(11 जनवरी 2026 को गांधी संग्रहालय में शहीद मजदूर नेता सुनील पाल की 16वीं शहादत वर्षगांठ के अवसर पर पी.आर.सी. सीपीआई(एमएल) द्वारा आयोजित एक दिवसीय सम्मेलन में पेश प्रपत्र)
साथियो!
मजदूर वर्ग के प्रवास की समस्या का मतलब उनके आप्रवास और उत्प्रवास से जुड़ी समस्या है। मान लीजिए, अगर मजदूर भारत छोड़कर किसी अरब देश में मजदूरी करने जाते हैं तो उनके अपने वतन की दृष्टि से यह उनका उत्प्रवास है। भारत के लिए ये उत्प्रवासी कहलाएंगे। दूसरी तरफ, अरब देश की दृष्टि से या वहां के लोगों की दृष्टि से ये आप्रवास है। वहां के लिए वे आप्रवासी कहलाएंगे। यानी, जो एक देश के सापेक्ष उत्प्रवास है, वही दूसरे देश के सापेक्ष आप्रवास है।
लेकिन यह ये महज आना–जाना नहीं है। यह एक शाब्दिक और सतही अंतर है। आप्रवास और उत्प्रवास में आधारभूत अंतर पूंजीवादी उत्पादन पद्धति या संबंध से जुड़ा है जो मार्क्सवादी दृष्टिकोण से प्रवास (migration) की समस्या को समझने का सबसे महत्वपूर्ण सूत्र है। इसलिए शाब्दिक अंतर से इसके अंतर्य में मौजूद अंतर को अलग करना चाहिए। सतही तौर पर, उत्प्रवास (emigration) किसी व्यक्ति या समूह का अपने मूल देश/क्षेत्र छोड़कर कहीं और जाना है। यानी, यह “निकास” (exit) की एक प्रक्रिया है। उदाहरण के लिए, एक बांग्लादेशी मजदूर का भारत आना बांग्लादेश के नजरिए से उत्प्रवास है। आप्रवास (Immigration) को लें। यह किसी व्यक्ति या समूह का नए देश/क्षेत्र में प्रवेश करना और वहां रोजी-रोजगार के लिए अस्थाई या स्थाई तौर पर बसना है। यह “प्रवेश” (entry) की एक प्रक्रिया है। ऊपर के उदाहरण में ही – भारत के नजरिए से यह आप्रवास है। इस तरह एक ही घटना को अलग-अलग देशों के नजरिये से देखने पर उसका नाम बदल जाता है। एक ही प्रक्रिया दो नामों से जानी जाती है – यह दोनों में सतही अंतर है। जबकि इसका वास्तविक और गहरा अर्थ मुनाफे पर आधारित पूंजीवादी उत्पादन संबंधों वाली पूंजीवादी उत्पादन पद्धति और इसकी राजनीति से इसके जुड़ाव में प्रकट होता है।दूसरे शब्दों में, प्रवास की समस्या और इसकी चुनौतियां पूंजीवादी शोषण की पूरी व्यवस्था से जुड़ा प्रश्न है। यहां यह जोड़ना जरूरी है कि मध्य और उच्च मध्य वर्ग के लोग भी और अधिक उन्नति के लिए, अच्छी और उच्चतर शिक्षा के लिए – कुलमिलाकर और अधिक संपन्नता से भरे भविष्य हेतु व्यक्तिगत विकास के नये अवसरों की तलाश करते हुए भी प्रवास करते हैं। उनमें से अधिकांश कानूनी तरीके अपनाते हैं। जबकि मजदूर वर्ग को अक्सर गैर-कानूनी तरीके अपनाने पड़ते हैं। कारण वही वर्ग का भेद है। संपन्न लोग बाजाप्ता वीजा और पासपोर्ट बनाकर जाते हैं, गरीब लोग ठेकेदारों के भरोसे या गैर-कानूनी तरीके से सीमा पार करते हैं। प्रवास के दौरान में मध्य वर्ग के लोग भी कभी-कभी मुनाफा की चक्की में पिसते हैं लेकिन फिलहाल यह वर्ग हमारे फोकस में नहीं है, जैसा कि हमारे प्रपत्र का शीर्षक में पहले से इंगित है।
पूंजीवाद में उत्पादन का आधार पूंजीपति वर्ग द्वारा मुनाफा कमाना है जो मजदूरों के अतिरिक्त श्रम (surplus value) के पूंजीवादी हस्तगतकरण से आता है। प्रवास – यानी लोगों का अपने घरों और मूल निवास स्थलों से उजड़कर अपने और अपने परिवार को भूख और अभाव से बचाने के लिए अपनी श्रमशक्ति को बेचने हेतु श्रमिकों का सुदूर मंडियों में आना या जाना – पूंजीवाद के विस्तार और इसके मुनाफे की प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा है। उत्प्रवास गरीब और अविकसित देशों/क्षेत्रों या अर्ध-उपनिवेशों व नव-उपनिवेशों, आदि से श्रम-शक्ति व हुनर और क्षमता की निकासी (drain) है। इस स्थिति में उनका बेशी श्रम किसी और क्षेत्र या देश के पूंजीपतियों के द्वारा हड़पा जाता है। दूसरी तरफ, आप्रवास विकसित पूंजीवादी देशों में उसी (उत्प्रवासित) सस्ते और असुरक्षित श्रम (क्योंकि उसे आसानी से लूटा और निचोड़ा जा सकता है) की आपूर्ति करता है। आप्रवासी मजदूरों का – दूसरे तरीके से कहें तो उत्प्रवासित मजदूरों का – बेशी श्रम दूसरे देश या क्षेत्र के पूंजीपतियों के मुनाफे को बढ़ाने के काम आता है। लेकिन बात इतनी ही नहीं है। मजदूरों का प्रवास पूंजीपति वर्ग को कई और तरीके से मदद पहुंचाता है। यह सही है कि आप्रवासी मजदूरों के कारण स्थानीय मजदूरों के वेतन, मजदूरी और उनके अधिकार दबते हैं। पूंजीपति और इसके गुर्गे इस बात को समझते हैं कि आप्रवासियों को काम पर रखना फायदेमंद है क्योंकि उनके असुरक्षित श्रम को लूटना स्थानीय मजदूरों के श्रम को लूटने की तुलना में आसान है, बशर्ते दोनों के बीच एकता न हो जाए, और इसलिए ही वे दोनों (स्थानीय और प्रवासी) को एक दूसरे के खिलाफ, खासकर स्थानीय को प्रवासियों के खिलाफ भड़काने की चाल चलते रहते हैं। जैसे कि इनके गुर्गे यह प्रचार चलाते हैं कि प्रवासियों के कारण स्थानीय लोगों को काम नहीं मिलते है। इसमें प्रवासियों की कोई गलती नहीं होती। उनकी मजबूरी है कि वे अपने परिवार का पेट पालने के लिए सुदूर इलाकों और देशों में जाते हैं। यह भी कहा जाता है कि प्रवासी मजदूर उस क्षेत्र या देश के संसाधनों का उपयोग करते हैं और इसलिए ही स्थानीय लोग सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं। यह तो निरा झूठ है। असल में तो प्रवासी मजदूरों का अमानवीय शोषण होता है और वे अत्यंत खराब परिस्थितयों में