फासीवाद के खिलाफ लड़ाई पर फिर एक बार चर्चा 

[14-15 दिसंबर 2024 को दिल्ली में ‘रेडिकल वामपंथी ताकतों की अखिल भारतीय परामर्श बैठक’ हेतु अंग्रेजी पेपर का अनुवाद] पी आर सी, सीपीआई (एमएल) 1. फासीवाद की परिभाषा और वर्ग चरित्र जब फासीवाद सत्ता में होता है, तो यह वित्तीय पूंजी के सबसे प्रतिक्रियावादी, सबसे अंधराष्ट्रवादी और सबसे साम्राज्यवादी तत्वों की खुली आतंकवादी तानाशाही होता…

Read More

खस्ताहाल मध्य वर्ग और उसकी गिरती आय की स्वीकारोक्ति

 संपादकीय | सर्वहारा #71-73 (1 मार्च – 15 अप्रैल 2025) इस संबंध में देश के प्रतिष्ठित अखबारों (जैसे कि इकोनॉमिक टाइम्स और फाइनेंशियल टाइम्स) में छपी पूंजीवादी थिंक-टैंक के एक सदस्य सौरभ मुखर्जी (मार्सेलस इनवेस्टमेंट मैनेजर्स के संस्थापक और मुख्य निवेश अधिकारी) की रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत के मध्य वर्ग1 की आर्थिक स्थिति…

Read More

डॉ अंबेदकर, दलितवाद और जाति प्रश्न

इतिहास और वर्तमान का मूल्यांकन करते हुए सामाजिक संघर्ष खासकर जाति-उन्मूलन के मोर्चे पर हमारे कार्यभार (यथार्थ के मार्च 2023 अंक से) चार भागों में– I प्रस्तावना II डॉ अंबेदकर की वैचारिकी एवं उस पर आधारित दलितवाद की सीमा III अंग्रेजों के जाने के बाद बने भारतीय पूंजीवादी राज्य के आईने में क्रांतिकारी दलित उभार की…

Read More

फासीवादी दौर में महिलाओं पर बढ़ता उत्पीड़न और महिला मुक्ति का प्रश्न

30 दिसंबर 2024 को आसनसोल बार एसोसिएशन हॉल, पश्चिम बर्धमान, पश्चिम बंगाल में कॉमरेड सुनील पाल की 15वीं शहादत वर्षगांठ के अवसर पर पीआरसी, सीपीआई (एमएल) तथा इफ्टू (सर्वहारा) द्वारा उपर्युक्त विषय पर आयोजित केंद्रीय कन्वेंशन में पेश आधार पत्र।  मूल दस्तावेज़ अंग्रेजी में है जिसका यह हिंदी में अनुवादित संस्करण है। भूमिका हाल के…

Read More

भारत में फासीवाद पर बहस

फासीवाद के विरुद्ध वैचारिक–राजनीतिक एकता एवं व्यवहारिक एकजुटता कायम करें! (जनचेतना यात्रा के बिहार चैप्टर द्वारा जारी पर्चे को संदर्भ में लेते हुए एक त्वरित टिप्पणी) पीआरसीसीपीआई (एमएल) जन चेतना यात्रा के बिहार चैप्टर द्वारा जारी पर्चे में यह बिल्कुल सही बात कही गई है कि आज हमारे देश भारत की पुरानी शक्ल-सूरत कहीं दिखाई…

Read More

अक्‍टूबर क्रांति और इस रास्‍ते पर चलने की जरूरत के बारे में चंद बातें

संपादकीय, सर्वहारा, 30 अक्टूबर 2025 अक्‍टूबर क्रांति – मजदूर-मेहनतकश वर्ग की समाजवादी क्रांति – 25 अक्‍टूबर 1917 को शुरू हुई और अगले दिन यानी 26 अक्‍टूबर की शाम तक संपन्‍न भी हो गई थी। मजदूर-मेहनतकश वर्ग ने पूंजीपति वर्ग की सत्ता उलट दी थी और लेनिन द्वारा निर्मित बोल्‍शेविक पार्टी के नेतृत्‍व में सत्ता अपने…

