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फासीवाद और मजदूर वर्ग का दायित्व

(मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (MASA), दिल्ली द्वारा 12 अक्टूबर 2025 को ‘बढ़ता फासीवादी खतरा और मजदूर वर्ग‘ विषय पर अम्बेडकर भवन, दिल्ली में आयोजित कन्वेंशन में आईएफटीयू–सर्वहारा का वक्तव्य) I   मजदूर अक्सर पूछते हैं, फासीवाद क्या है? फासीवाद के बारे में सबसे पहली बात तो यही है कि यह पूंजीपति वर्ग की तानाशाही का…

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भारत में फासीवाद पर बहस

फासीवाद के विरुद्ध वैचारिक–राजनीतिक एकता एवं व्यवहारिक एकजुटता कायम करें! (जनचेतना यात्रा के बिहार चैप्टर द्वारा जारी पर्चे को संदर्भ में लेते हुए एक त्वरित टिप्पणी) पीआरसीसीपीआई (एमएल) जन चेतना यात्रा के बिहार चैप्टर द्वारा जारी पर्चे में यह बिल्कुल सही बात कही गई है कि आज हमारे देश भारत की पुरानी शक्ल-सूरत कहीं दिखाई…

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घुसपैठिया का सवाल और आज के दौर में मजदूर वर्ग के प्रवास की समस्‍यायें और चुनौतियां

काम और रोजी-रोटी के लिए देश और दुनिया के हर कोने में आवागमन की आजादी की मांग एक ऐसी मजदूर पक्षीय मांग है जो सभी क्षेत्रों व देशों के मजदूरों की, स्‍थानीय और प्रवासी दोनों तरह के मजदूरों की एक साझा मांग है, और आज जबकि घुसपैठिया का सवाल उठाकर व उनका अमानवीय दमन और उत्‍पीड़न करके उनका और भी अमानुषिक शोषण की तैयारी चल रही है, वैसी परिस्थिति में इस साझी मांग के लिए एकताबद्ध संघर्ष करना एक अहम आवश्‍यकता बन चुका है। साथ ही, इसके लिए भी संघर्ष करना और मांग उठाना जरूरी है कि न्‍यूनतम मजदूरी के नीचे वेतन/मजदूरी पूंजीपति नहीं दे।न्‍यूनतम मजदूरी से नीचे जाकर काम न करने की मांग भी हमारी, स्‍थानीय एवं प्रवासी मजदूरों की, एक साझा मांग है। इसी तरह न्‍यूनतम जनवादी अधिकार की मांग, जैसे मालिकों के मनमाने व्‍यवहार और लूट का विरोध करने, तथा यूनियन बनाने के अधिकार की मांग भी एक साझा मांग बनती है जिसके लिए स्‍थानीय और प्रवासी मजदूरों को मिलकर लड़ना आवश्‍यक है।

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डॉ अंबेदकर, दलितवाद और जाति प्रश्न

इतिहास और वर्तमान का मूल्यांकन करते हुए सामाजिक संघर्ष खासकर जाति-उन्मूलन के मोर्चे पर हमारे कार्यभार (यथार्थ के मार्च 2023 अंक से) चार भागों में– I प्रस्तावना II डॉ अंबेदकर की वैचारिकी एवं उस पर आधारित दलितवाद की सीमा III अंग्रेजों के जाने के बाद बने भारतीय पूंजीवादी राज्य के आईने में क्रांतिकारी दलित उभार की…

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नई आर्थिक नीतियों के बारे में एक बार फिर से

 अजय सिन्हा | ‘यथार्थ’ पत्रिका (जनवरी-मार्च 2025) आम तौर पर 1991 में नरसिम्हा राव की सरकार के दौर की आर्थिक नीतियों पर चर्चा होती है, तो प्राय: तत्कालीन भारतीय अर्थव्यवस्था के वास्तविक कार्यचालन (actual working) को उजागर करने पर हमारा ध्यान न के बराबर होता है। ध्यान महज नीतियों के अच्छे या बुरे होने पर…

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बड़ी पूंजी (कॉरपोरेटों) के हक में आनन-फानन में किये जा रहे बिहार भूमि सर्वेक्षण पर रोक लगाओ!

भूमिहीनों, गरीबों को उजाड़ना बंद करो; भूमि पर उनका दावा बहाल करो! (बिहार में जारी वर्तमान भूमि सर्वेक्षण पर जन अभियान, बिहार द्वारा गांधी संग्रहालय, पटना में 9 जनवरी 2025 को आयोजित कन्वेंशन में पेश प्रपत्र।)  जन अभियान, बिहार बिहार में चल रहे (बढ़ी हुई समय अवधि के साथ) भूमि सर्वे में अफरातफरी की स्थिति…

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सड़ता बीमार पूंजीवाद बोलने की जरा भी आजादी को सहन करने को कतई तैयार नहीं

 मुकेश असीम | सर्वहारा #71-73 (1 मार्च – 15 अप्रैल 2025) पूंजीवादी व्यवस्था का दावा रहा है कि उसने जनतंत्र कायम किया और सभी को अभिव्यक्ति का जनतांत्रिक अधिकार दिया है, हालांकि सच्चाई यह है कि पूंजीवाद में हर अधिकार वास्तव में सम्पत्तिशालियों के लिए ही होता है। संपत्तिहीन मजदूर मेहनतकश इन अधिकारों का प्रयोग…

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भाजपा को हराना जरूरी है, 

लेकिन क्रांतिकारी जन-उभार की सरकार ही फासीवाद का अंत कर सकती है  संपादकीय, अप्रैल 2024 पूरे देश में चुनाव की सरगर्मियां शबाब पर हैं। जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ रहा है, देश के राजनीतिक हालात तेजी से बदल रहे हैं। हम देख सकते हैं कि जैसे ही चुनाव ने जन-सरोकार के मुद्दों के इर्द-गिर्द घुमना शुरू…

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संविधान बदलाव की कोशिश – अधमरे बुर्जुआ जनवाद को फासीवादी ताबूत में दफनाने की तैयारी

मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था, संसद, सुप्रीम कोर्ट, आदि की रक्षा का सीमित नारा भारत में फासीवाद से लड़ने का आधार न तो बन पा रहा है, न ही बन सकता है, क्योंकि पूंजीपति वर्ग शासन के संचालन हेतु बनी व्यवस्था उसके आर्थिक संकट से घिर जाने पर सड़कर आने वाले फासीवाद का औजार बननी स्वाभाविक व निश्चित है। फासीवाद के वास्तविक विरोध के लिए शोषणमुक्त व हर किस्म के उत्पीड़न व भेदभाव से रहित, असली समानता आधारित समाज का एक नया खाका प्रस्तुत करना ही होगा।

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बिहार चुनाव परिणाम 

जोड़-तोड़ व धर्म-जाति के चुनावी समीकरणों की राजनीति से नहीं, मजदूरों मेहनतकशों उत्पीड़ित जनता की मुक्तिकामी राजनीति से ही फासीवाद की पराजय मुमकिन संपादकीय, सर्वहारा, 1-30 नवंबर बिहार चुनाव परिणामों में बीजेपी की बड़ी जीत से उन्हें भारी धक्का लगा है, जो इस चुनाव में विपक्षी महागठबंधन की ‘तय विजय’ के भरोसे फासीवादी बीजेपी को…

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