जिंदा रह कर पूंजीपतियों के मुनाफे को बढ़ाते हैं। दूसरी तरफ, पूंजीपति आप्रवासी मजदूरों को ही काम देते हैं क्योंकि अक्सर न्यूनतम मजदूरी दिये बिना भी उनसे काम कराना आसान होता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि स्वयं स्थानीय मजदूर भी प्रवास करते हैं या इसके लिए बाध्य होते हैं और उनके साथ भी वहां वैसा ही सलूक किया जाता है। दरअसल इसकी परिस्थितियां पूंजीपति वर्ग की उत्पादन और वितरण व्यवस्था पैदा करती है जिसमें असमानताएं और विभेद हैं। यही नहीं, पूंजीवाद जैसे सभी का विकास नहीं करा सकता, वैसे ही वह सभी देशों और क्षेत्रों का विकास नहीं करा सकता है। उसकी जरूरत है असमान विकास। अधिकांश क्षेत्रों को अविकसित और पिछड़ा रखना पूंजी की जरूरत है क्योंकि इसी से उसे सस्ते उजरती मजदूर मिलते हैं। सोचकर देखिये – अगर अधिकांश लोग श्रमशक्ति बेचकर जिंदा रहने को बाध्य नहीं हों, तो क्या पूंजी का काम चलेगा?; एकमात्र श्रमशक्ति बेचकर जिंदा रहने वाले की मौजूदगी के बिना क्या पूंजीवाद चल सकता है? आज दुनिया के कुछ तबकों और क्षेत्रों को छोड़ दें, तो हर देश और क्षेत्र से मजदूर का पलायन हो रहा है और पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शोषण पर आधारित व्यवस्था में यह लोगों की सबसे बड़ी मजबूरी है। ऐसी स्थिति में, काम और रोजी–रोटी के लिए देश और दुनिया के हर कोने में आवागमन की आजादी की मांग एक ऐसी मजदूर पक्षीय मांग है जो सभी क्षेत्रों व देशों के मजदूरों की, स्थानीय और प्रवासी दोनों तरह के मजदूरों की एक साझा मांग है, और आज जबकि घुसपैठिया का सवाल उठाकर व उनका अमानवीय दमन और उत्पीड़न करके उनका और भी अमानुषिक शोषण की तैयारी चल रही है, वैसी परिस्थिति में इस साझी मांग के लिए एकताबद्ध संघर्ष करना एक अहम आवश्यकता बन चुका है। साथ ही, इसके लिए भी संघर्ष करना और मांग उठाना जरूरी है कि न्यूनतम मजदूरी के नीचे वेतन/मजदूरी पूंजीपति नहीं दे।न्यूनतम मजदूरी से नीचे जाकर काम न करने की मांग भी हमारी, स्थानीय एवं प्रवासी मजदूरों की, एक साझा मांग है। इसी तरह न्यूनतम जनवादी अधिकार की मांग, जैसे मालिकों के मनमाने व्यवहार और लूट का विरोध करने, तथा यूनियन बनाने के अधिकार की मांग भी एक साझा मांग बनती है जिसके लिए स्थानीय और प्रवासी मजदूरों को मिलकर लड़ना आवश्यक है।
स्थानीय और प्रवासी मजदूरों के बीच काम (जॉब्स) के लिए मालिक वर्ग जिस तरह की गंदी प्रतिस्पर्धा बढ़ाने में लगे रहता है उसकी काट अत्यंत जरूरी है, अन्यथा स्थानीय और प्रवासी मजदूरों का इसी तरह तीव्र शोषण होता रहेगा, क्योंकि स्थानीय मजदूर भी कहीं न कहीं प्रवास करते ही हैं । इसी प्रतिस्पर्धा का उपयोग पूंजीपति वर्ग और इसके गुर्गे अपनी राजनीति में करते हैं – ”बाहरी बनाम स्थानीय या भीतरी” का मुद्दा खड़ा करके – जिससे मजदूर वर्ग की एकता ही नहीं टूटती है उनके बीच दुश्मनागतपूर्ण वातावरण भी बनता है। दोनों – स्थानीय और प्रवासी मजदूरों – को मालिकों और पूंजीपतियों की ऐसी चालों का अंदाजा होना चाहिए। स्थानीय लोगों को पूजीपति वर्ग के इस गलत और झूठे प्रचार में नहीं आना चाहिए कि प्रवासी मजदूर स्थानीय लोगों का रोजगार और संसाधन और सुविधा चुरा रहे हैं। स्थानीय मजदूर अपने अनुभव से यह जान और समझ सकते हैं कि किस तरह स्थानीय धनी लोगों और पूंजीपतियों के बीच सांठगांठ है और दोनों मिलकर किस तरह स्थानीय और प्रवासी मजदूरों दोनों को लूटते हैं। चाहे किसी भी क्षेत्र व देश का मजदूर है, वह पूंजी का उजरती गुलाम है, दोनों की संयुक्त शक्ति ही मजदूर वर्ग की शक्ति है जिससे पूंजीपति वर्ग का मुकाबला किया जा सकता है। वर्ग-सचेत मजदूर यह कभी नहीं भूल सकते कि हर देश और क्षेत्र के मजदूरों का एकमात्र दुश्मन पूंजीपति वर्ग है, चाहे वह किसी भी देश और क्षेत्र का हो। स्थानीय धनी लोग जैसे प्रवासी मजदूरों से महंगा मकान किराया और महंगे सामान की सप्लाई, कहीं-कहीं बलपूर्वक और जबरन सप्लाई, के द्वारा लूटते हैं, वैसे ही वे स्थानीय गरीब और मजदूर लोगों को सूदखोरी से लूटते हैं, और जैसे ही कोई राजनीतिक संकट आता है या जैसे ही मजदूर एकजुट हो मालिकों की लूट के खिलाफ कोई संघर्ष खड़ा करते हैं, वैसे ही ये ही धनी लोग मालिक पूंजीपतियों के साथ मिलकर प्रवासी मजदूरों के खिलाफ स्थानीय मजदूरों को उकसाने में लग जाते हैं, स्थानीय मजदूरों के एकाएक ‘हितैषी’ बन बैठते हैं और उन्हें प्रवासियों के खिलाफ मारपीट करने तक को उकसाते हैं।
लेकिन प्रवासियों की इस लूट में द्वंद्व भी है।इसका द्वंद्वात्मक पक्ष इस बात में निहित है कि जहां प्रवास पूंजीपति वर्ग के लिए मुनाफा का एक बड़ा स्रोत और मजदूरों को स्थानीय बनाम बाहरी या घुसपैठिया के बीच विभाजन कराने वाला हथियार मुहैया कराता है, तो दूसरी तरफ यह दुनिया के समग्र मजदूर वर्ग के बीच, खास कर उसके अगुआ तत्वों के बीच आपसी अंतर्राष्ट्रीय संपर्क और भाईचारे के लिए भौतिक आधार और उपादान भी प्रदान करता है, बशर्ते पूंजीपति वर्ग की विभाजनकारी राजनीति को वैचारिक और राजनीतिक तौर पर परास्त करने में सक्षम मजदूर वर्ग का कोई अग्रदल मौजूद हो। अगर नहीं भी हैं, तो अगुआ मजदूर अध्ययन और राजनीतिक पहल तथा अध्यवसाय करके अग्रदल बना भी सकते हैं।कुलमिलाकर, मार्क्स की भाषा में, प्रवास ‘आरक्षित श्रम सेना’ (reserve army of labour) को बढ़ाता और मजबूत करता है, जो पूंजीवाद के संकट में वेतन को नीचे रखने का हथियार पूंजीपति वर्ग को देता है, हालांकि इसके द्वंद्वात्मक पक्ष को भी ध्यान में रखना चाहिए जिसके पीछे समस्त मजदूरों – बाहरी और स्थानीय सभी तरह के मजदूरों – के बीच एकता को कायम करने वाली एक वास्तविक भौतिक शक्ति भी सदैव काम करती है जो आज की तारीख में समस्त मजदूर वर्ग की हो रही तबाही को देखते हुए और घुसपैठिया के नैरेटिव के बावजूद मजबूत ही होती जा रही है। हमारे लिए यह इसका चमकीला पक्ष है।
