कालांतर में स्त्रियों के प्रति समाज की सोच में क्रांतिकारी बदलाव पैदा करेगा। हालांकि यह नारी मुक्ति के मार्ग में आवश्यक शर्तों में से केवल एक है, दूसरी महत्वपूर्ण शर्त है – समूचे घरेलू वातावरण का समाजीकीकरण। बेंस्टन काफी स्पष्ट लिखती हैं – “घर के बाहर नौकरियों में हिस्सेदारी नारी मुक्ति के लिए एक महत्वपूर्ण आवश्यक शर्त है लेकिन यह अकेले अपने आप में स्त्री को बराबरी का अधिकार देने में सक्षम नहीं है। जबतक घरेलू कार्य महिलाओं की अकेले की जिम्मेदारी रहेंगे तब तक उस पर काम का दोहरा बोझ बना रहेगा। नारी मुक्ति की दूसरी आवश्यक शर्त है कि ऊपर दिए गए व्यवस्था के साथ साथ वर्तमान में घरों के भीतर किये जानेवाले कार्यों को सामूहिक अर्थव्यवस्था के ढांचे में लाया जाए.”

घरेलू कार्य की दुरूहता को सभी प्रारंभिक मार्क्सवादियों ने उल्लिखित किया है – जिसमें एंगेल्स, अगस्त बेबेल, एलिनोर मार्क्स तथा लेनिन शामिल है. अगस्त बेबेल (August Bebel) संभवतः पहले मार्क्सवादी हैं जिन्होंने नारी मुद्दे को केंद्र में रख कर विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया है। उन्होंने न केवल घरेलू कार्यों की कठिनाईयों और दुरूहता के बारे में लिखा है, बल्कि रसोईघर की चर्चा करते हुए उसके प्राक-पूंजीवादी चरित्र पर टिप्पणी कर, उसकी अक्षमता और अवैज्ञानिकता के अभाव पर प्रकाश डाला है। वे कहते हैं, “छोटे रसोईघर कुशल कारीगर के वर्कशॉप की तरह हैं जिसमें समय और संसाधनों की बेवजह बर्बादी होती है”। वे सामूहिक सामाजिक रसोईघरों की वकालत करते हैं जो वैज्ञानिक आधार पर आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित होकर काम करेगी।

लेनिन महिलाओं की दुर्व्यवस्था की काफी चुभती हुई व्याख्या करते हैं :

हर तरह के कानून, जो स्त्री मुक्ति और समानता की बात करते हैं, के बावजूद औरतों की स्थिति घरेलू दास की तरह है। छोटे-छोटे घरेलू क्रिया कलाप उनका दमन करते हैं, उनका गला दबाकर उन्हें ऐसे निम्न स्तर पर पटक देते हैं जहां उनका जीवन रसोई, बच्चों के पालन पोषण में बंधकर रह जाता है। जहां उनका पूरा जीवन बर्बर अनुत्पादक हाड़तोड़ श्रम में उलझकर रह जाता है। स्त्रियों की वास्तविक मुक्ति तभी सम्भव है जब इस पर चौतरफा (सर्वहारा शक्ति वाली राज्यसत्ता के नेतृत्व में) संघर्ष हो, जिसमें इन छोटे-छोटे घरेलू कार्यों वाली व्यवस्था को बदलकर वृहत स्तर पर समाजवादी अर्थव्यवस्था शुरू की जाए।

सोवियत रूस ने व्यक्तिगत से सामाजिक उत्पादन की इस प्रक्रिया में बदलाव के लिए कई ठोस कदम उठाये – सामूहिक  रसोईघर, सामाजिक खाद्य केंद्र, वस्त्र धुलाई मरम्मत केंद्र, नर्सरी, शिशु क्रीड़ा केंद्र, बल गृह, शिक्षण संस्थाएं, मनोरंजन क्लब, मातृगृह इत्यादि। इस प्रकार बच्चों का पालन पोषण, उनकी देखभाल, खाना पकाना, साफ सफाई, बुजुर्ग तथा अशक्तों की देखभाल, इत्यादि, जो पूर्व में पूर्ण रूप से महिलाओं की जिम्मेदारी थे, समाजवाद में सामूहिक दायित्व बन गए। यहां तक कि बच्चों को जन्म देने व अन्य संबन्धित मातृत्व की जरूरतें समाजवाद में समाज के दायित्व हो जाते हैं। यह व्यवस्था समाज की सबसे वैज्ञानिक व्यवस्था है, जिसमें समाज का प्रत्येक सदस्य, स्त्री-पुरुष, पूरी तरह मुक्त होकर समूचे मानवजाति के विकास में अपना योगदान दे पाता है। व्यक्ति का हित सामाजिक हित बन जाता है। इस तरह से निजी सम्पत्ति द्वारा व्यक्तिगत और सामूहिक हित के बीच जो आभासी अंतर पैदा कर दिया जाता है समाजवाद में वह धूल में मिल जाता है। यह सही अर्थों में उस दिशा में प्रस्थान है जिसकी बात “वर्तमान परिस्थिति” के उन्मूलन के संदर्भ में मार्क्स करते हैं।

जब स्त्री का घरेलू जीवन पूरी तरह से बदल जाए, निजी संपत्ति को पूरी तरह से खत्म कर दिया जाए और स्त्रियां समाज की आर्थिक तथा सामाजिक उन्नति की सजग स्वतंत्र भागीदार बन जाएं तब घरेलू जीवन, स्त्री पुरुष का सम्बन्ध सिर्फ दो व्यक्तियों का व्यक्तिगत मामला रह जाता है। तब हम वापस उसी बिंदु पर पहुंच जाते हैं जहां से शुरुआत हुई थी – स्त्री और पुरुष सामाजिक आर्थिक जीवन में एक दूसरे के पूरक हो जाते हैं। यह उस समाज की वापसी का समय होगा जिसमें स्त्री के प्रजनन दायित्व को सामाजिक महत्व मिलेगा, जिसमें स्त्री प्रजनन पुरुषों के लिए उत्तराधिकारी बनाने के लिए नहीं करेगी बल्कि सामाजिक जरूरत के लिए यानि समाज की निरन्तरता और उसके विकास के लिए करेगी। यह वापसी हालांकि एक दुर्लभ तथा उच्च स्तर पर होगी, क्योंकि समाज प्रगति कर एक विकसित चरण पर पहुँच चुका होगा। हम यहां बेबेल की निम्नलिखित पंक्तियों के साथ अपनी बात खत्म कर सकते :

समाज वह फिर से प्राप्त कर लेता है जो कभी उसका था, लेकिन नव-निर्मित उत्पादन की परिस्थितियों के अनुसार वह पूरे जीवन-पद्धत्ति को संस्कृति के सबसे उच्च चरण पर रख देता है। यह सभी को वह आनंद लेने के लिए सक्षम बनाता है, जो कभी कुछ व्यक्तियों या कुछ वर्गों का विशेषाधिकार हुआ करता था।