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फासीवाद और मजदूर वर्ग का दायित्व

(मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (MASA), दिल्ली द्वारा 12 अक्टूबर 2025 को ‘बढ़ता फासीवादी खतरा और मजदूर वर्ग‘ विषय पर अम्बेडकर भवन, दिल्ली में आयोजित कन्वेंशन में आईएफटीयू–सर्वहारा का वक्तव्य) I   मजदूर अक्सर पूछते हैं, फासीवाद क्या है? फासीवाद के बारे में सबसे पहली बात तो यही है कि यह पूंजीपति वर्ग की तानाशाही का…

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भाजपा को हराना जरूरी है, 

लेकिन क्रांतिकारी जन-उभार की सरकार ही फासीवाद का अंत कर सकती है  संपादकीय, अप्रैल 2024 पूरे देश में चुनाव की सरगर्मियां शबाब पर हैं। जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ रहा है, देश के राजनीतिक हालात तेजी से बदल रहे हैं। हम देख सकते हैं कि जैसे ही चुनाव ने जन-सरोकार के मुद्दों के इर्द-गिर्द घुमना शुरू…

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फासीवाद के खिलाफ लड़ाई पर फिर एक बार चर्चा 

[14-15 दिसंबर 2024 को दिल्ली में ‘रेडिकल वामपंथी ताकतों की अखिल भारतीय परामर्श बैठक’ हेतु अंग्रेजी पेपर का अनुवाद] पी आर सी, सीपीआई (एमएल) 1. फासीवाद की परिभाषा और वर्ग चरित्र जब फासीवाद सत्ता में होता है, तो यह वित्तीय पूंजी के सबसे प्रतिक्रियावादी, सबसे अंधराष्ट्रवादी और सबसे साम्राज्यवादी तत्वों की खुली आतंकवादी तानाशाही होता…

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गिरती आर्थिक वृद्धि व लाभ दर से तीव्र होते अंतर्विरोध फासीवादी तानाशाही को नग्न रूप लेने की ओर बढ़ा रहे हैं

संपादकीय, दिसंबर 2024 पूंजी का मानवद्रोही चरित्र ही ऐसा है कि उसका संकट उसे हमेशा ही ध्वंसात्मक दिशा में ले जाता है क्योंकि यह विनाश ही उसके लिए एक तात्कालिक राहत लाता है। कोविड के नाम पर निर्मम लॉकडाउन पूंजी के लिए ऐसी ही एक तात्कालिक राहत थी जब आर्थिक गतिविधियों के बंद होने से…

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बिहार चुनाव परिणाम 

जोड़-तोड़ व धर्म-जाति के चुनावी समीकरणों की राजनीति से नहीं, मजदूरों मेहनतकशों उत्पीड़ित जनता की मुक्तिकामी राजनीति से ही फासीवाद की पराजय मुमकिन संपादकीय, सर्वहारा, 1-30 नवंबर बिहार चुनाव परिणामों में बीजेपी की बड़ी जीत से उन्हें भारी धक्का लगा है, जो इस चुनाव में विपक्षी महागठबंधन की ‘तय विजय’ के भरोसे फासीवादी बीजेपी को…

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मजदूर-मेहनतकश वर्ग से आह्वान

फासीवाद के खतरे को पहचानें और इसके खिलाफ कमर कसने की तैयारी करें!   आईएफटीयू (सर्वहारा) मजदूर-मेहनतकश साथियो!  फासीवाद क्या है? फासीवाद सांप्रदायिक नफरत, नस्लीय घृणा और उग्र राष्ट्रवाद पर आधारित एक घोर प्रतिक्रियावादी राजनीतिक मुहिम व आंदोलन का नाम है। फासीवादी तानाशाही क्या है? जब फासीवाद सतारूढ़ हो जाता है, तब फासीवादी तानाशाही का…

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“जाति व्यवस्था, जाति विचारधारा और जाति उत्पीड़न के विरुद्ध सर्वहारा रणनीति” 

वर्ग एकता के अंदर भी जाति-विरोधी और जातीय मानसिकता-विरोधी संघर्ष की जरूरत है ताकि वर्ग-संघर्ष जाति के भेदभाव और जाति की मानसिकता से दूषित न हो। इसे असली वर्ग एकता की अग्नि परीक्षा होना चाहिए। असली चुनौती – और इस कन्वेंशन का असली उद्देश्‍य व काम – आंदोलन के अंदर और बाहर, सिद्धांत रूप में और रोजाना व्यवहार में, जाति-विरोधी और वर्ग-विरोधी संघर्ष का  परस्पर संलयन कैसे हो, यही है।

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डॉ अंबेदकर, दलितवाद और जाति प्रश्न

इतिहास और वर्तमान का मूल्यांकन करते हुए सामाजिक संघर्ष खासकर जाति-उन्मूलन के मोर्चे पर हमारे कार्यभार (यथार्थ के मार्च 2023 अंक से) चार भागों में– I प्रस्तावना II डॉ अंबेदकर की वैचारिकी एवं उस पर आधारित दलितवाद की सीमा III अंग्रेजों के जाने के बाद बने भारतीय पूंजीवादी राज्य के आईने में क्रांतिकारी दलित उभार की…

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संविधान बदलाव की कोशिश – अधमरे बुर्जुआ जनवाद को फासीवादी ताबूत में दफनाने की तैयारी

मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था, संसद, सुप्रीम कोर्ट, आदि की रक्षा का सीमित नारा भारत में फासीवाद से लड़ने का आधार न तो बन पा रहा है, न ही बन सकता है, क्योंकि पूंजीपति वर्ग शासन के संचालन हेतु बनी व्यवस्था उसके आर्थिक संकट से घिर जाने पर सड़कर आने वाले फासीवाद का औजार बननी स्वाभाविक व निश्चित है। फासीवाद के वास्तविक विरोध के लिए शोषणमुक्त व हर किस्म के उत्पीड़न व भेदभाव से रहित, असली समानता आधारित समाज का एक नया खाका प्रस्तुत करना ही होगा।

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घुसपैठिया का सवाल और आज के दौर में मजदूर वर्ग के प्रवास की समस्‍यायें और चुनौतियां

काम और रोजी-रोटी के लिए देश और दुनिया के हर कोने में आवागमन की आजादी की मांग एक ऐसी मजदूर पक्षीय मांग है जो सभी क्षेत्रों व देशों के मजदूरों की, स्‍थानीय और प्रवासी दोनों तरह के मजदूरों की एक साझा मांग है, और आज जबकि घुसपैठिया का सवाल उठाकर व उनका अमानवीय दमन और उत्‍पीड़न करके उनका और भी अमानुषिक शोषण की तैयारी चल रही है, वैसी परिस्थिति में इस साझी मांग के लिए एकताबद्ध संघर्ष करना एक अहम आवश्‍यकता बन चुका है। साथ ही, इसके लिए भी संघर्ष करना और मांग उठाना जरूरी है कि न्‍यूनतम मजदूरी के नीचे वेतन/मजदूरी पूंजीपति नहीं दे।न्‍यूनतम मजदूरी से नीचे जाकर काम न करने की मांग भी हमारी, स्‍थानीय एवं प्रवासी मजदूरों की, एक साझा मांग है। इसी तरह न्‍यूनतम जनवादी अधिकार की मांग, जैसे मालिकों के मनमाने व्‍यवहार और लूट का विरोध करने, तथा यूनियन बनाने के अधिकार की मांग भी एक साझा मांग बनती है जिसके लिए स्‍थानीय और प्रवासी मजदूरों को मिलकर लड़ना आवश्‍यक है।

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