उद्योगों की चढ़ती के काल में प्रवासी मजदूर पूंजीपति वर्ग के लिए और भी लाभदायक हो जाते हैं क्योंकि इससे पूंजीपति वर्ग को सस्ते दर पर प्रचुर मात्रा में, बल्कि जरूरत से अधिक, मजदूर मिल जाते हैं – खासकर अकुशल श्रमिक जिनका और अधिक शोषण होता है। इसी उम्मीद में आज भी पूंजीपति प्रवास को रोक नहीं सकते, रोकना भी नहीं चाहते। अप्रत्यक्षत: ही सही लेकिन वे आज भी बढ़ावा देते हैं – कम से कम गैर-कानूनी प्रवास को तो अवश्य ही जिससे उनके आर्थिक और राजनीतिक दोनों हित सधते हैं। आर्थिक हित यह कि वे इससे अकूत मुनाफा बटोरते हैं। राजनीतिक हित यह कि आर्थिक संकट में ये ही प्रवासी फासीवादी राजनीति का चारा बनते हैं। मजदूर वर्ग के लिए यह बहुत खतरनाक स्थिति का निर्माण करते हैं और कर रहे हैं। यही हमारी चिंता का विषय भी है। जब मजदूर एकजुट होने लगते हैं, तो फासीवादी सरकार व निजाम, जो सर्वाधिक प्रतिक्रियावादी पूंजीपति वर्ग के हिस्से को साधते हैं, “घुसपैठिया” का शोर मचाकर मजदूरों को आपस में लड़वाते हैं और इस पर वोट की राजनीति करते हैं जो बाद में काफी खराब मोड़ भी ले सकता है । इसलिए यह तो तय है कि पूंजीपति वर्ग और उसकी सरकारें वास्तव में प्रवास को खत्म करना नहीं चाहते हैं या इस पर रोक लगाना नहीं चाहते हैं। ऐसा वे चाहकर भी नहीं कर सकते हैं। हां, इस पर राजनीति करना चाहते हैं। अगर वे मजदूरों के प्रवास पर रोक लगा देंगे, तो पूंजीवादी उत्पादन पद्धति लगभग ठप्प हो जाएगी, उद्योगों का विस्तार, जो पहले से ही धीमा है, और अधिक धीमा हो जाएगा या लगभग रूक जाएगा। दरअसल, पूंजीपति वर्ग यह जानता है कि कुशल और अकुशल प्रवासी मजदूरों ने मौजूदा आधुनिक पूंजीवादी दुनिया को बनाने में जो अपना खून-पसीना बहाया है उसकी भरपाई एक ही तरह से की जा सकती है – मौजूदा दुनिया को मजदूर वर्ग अपने हाथ में ले ले और जो विकास पलटकर उसके खिलाफ काम कर रहा है उसे अपने अधीन कर ले और उसका उपयोग पूरे उत्पादक समाज के लिए करे और इस तरह मानवजाति को हर तरह की गुलामी के कलंक से मुक्त कर दे। पूंजीपति वर्ग को मालुम है, देर-सवेर ऐसा ही होगा। इसलिए ही वे घुसपैठिया जैसा मुद्दा लेकर आये हैं ताकि मजदूरों को बांटा जा सके। दूसरी तरफ, मजदूर वर्ग को और खासकर इसकी अगुआ ताकत को आज के धुर प्रतिक्रियावादी दौर में मजदूरों-मेहनतकशों को विभाजित करने वाली विचारधारा से जमकर लोहा लेने के लिए तैयार होना है। यहां आर्थिक–तात्कालिक मांगों तक अपने को सीमित रखना घातक होगा। इतना ही नहीं, यह जाने–अनजाने फासीवादी राजनीति का चारा बनने की ओर कदम बढ़ाना भी होगा। आज के दौर में जब विश्व पूंजीवाद सतत संकट काल में है, तो इसको दोनों दृष्टियों से – क्रांति और प्रतिक्रांति की दृष्टियों से – देखते हुए मजदूर वर्ग को अपनी रणनीति बनानी होगी – आर्थिक के साथ–साथ तथा इसको वैचारिक व राजनीतिक लड़ाई के साथ संयोजित करना होगा। मजदूर वर्ग को यह समझना होगा कि बड़ा पूंजीपति वर्ग के पास आज नफरत और घृणा की राजनीति के अतिरिक्त शासन करने का और कोई तरीका या रास्ता नहीं बचा है। ऐसे में, इस फ्रंट पर हमें लोहा लेना ही लेना होगा। हम महज आर्थिक मांगों तक अपने को सीमित नहीं रख सकते। वह संपूर्ण संघर्ष की एक कड़ी मात्र है, पूरा संघर्ष नहीं। यहीं से हमारे लिए रोशनी की किरण भी आ रही है। मजदूरों को बांटने वाली गंदी फासीवादी राजनीति तात्कालिक तौर पर एक बड़ी चुनौती जरूर दिखती है, लेकिन दूरगामी तौर पर देखें तो यही चीज मजदूरों को अंतत: सिखाएगी और जगाएगी भी। हम यह भी देख सकते हैं कि आज पूंजीवाद का मानवद्रोही चेहरा सामने है। इससे पूंजीवाद के प्रति लोगों का मोह खत्म हो रहा है। साथी ही, आज के पूंजीवाद की धुर प्रतिक्रियावादी भूमिका बता रही है कि उनके दिन बचे-खुचे हैं। एक ही कमी है – मजदूर वर्ग की आत्मगत तैयारी की कमी। मजदूर वर्ग को इसे गौर से समझने की जरूरत है।
पूंजीपति वर्ग आज फासीवादी राजनीति थोपकर लूट और मुनाफे को बढ़ाने में लगी है। घुसपैठिया का सवाल उठाने से प्रवासी श्रमिक और अधिक असुरक्षित महसूस करने लगते हैं। भय से वे और भी अधिक लूट सहने के लिए तैयार हो जाते हैं। इसलिए स्थानीय गरीब-मेहनतकश आबादी का प्रवासी मजदूरों के साथ खड़ा होना आवश्यक है। ऐसी बात करते समय इस बात को अवश्य ही ध्यान में रखें कि स्थानीय आबादी के बच्चे और युवा भी कहीं न कहीं के और किसी न किसी रूप में प्रवासी होते हैं। इसलिए तमाम गरीबों-तेहनतकशों को समझना चाहिए कि बेरोजगारी पूंजीवाद की देन है, न कि किसी और चीज की। प्रवासी मजदूरों के कारण तो यह कतई नहीं पैदा हुई है। याद रखना चाहिए कि पूंजीवाद उसे उत्पादन और वितरण व्यवस्था का नाम है जिसके तहत उत्पादन का लक्ष्य मेहनतकशों और संपूर्ण मानवजाति के सुंदर और सुखमय भविष्य का निर्माण