Read More

“जाति व्यवस्था, जाति विचारधारा और जाति उत्पीड़न के विरुद्ध सर्वहारा रणनीति” 

वर्ग एकता के अंदर भी जाति-विरोधी और जातीय मानसिकता-विरोधी संघर्ष की जरूरत है ताकि वर्ग-संघर्ष जाति के भेदभाव और जाति की मानसिकता से दूषित न हो। इसे असली वर्ग एकता की अग्नि परीक्षा होना चाहिए। असली चुनौती – और इस कन्वेंशन का असली उद्देश्‍य व काम – आंदोलन के अंदर और बाहर, सिद्धांत रूप में और रोजाना व्यवहार में, जाति-विरोधी और वर्ग-विरोधी संघर्ष का  परस्पर संलयन कैसे हो, यही है।

Read More

घुसपैठिया का सवाल और आज के दौर में मजदूर वर्ग के प्रवास की समस्‍यायें और चुनौतियां

काम और रोजी-रोटी के लिए देश और दुनिया के हर कोने में आवागमन की आजादी की मांग एक ऐसी मजदूर पक्षीय मांग है जो सभी क्षेत्रों व देशों के मजदूरों की, स्‍थानीय और प्रवासी दोनों तरह के मजदूरों की एक साझा मांग है, और आज जबकि घुसपैठिया का सवाल उठाकर व उनका अमानवीय दमन और उत्‍पीड़न करके उनका और भी अमानुषिक शोषण की तैयारी चल रही है, वैसी परिस्थिति में इस साझी मांग के लिए एकताबद्ध संघर्ष करना एक अहम आवश्‍यकता बन चुका है। साथ ही, इसके लिए भी संघर्ष करना और मांग उठाना जरूरी है कि न्‍यूनतम मजदूरी के नीचे वेतन/मजदूरी पूंजीपति नहीं दे।न्‍यूनतम मजदूरी से नीचे जाकर काम न करने की मांग भी हमारी, स्‍थानीय एवं प्रवासी मजदूरों की, एक साझा मांग है। इसी तरह न्‍यूनतम जनवादी अधिकार की मांग, जैसे मालिकों के मनमाने व्‍यवहार और लूट का विरोध करने, तथा यूनियन बनाने के अधिकार की मांग भी एक साझा मांग बनती है जिसके लिए स्‍थानीय और प्रवासी मजदूरों को मिलकर लड़ना आवश्‍यक है।

Read More

गिरती आर्थिक वृद्धि व लाभ दर से तीव्र होते अंतर्विरोध फासीवादी तानाशाही को नग्न रूप लेने की ओर बढ़ा रहे हैं

संपादकीय, दिसंबर 2024 पूंजी का मानवद्रोही चरित्र ही ऐसा है कि उसका संकट उसे हमेशा ही ध्वंसात्मक दिशा में ले जाता है क्योंकि यह विनाश ही उसके लिए एक तात्कालिक राहत लाता है। कोविड के नाम पर निर्मम लॉकडाउन पूंजी के लिए ऐसी ही एक तात्कालिक राहत थी जब आर्थिक गतिविधियों के बंद होने से…

Read More

भाजपा को हराना जरूरी है, 

लेकिन क्रांतिकारी जन-उभार की सरकार ही फासीवाद का अंत कर सकती है  संपादकीय, अप्रैल 2024 पूरे देश में चुनाव की सरगर्मियां शबाब पर हैं। जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ रहा है, देश के राजनीतिक हालात तेजी से बदल रहे हैं। हम देख सकते हैं कि जैसे ही चुनाव ने जन-सरोकार के मुद्दों के इर्द-गिर्द घुमना शुरू…

Read More
Share on Social Media