नहीं, इसके ठीक उलट मानवता की कीमत पर अधिक से अधिक मुनाफा कमा करना है। इसलिए कहा जाता है कि पूंजीवादी उत्पादन का लक्ष्य पूंजी से शुरू होकर पूंजी पर खत्म हो जाता है। उसका लक्ष्य पूंजी संचय है और इसके लिए वह किसी और चीज की चिंता ही नहीं करता है। विज्ञान और इसके उपादानों को लें। इसका लक्ष्य मानवजाति के जीवन को बेहतर करना हो सकता है, लेकिन क्योंकि इस पर भी पूंजीपति वर्ग का ही कब्जा है, इसलिए विज्ञान और तकनीक का उपयोग भी ये पूंजीपति मुनाफा के लिए कर रहे हैं, मानवजाति को राहत देने के लिए या गुलामी के कलंक को खत्म करने के लिए नहीं कर रहा है। बेरोजगारों की फौज पूंजीपतियों के लिए मौज और मुनाफा का स्रोत है। इसी से तो वे कम वेतन देकर भी ज्यादा काम करवाने का अवसर पाते हैं ताकि मजदूरों को ज्यादा से ज्यादा लूटा जा सके। इसलिए प्रवास के सवाल और समस्या का स्थाई हल राष्ट्रीय सीमाओं को बंद करने या पूरी तरह खोलने में नहीं (हालांकि सीमा को खोलने से तात्कालिक राहत होगी), अपितु मजदूर वर्ग की अंतर्राष्ट्रीय एकता कायम कर पूंजीवाद को खत्म करने और समाजवाद कायम करने में निहित है। मजदूर वर्ग को हमारी इन तमाम बातों पर गौर करना चाहिए।
हमने ऊपर कहा है कि मजदूरों का प्रवास (उत्प्रवास और आप्रवास दोनों) गरीब देशों/क्षेत्रों से श्रमशक्ति का निकास है जिससे दूसरे देशों/क्षेत्रों के पूंजीपतियों को मुनाफा बढ़ाने का मौका मिलता है। तो क्या हम यह चाहते हैं कि स्थानीय श्रम की स्थानीय पूंजीपति द्वारा लूट सही है? नहीं, हम ऐसा बिल्कुल ही नहीं कह रहे हैं। हम संपूर्ण पूंजीपति वर्ग को सामने रखकर बात कर रहे हैं। आज तो पूंजी का चरित्र ऐसा रह भी नहीं गया है कि हम इसे स्थानीय और विदेशी खांचे में पुराने तरीके से फिट कर सकते हैं। असल में प्रवास की मूल वजह पूंजीवाद के तहत असमान विकास है। इसके बारे में भी हम ऊपर बात कर चुके हैं। हम यहां बस यह कहना या दुहराना चाहते हैं कि प्रवास की जरूरत पूरे पूंजीपति वर्ग को है, किसी खास पूंजीपति को नहीं। संपूर्णता में पूंजीवादी विकास इस असमान विकास के थ्योरी पर ही आश्रित और आधारित है। खास आप्रवास की बात करें – जैसा कि ऊपर कहा गया है – इससे विकसित देशों/क्षेत्रों में गरीब देशों/क्षेत्रों से सस्ते मजदूरों की आपूर्ति बढ़ती है जिससे इससे विकसित देश के मजदूरों के वेतन/मजदूरी पर नीचे की ओर दबाव बनता है। इससे पूरे विश्वस्तर पर मजदूरी पर खर्च घटता है और यह विश्व के पूंजीपति के लिए फायदेमंद है। साथ ही, प्रवास पूंजीपति वर्ग और इसकी पार्टियों के लिए मजदूरों को विभाजित करने का हथियार भी बनता है। और यह पूरे पूंजीपति वर्ग की जरूरत है। खासकर इस अर्थ में कि बिना किसी क्षेत्र को गरीब और अविकसित रखे, समाज के एक हिस्से को अपनी श्रमशक्ति को बेचकर जिंदा रहने के लिए मजबूर किये बिना पूंजीवाद न खड़ा हो सकता है और न ही चल सकता है। गौर करें, तो यह अंतर्राष्ट्रीय श्रम विभाजन का आधार है। नवउदारवाद ने इस अंतर्विरोध को और गहरा किया है, क्योंकि पूंजी को बॉर्डरलेस दुनिया मिली, लेकिन मजदूरों को “घुसपैठिया” का लेबल या दर्जा। इसने पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के अंतर्विरोधों को और गहन ही बनाया है।
देखा जाए तो आज के समय में, तथा निकट भविष्य में और भी अधिक तीखे रूप में, यह मजदूर वर्ग की एक बहुत बड़ी समस्या बनने वाली है क्योंकि यह संकटग्रस्त विश्व-पूंजीवादी व्यवस्था में घनघोर रूप से बढ़ती बेरोजगारी, भुखमरी और आजीविका की लगातार गहराती समस्या से जुड़ी है जिसका क्रांति के द्वारा वर्तमान पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने और इसके ठीक उलट कोई नई व्यवस्था बनाने के अलावा दूसरा कोई समाधान ही नहीं है। स्थिति यह है कि आज के हालात में पूंजीपति वर्ग की आप्रवास विरोधी धुर दक्षिणपंथी-फासीवादी राजनीति की गाज मध्य वर्ग और उच्च मध्य वर्ग के कानूनी और गैर-कानूनी उत्प्रवासियों, जो पेट की आग शांत करने के लिए और अधिक उन्नति के अवसर खोजने हेतु प्रवास जाते हैं, उन पर भी गिरनी शुरू हो चुकी है। अमेरिका से ट्रंप प्रशासन द्वारा हथकड़ियों में कैद कर जो अत्यंत ही अमाणुषिक तरीके से भारत वापस भेजे गये, और आज कल जिनका यूरोप के देशों, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड में ”सेंड देम बैक” के नारे से हर दिन स्वागत किया जा रहा है, उनमें मध्य और उच्च मध्य वर्ग के नवधनाड्य, उन्नतिशील तथा आर्थिक रूप से अग्रमुखी लोग लोग भी शामिल हैं। हाल में हमने इंडिगो फ्लाइट संकट देखा है। उसने दिखाया कि वित्तीय पूंजी के मोनोपोली (एकाधिकार) पूंजीवाद के युग में हवाई जहाज में उड़ने वाले मध्य और उच्च मध्य वर्ग के सभ्य लोग भी उनकी नजर में तुच्छ जीव से अधिक कुछ भी नहीं हैं। वैसे ही ये मध्यवर्गीय उत्प्रवासी भी जल्द ही देखेंगे कि विश्वपूंजीवाद में उनके भी वो वाले ”अच्छे दिन” आने वाले हैं जिसकी उम्मीद में भारत के गरीब लोगों ने बड़ी उम्मीद से श्रीमान नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री की कुर्सी सौंपी थी।
इस तरह हम देख सकते हैं कि प्रवास की समस्या आज एक सतत रूप से गहराती एक विकराल समस्या बन चुकी है। इसकी चपेट में मजदूर वर्ग के अलावे और दूसरे वर्ग भी आ रहे हैं जिससे स्थिति की संगीनता और गंभरता का पता चलता है। प्रवास पूंजीपति वर्ग की जरूरत है, लेकिन उसका सबसे प्रतिक्रियावादी हिस्सा इसे पूरी दुनिया में एक बड़ी विकट समस्या बता रहा है। न उगलते बन रहा है, न निगलते। आर्थिक हित का एक पक्ष कहता है प्रवास जरूरी है, दूसरा पक्ष कहता है, प्रवास की मात्रा को संभालना मुश्किल है, क्योंकि आर्थिक मंदी और अवसाद में पूंजी-निवेश होने की स्थिति नहीं है। इससे निकलने वाला राजनीतिक हित फासीवादी राजनीति को साधने में है जिसका प्रिय विषय नफरत और घृणा है। घुसपैठिया भी उसका पसंदीदा विषह है। इसलिए यहां एक ‘अदृश्य’ सा टकराव नजर आता है, क्योंकि घुसपैठिया नैरेटिव से सधने वाले हित की एस उच्चतर सीमा है जिसके बाद विश्वपूंजीवाद के लिए यह गले की हड्डी बन जाएगी, क्योंकि उसे तो सस्ते अकुशल और कुशल प्रवासी मजदूर तो चाहिए, खासकर तब जब पूंजीपति वर्ग देख रहा है कि प्रतिउत्पाद मानव श्रम कम लगने की वजह से उसका मुनाफा दर गिर रहा है। कोरोना काल में साफ दिखा कि प्रवासी मजदूर ही भारत की अर्थव्यवस्था को चलाते हैं, चाहे वे बिहार, यूपी, बंगाल, उड़ीसा, मध्यप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र या किसी अन्य राज्य के हों। असल में तो विश्व पूंजीवाद के लिए प्रवास एक जरूरत है। हर देश और दुनिया के पूंजीपतियों को इसकी जरूरत है। अमेरिका और यूरोप के वित्तीय एकाधिकारी पूंजीपतियों को पता है कि विश्वअर्थव्यवस्था की नींव में आप्रवासी मजदूर हैं। नींव खोदी जाएगी तो आप्रवासी मजदूरों की हड्डिया दबी मिलेंगी। लेकिन प्रवास को रोकना या सीमित करना भी उसकी मजबूरी बन चुकी है, क्योंकि एक तो सबको काम नहीं मिल रहा है और दूसरे इससे अंतर्राष्ट्रीय मजदूर एकजुटता को बल मिलता है। इसलिए आप्रवासी मजदूर बनाम स्थानीय मजदूरों के बीच नफरत फैलाना भी जरूरी है। इसके लिए फासीवादी इसके सबसे बेहतर राजनीतिक औजार हैं। कहने का अर्थ यह है कि यह विश्वपूंजीवादी संकट की उपज है लेकिन इससे निपटने की पूंजीवादी मार मजदूर वर्ग पर पड़ने वाली है और पड़ रही है। मजदूर वर्ग ही वह वर्ग है जो अपना और अपने परिवार का पेट पालने के उद्देश्य से भारी संख्या में दुनिया की खाक छानने के लिए बाध्य हैं। जो मजदूर अपना वतन और अपनी मूल जगह से उजड़कर दो रोटी का जुगाड़ करने दुनिया की खाक छानते हैं उनका आर्थिक ही नहीं हर तरह का और बहुत ही घिनौना शोषण पूंजीपति वर्ग और उसके गुर्गों के द्वारा किया जाता है। घुसपैठिया का सवाल आज पूंजीपतियों के गुर्गों के हाथ में एक बड़ा हथियार बन गया है। तभी तो इस नाम पर कहीं बंगालियों की, तो कहीं दलित आप्रवासी की, कहीं अरूणाचल तो कहीं त्रिपुरावासी युवक की हत्या तक कर दी जा रही है। यूपी पुलिस उनकी पीठों पर कोई मशीन रखकर जांच के नाम पर बंगलादेशी घुसपैठिया साबित करने पर तुली है! देखने की बात यह है कि यह सब अपने देश के भीतर अपने लोगों के साथ होता रहा है। यह स्थिति की विस्फोटकता। हम समय-समय पर मुंबई, गुजरात, कर्नाटक, दिल्ली, तमिलनाडू में हम बिहार व यूपी तथा अन्य भाषा-भाषियों के साथ ऐसा होते देखते ही रहते हैं। अभी हाल में चंडीगठ़ में बंगाल के बांग्लाभाषियों के साथ जिस तरह का बर्ताव हुआ हम देख चुके हैं। बात अंतत: वही है। प्रवासी मजदूरों का घरों से दूर रहना अपने आप में उनके लिए डर और भय का कारण है, खासकर तब जब वे संगठित नहीं हैं, वर्ग–सचेत नहीं है और तरह–तरह के राजनीतिक बहुरूपियों के झांसे में आ जाते हैं, राजनीतिक–वैचारिक चेतना से लैस नहीं हैं।यह सब उनके विरुद्ध जाता है। पूंजीपति वर्ग के ऐसी घटिया राजनीति से कैसे लड़ा जाए इससे अनजान होना, इसका प्रशिक्षण न होना और उनके बीच कोई क्रांतिकारी विचारधारा और पार्टी का न होना, आदि उन्हें और अधिक कमजोर बनाता है।इस तरह वे निहत्था हो सब कुछ सहने को मजबूर होते हैं। समस्या का यह वह छोर है जिसे ठीक किये बिना कोई उपाय नहीं है। शॉटकर्ट कुछ भी नहीं है साथियों, इसे याद रखना होगा।
नवउदारवाद की नीतियों (असल में वित्तीय पूंजी के वर्चस्व की नीतियों) के तहत वित्तीय पूंजी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्रतापूर्वक किसी भी देश में विचरण करने और चुटकी में यहां से वहां फुर्र होने की छूट मिली, लेकिन मजदूर वर्ग के आवागमन पर तरह-तरह की पाबंदियां लगा दी गईं। इसलिए मजदूरों को गैर-कानूनी तरीके अपनाने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है। मजदूर लुक-छिपकर, बोर्डर पर तैनात अधिकारियों को घूस देकर, अमेरिका तथा यूरोप के विकसित देशों में अपना भविष्य खोजने जाते हैं। दर्जनों मील लंबी समुद्री यात्रा करते हैं। गिरफ्तारी से बचने के लिए बर्फीले रास्तों में हाड़ कंपा देने वाली सर्द हवाओं को झेलते हुए विकसित देशों में प्रवेश करते हैं। मतलब सारे खतरे मोल लेते हैं, क्योंकि उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं दिखता। जहां तक क्रांति की बात है तो यह सच है यह उनकी कल्पना में अभी नहीं है। इस तरह वे पेट के लिए घुसपैठिया बनते हैं, और फिर फासीवाद की विभाजनकारी राजनीति का चारा बनते हैं। कुलमिलाकर, ”घुसपैठियों” का आना रूकने वाला नहीं है। हां, इसे रोकने के नाम पर पूरी दुनिया में गंदी से गंदी राजनीति और भी जोर-शोर से चलेगी। इस कारण यह भी तय है कि इस राजनीति से प्रवासी मजदूर वर्ग के बीच भय व्याप्त होगा जो उनके अधिकतम शोषण के लिए उन्हें मजबूर करेगा, और कर रहा है। ठीक इसी जगह से हमारे अपने लिए युगीन कार्यभार निरूपित करने होंगे।
यहां विश्व-पूंजीवाद की लंबी संकटग्रस्तता और इसके परिणामों की बात करना जरूरी है। संकट ने फासीवादी ताकतों के उभार को जन्म दिया और मजबूत किया है। “घुसपैठिया” (Infiltrator) जैसे शब्दों का आम राजनीति में धर्म की तरह इतना अधिक व्यापक चलन फासीवाद द्वारा एक मुकाम तय कर लेने का संकेत है। भारत में भाजपा और आरएसएस की राजनीति के जरिए मुसलमानों को निशाना बनाते हुए हिंदू-मुस्लिम नफरत की राजनीति का जमकर उपयोग हुआ तथा उसकी जहरीली फसल कैसी है हम देख चुके हैं।इसमें मिली सफलता के बाद अब घुसपैठिया का सवाल मोदी सरकार ला रही है।लेकिन यहां इसका सीधा सामना मजदूर वर्ग से होना है और इसलिए सरकार भी संभलकर कदम बढ़ा रही है। यहां मजदूर वर्गीय ताकतों और मजदूर वर्ग की अग्निपरीक्षा है। हम पाते हैं, यहां आकर मोदी सरकार की फासीवादी रणनीति यूरोप, अमेरिका और आस्ट्रेलिया के पूंजीपति वर्ग के साथ मिलकर सामान्यीकृत हो रही है। हम देख सकते हैं कि अमेरिका और यूरोप में भी एंटी-इमिग्रेंट सेंटिमेंट्स (आप्रवास विरोधी भावना) के जरिए मेहनतकश जनता की एकता को भंग करने की समान कोशिश चल रही है। उपनिवेशवाद से नवउदारवाद तक की यात्रा पर ध्यान दें, तो ऐतिहासिक रूप से, आप्रवास और उत्प्रवास पूंजीवादी विस्तार के प्रमुख औजार रहे हैं। 19वीं सदी के यूरोपीय उपनिवेशवाद में ब्रिटेन से हुए उत्प्रवास ने अमेरिका और अफ्रीका में नए बाजार खोले और ब्रिटेन के लिए अधिशेष जनसंख्या की मुक्ति का हथियार तैयार किया, वहीं आप्रवास अमेरिकी पूंजीवाद के लिए सस्ता श्रम कुंड। यह पूंजी-निर्यात का हिस्सा बना। 20वीं सदी में, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद आये पूंजीवाद के उत्कर्ष काल के बाद नवउदारवाद की नींव पड़ी, जब ब्रेटन वुड्स व्यवस्था ने वित्तीय पूंजी को लूट और आवरागर्दी के लिए मुक्त कर दिया। 1980 के दशक से रीगन-थैचर युग के नवउदारवाद ने वैश्वीकरण को बढ़ावा दिया, जहां पूंजी को देश व राष्ट्र की सीमाओं से परे स्वतंत्रता मिली, लेकिन मजदूरों पर संकट बढ़ा। मजदूरों के स्वतंत्र आवागमन को रोकने के लिए दीवारें खड़ी की गईं। विश्व-पूंजीवाद की संकटग्रस्तता – 2008 की मंदी और बाद में आई मंदी और दीर्घकालीन अवसाद, आदि – ने नस्ल, रंग और धर्म आधारित वैश्विक फासीवादी उभार की जमीन तैयार की। अब हर जगह “घुसपैठिया” का सवाल उठ खड़ा हुआ है। फर्क यहां यह है कि इस जगह पूंजीपति वर्ग का मजदूर वर्ग से सीधा मुकाबला है और मजदूर वर्ग के लिए यह अंतिम परीक्षा की घड़ी के समान है। अमेरिका में ट्रंप की “बिल्ड द वॉल” (”दीवारें खड़ी करो”) की नीति ने मैक्सिकन मजदूरों को डिपोर्ट किया, जबकि यूरोप में इटली, फ्रांस और जर्मनी में उग्र-दक्षिणपंथी पार्टियां आप्रवासी विरोधी भावनात्मक नैरेटिव (एंटी-इमिग्रेंट रेटोरिक) की लहर पर सवार होकर सत्ता में आईं। भारत में, भाजपा-आरएसएस की राजनीति ने मुसलमानों को टारगेट करने के लिए “घुसपैठिया” शब्द का बाजाप्ता योजनाबद्ध उपयोग करती है और इस तरह हिंदू-मुस्लिम नफरत की राजनीति की आंच को अपने मकसद के लिए जब चाहे बढ़ाती रहती है। मूल मकसद मेहनतकश जनता को हिंदू-मुस्लिम की नफरत से भरी राजनीति के दलदल में धकेलना है ताकि पूंजी की लूट जारी रहे। सनद रहे, यह वित्तीय पूंजी की बादशाहत के- उसके सबसे प्रतिक्रियावादी और सबसे जन विरोधी तथा जनतंत्र व न्याय विरोधी तत्वों के वर्चस्व के – दौर की देन है जहां पूंजी को हर तरह की लूट करने के लिए पूरी तरह से मुक्त कर दिया गया है; वहीं मजदूर की मुक्ति की आवाज पर हर तरह का पहरा बैठाया जा रहा है। मजदूर वर्ग के प्रवास को घुसपैठिया का सवाल बना देना इसका एक महत्वपूर्ण पहलू है।
दूसरी तरफ, संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट्स बताती हैं कि 2020 से वैश्विक प्रवासियों की संख्या 281 मिलियन से बढ़कर 2025 तक 300 मिलियन हो गई हैं। इसमें मुख्य रूप से एशिया-अफ्रीका से यूरोप-अमेरिका की ओर जाने वाले लोग शामिल हैं। नवउदारवाद ने IMF और विश्व बैंक के जरिए गरीब देशों पर संरचनात्मक समायोजन थोपे, जो पहले उत्प्रवास को बढ़ावा देते दिखे। लेकिन आर्थिक संकट के वक्त में क्रांतिकारी विचार के फैलाव को रोकने के लिए, फासीवादी ताकतों के माध्यम से पूंजीपति वर्ग खासकर बड़ा पूंजीपति वर्ग “घुसपैठिया” का नैरेटिव बनाने लगी। और उसे चला रही है ताकि मजदूरों को विभाजित किया जा सके। अमेरिका में 2024-2025 में आप्रवासन की चिंता (इमिग्रेशन कंसर्न) 55% से घटकर 30% हो चुका है। इसलिए यह आश्चर्यजनक नहीं है कि उनका डिपोर्टेशन और प्रताड़ना, आदि बढ़े हैं। यूरोप में, धुर दक्षिणपंथी–फासिस्ट पार्टियां प्रवास को “समस्या” बताती हैं। भारत में, भाजपा की पॉलिसी भी इससे मिलती-जुलती है, फर्क इतना है कि यहां रोहिंग्या और बांग्लादेशी मुसलमानों को टारगेट किया जाता है, क्योंकि यह हिंदू-राष्ट्र के नैरेटिव का चारा है और इसे मजबूत करता है। यह राजनीति ज्यादा से ज्यादा जहरीली होती जा रही है। फासीवाद का उभार जैसे भारत में दिखता है वह थोड़ा भिन्न दिखता है (भाजपा-आरएसएस का हिंदुत्व मार्का) लेकिन अंतर्य समान ही है। जैसे कि हम अमेरिका में ट्रंपिज्म, यूरोप में लेपेन या मेलोनी को देख सकते हैं। सबों की एक ही ठौर है – “घुसपैठिया” का नैरेटिव। यह संयोग नहीं, फासीवाद की मूल प्रकृति है जो इन्हें एक ही बिंदु पर ला खड़ा कर दी है। परिणामस्वरूप, पूरी दुनिया में मजदूरों पर अथाह जुल्म – डिपोर्टेशन, हेट क्राइम्स, और मानसिक तनाव – बढ़ रहा है। यूरोप में 2025 में आप्रवास पर प्रतिबंध (इमिग्रेशन रेस्ट्रिक्शंस) बढ़े हैं। दरअसल इससे संबंधित आंकड़ें भारी मात्रा में संग्रहित किये गये हैं और किये जा रहे हैं जो अविश्वसनीय और चौंकाने वाले हैं। भारत के लोग जानते हैं धर्म आधारित (अल्पसंख्यक विरोधी) हेट स्पीच और क्राइम का क्या हाल है। उसकी चर्चा कर हम समय जाया नहीं करेंगे। उसे छाप कर प्रचारित करना हमारा आगे का एक काम है। मुख्य बात यह समझना है कि फासीवादी राजनीति पूंजी के संकट को हिंदू-मुस्लिम विभाजन में बदलने का प्रयास कर रही है और पूंजीपतियों के मुनाफे को बिना किसी क्रांतिकारी खतरे के सुरक्षित रखने की कोशिश कर रही है। पूरी दुनिया में वित्तीय पूंजी इसलिए ही फासीवाद को बढ़ावा दे रही है। आम तौर पर संकटग्रस्त पूंजीवाद-साम्राज्यवाद का यही दस्तुर है।
प्रवास में जेंडर के पक्ष (पहलू) को सामने रख कर बात करें, तो यह एक महत्वपूर्ण पक्ष दिखता है। महिलायें प्रवास में घरेलू काम, तथा और अन्य तरह के कामों के लिए भी, जाती हैं और बुरी तरह शोषित–उत्पीड़ित होती हैं।नवउदारवाद ने इसे बढ़ाया और फासीवाद ने इसमें हिंसा का आयाम जोड़ा। यहां पितृसत्ता और फासीवाद का गठजोड़ साफ–साफ दिखता है। भारत में, हिंदू–मुस्लिम नफरत ने मुस्लिम महिलाओं पर हमले बढ़ाए। क्या–क्या नहीं कहा गया। ट्रिपल तलाक कानून, जिसे प्रोग्रेसिव राजनीति के नजरिये और तरीके से किया जा सकता था, उनके बीच से ही इसे एक सुधारवादी आंदोलन का रूप दिया जा सकता था, उसको हिंदुत्ववादी नैरेटिव को तेज करने के हथियार के रूप में मोदी सरकार द्वारा इस्तेमाल किया गया।
साथियों, लेकिन ये तो समस्या का चित्रण भर है; इसका समाधान क्या है? ऊपर समाधान की बात प्रपत्र की बुनावट में ही मौजूद है। ऊपर कहा गया है कि इसका तात्कालिक समाधान मजदूरों-मेहनतकशों की अंतरराष्ट्रीय एकजुटता में है – सभी तरह की तुच्छ और बनावटी सीमा को तोड़कर मजदूर वर्ग के भाईचारे और एकजुटता में है। इसके लिए मजदूरों को, खासकर अगुआ मजदूरों को आगे आ कर मजदूरों को जाति, धर्म, नस्ल, रंग, भाषा, क्षेत्र की विभाजनकारी सीमा को तोड़ने का समूचे मजदूर वर्ग से आह्वान करना होगा। कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो में लिखी बात – “दुनिया के मजदूरों, एक हो जाओ” – के नारे को अमली रूप देना होगा और इसके अंतिम लक्ष्य और समाधान – समाजवाद – को खोजने और उसकी स्थापना करने के काम में लगना होगा। समाजवाद क्या है? समाजवाद मजदूर वर्ग के राज्य का नाम है। समाजवाद में प्रवास स्वैच्छिक होगा, मजबूरी में नहीं। मजदूरों के पेशे और उनके आवागमन पर पर कोई पाबंदी नहीं होगी। असमान विकास की थ्योरी को खत्म कर के हर क्षेत्र को विकसित किया जाएगा। इससे तकलीफदेह और मजबूरी में होने वाला प्रवास (डिस्ट्रेस माइग्रेशन) का सवाल ही खत्म हो जाएगा। प्रवास विकास के विस्तार के साथ-साथ आनंद और सुख के विस्तार का रूप ले लेगा। सोवियत यूनियन आज नहीं है, लेकिन वहां ऐसा करके दिखाया गया था। वहां से हमें मुकम्मल रोशनी मिलती है। यहां तक कि क्यूबा और वियतनाम जैसे देश, जो वैज्ञानिक समाजवाद के अर्थ में समाजवादी देश नहीं थे, के उदाहरण दिखाते हैं कि पूंजीवाद के नियमों को काफी हद तक रोक या सीमित कर के भी मजदूरों को एक हद तक सुरक्षित रखा जा सकता है। जहां तक असली और वैज्ञानिक समाजवाद की बात है, तो वह तो मजदूर वर्ग का राज्य ही होता है। समाज की कमान मजदूर वर्ग के हाथ में ही होती है। इसलिए उसी समाजवाद में ही उसके दुखों का अंत है। यह और बात है कि मजदूर वर्ग तब तक पूरी तरह से मुक्त नहीं हो सकता है जब तक कि वह शोषण के सभी रूपों को पूरी तरह से, यानी जड़मूल से, खत्म नहीं कर देता है। अगर दुनिया के किसी भी कोने में शोषण है, तो इसका मतलब है, मजदूर वर्ग पूरी तरह से और अंतिम तौर पर मुक्त नहीं हुआ है। इसलिए निष्कर्ष के तौर पर हम कह सकते हैं कि फासीवादी उभार और नफरत की राजनीति की चल रही वैश्विक आंधी में मजदूरों-मेहनतकशों के प्रवास की समस्या के हल के लिए सर्वप्रथम कम्युनिस्ट घोषणापत्र के ”दुनिया के मजदूरो, एक हो” के नारे को अमली रूप देना और मेहनतकशों की अंतर्राष्ट्रीय एकता को कायम करना अनिवार्य है जिसका लक्ष्य यह घोषणा करना होगा कि पूंजीवाद, जो आधुनिक युग की तमाम समस्याओं और गुलामियों की जड़ है, को हटाये बिना, जैसे अन्य दूसरी सामाजिक बुराइयों का अंत या स्थायी हल संभव नहीं है, वैसे ही प्रवास की बढ़ती तकलीफों की समस्या का हल भी संभव नहीं है। इसलिए आइए, जैसे हम अन्य समस्याओं के लिए लड़ते हैं, वैसे ही हम मजदूर वर्ग के प्रवास की समस्या के खिलाफ भी लड़ाई तेज करें जो निकट भविष्य में एक विकराल समस्या बनने जा रही है – खासकर इस अर्थ में भी कि उनके मूल निवास को भी बुलडोजर से नष्ट किया जा रहा है और इस तरह सरकारी जमीनों, जिन पर गरीब-मेहनतकश दलित आम तौर पर बसे होते हैं, को पूंजीपतियों को देने की तैयारी चल रही है। दरअसल मूल आवास और प्रवास की समस्या आज एक होती जा रही है। आइए, हम इसके तात्कालिक तथा दूरगामी व स्थायी हल, दोनों के लिए जीत तक संघर्ष करने की घोषणा करें और इसके लिए सभी तरह की, वर्ग-समाज द्वारा निर्मित सीमाओं (जाति, धर्म, भाषा, आदि) को तोड़ते हुए मेहनतकशों की अंतर्राष्ट्रीय एकता और भाईचारा कायम करने का रास्तां चुनें। हम और हमारी पार्टी आपके साथ खड़ी है। प्रपत्र मे उठाये गये बिंदुओं के प्रकाश में हम मजदूर वर्ग (स्थानीय और प्रवासी दोनों तरह के मजदूरों) से यह अपील करते हैं:-
- रोजी–रोटी और हाथों को काम मिले इसके लिए देश और दुनिया के हर कोने में आवागमन की आजादी की साझी मांग के लिए संघर्ष तेज करें
- साथ ही, चाहे कहीं भी हो, न्यूनतम मजदूरी के नीचे गिर कर काम न करने की साझी मांग के लिए मजबूत साझी एकता कायम करें और मालिकों से इसके लिए साझा संघर्ष करें
- न्यूनतम जनवादी अधिकार की मांग, जैसे मालिकों के मनमाने व्यवहार और लूट का विरोध करने, तथा यूनियन बनाने के अधिकार की मांग भी एक साझी मांग है, इसके लिए भी साझी लड़ाई में उतरें।
- मजदूर, गरीब किसान, निम्न मध्य और मध्य तबकों के पढ़े–लिखे और बेरोजगार नौजवानों से आह्वान है कि वे बेरोजगारी के खिलाफ एक देशव्यापी साझा अभियान और संघर्ष तेज करें।
क्रांतिकारी अभिवादन के साथ
पी.आर.सी. सीपीआई(एमएल)
9th January 2026
पश्चलेख
मजदूरों के प्रवास, मजदूरी पर उसके प्रभाव, और स्थानीय तथा प्रवासी मजदूरों के बीच साझा संघर्ष की जरूरत पर मार्क्स के विचारों का संक्षित सारांश एवं परिचय
- मार्क्स के इस पर कई लेखन और खासकर पत्र हैं। मुख्य स्रोत हैं: मार्क्स का 9 अप्रैल 1870 को सिगफ्रिड मेयर और ऑगस्ट वोग्ट को लिखा पत्र। इसमें मार्क्स आयरिश मजदूरों के इंग्लैंड में प्रवास पर चर्चा करते हैं। वे बताते हैं कि पूंजीपति प्रवासी मजदूरों का इस्तेमाल करके मजदूरी को नीचे रखते हैं और मजदूरों में विभाजन पैदा करते हैं, लेकिन समाधान प्रवास रोकना नहीं, बल्कि सभी मजदूरों का संयुक्त संघर्ष है। मूल अंग्रेजी उद्धरण यह है: “Ireland constantly sends her own surplus to the English labour market, and thus forces down wages and lowers the material and moral position of the English working class…
And most important of all! Every industrial and commercial centre in England now possesses a working class divided into two hostile camps, English proletarians and Irish proletarians. The ordinary English worker hates the Irish worker as a competitor who lowers his standard of life. […] This antagonism is artificially kept alive and intensified by the press, the pulpit, the comic papers, in short, by all the means at the disposal of the ruling classes. This antagonism is the secret of the impotence of the English working class, despite its organisation. It is the secret by which the capitalist class maintains its power. And that class is fully aware of it.” (https://www.marxists.org/archive/marx/works/1870/letters/70_04_09.htm )
इसी में मार्क्स आगे “आवागमन की आजादी” के पूंजीपति वर्ग द्वारा दुरुपयोग पर लिखते हुए कहते हैं कि जर्मन और आयरिश मजदूरों का गठबंधन जरूरी है। लेकिन वे मुख्य तौर पर यह कहते हैं कि यह सच है कि पूंजीपति इसे (प्रवास को) मजदूरी गिराने के लिए इस्तेमाल करते हैं, लेकिन समाधान अंतरराष्ट्रीय एकता में है।
- ज्ञातव्य हो कि 1880 में फ्रेंच वर्कर्स पार्टी का कार्यक्रम मार्क्स ने जूल्स गेस्डे के साथ मिलकर इस कार्यक्रम का प्रारंभ (preamble) लिखा और न्यूनतम कार्यक्रम में योगदान दिया। इसमें स्पष्ट रूप से विदेशी मजदूरों को फ्रेंच मजदूरों से कम मजदूरी पर न रखने की मांग है: “Legal prohibition of bosses employing foreign workers at a wage less than that of French workers; Equal pay for equal work…” (https://www.marxists.org/archive/marx/works/1880/05/parti-ouvrier.htm,
यह सीधे “न्यूनतम मजदूरी से कम पर काम नहीं” की बात करता है, ताकि प्रवासी मजदूरों का शोषण न हो और सभी मजदूरों की मजदूरी का स्तर बना रहे, जिससे साझा संघर्ष मजबूत हो।
- 1867 में इंटरनेशनल वर्किंगमेन्स एसोसिएशन लॉज़ेन कांग्रेस की तैयारी के लिए मार्क्स लिखते हैं:-
“A study of the struggle waged by the English working class reveals that, in order to oppose their workers, the employers either bring in workers from abroad or else transfer manufacture to countries where there is a cheap labour force. … Given this state of affairs, if the working class wishes to continue its struggle with some chance of success, the national organisations must become international.”
(https://www.marxists.org/archive/marx/works/1845/condition-working-class/ch06.htm,https://www.marxists.org/archive/marx/works/1866/08/instructions.htm)
साफ है, मार्क्स प्रवास और पूंजी के अंतरराष्ट्रीयकरण के बरक्स अंतरराष्ट्रीय मजदूर एकता की वकालत करते हैं। इस तरह मार्क्स प्रवास को पूंजीवाद की जरूरत मानते थे (reserve army of labour), जो मजदूरी गिराता है और मजदूरों को बांटता है, लेकिन उनका जोर हमेशा दुश्मनी खत्म करके साझा संघर्ष पर था – न कि प्रवास रोकने पर।
