फासीवाद की सामाजिक बुनियाद

फासीवाद की सामाजिक बुनियाद

September 13, 2021 0 By admin

5 जुलाई 1857 को जर्मनी के सेक्सनी प्रान्त के विदेराऊ गाँव में जन्मी विश्व सर्वहारा की महान नेता कॉमरेड क्लारा जेटकिन ने 20 जून 1923 को मास्को में हुए तृतीय कम्युनिस्ट इंटरनेशनल (कोमिन्टर्न) के तीसरे प्लेनम की कार्यकारी समिति के सम्मुख अपना ऐतिहासिक दस्तावेज़ ‘फासीवाद के विरुद्ध संघर्ष’ प्रस्तुत किया था। अपनी प्रिय नेता कॉमरेड क्लारा जेटकिन को उनके 164वें जन्म दिन पर क्रांतिकारी अभिनन्दन, लाल सलाम प्रस्तुत करते हुए हम उनके उस ऐतिहासिक दस्तावेज़ का एक हिस्सा प्रस्तुत कर रहे हैं। – संपादक मंडल [हिंदी अनुवाद : एस. वी. सिंह]

मेरे इस मामले में एक दम विपरीत विचार हैं और मैं जानती हूँ कि वैसे ही हर एक कम्युनिस्ट के होंगे। हम फासीवाद को, खास तौर से, पूंजीवादी अर्थ व्यवस्था के सडन और बिखराव की अभिव्यक्ति और बुर्जुआ राज सत्ता के विघटन के लक्षण के रूप में देखते हैं। हम फासीवाद से केवल तब ही लड़ सकते हैं जब हम ये जान लें कि ये समाज के ऐसे बहुत बड़े हिस्से को, जो अपने अस्तित्व के लिए मौजूद  सामाजिक सुरक्षा को खो चुका है और उसके साथ ही सामाजिक व्यवस्था में जिसका भरोसा डिग चुका है, भड़काता है और बहाकर ले जाता है। फासीवाद की जड़ें, असलियत में, पूंजीवादी अर्थव्यवस्था और बुर्जुआ राज्य के विघटन में मौजूद होती हैं। युद्ध-पूर्व काल के पूंजीवाद में ही कई बुर्जुआ परतों के सर्वहाराकरण के लक्षण मौजूद थे। युद्ध ने तो पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की जड़ों को ही झकझोर डाला है। ये सिर्फ़ सर्वहारा की भयानक कंगाली में ही नज़र नहीं आता बल्कि मध्य वर्ग, उच्च मध्य वर्ग के बहुत बड़े हिस्से के सर्वहाराकरण, छोटे किसानों की भयावह बदहाली और साथ ही ‘बुद्धिजीवियों’ में व्याप्त तनाव तथा निराशा से भी ज़ाहिर होता है। बुद्धिजीवियों की हालत सचमुच बहुत ही दयनीय है क्योंकि युद्ध-पूर्व पूंजीवाद ने ऐसे क़दम उठाए और इन बुद्धिजीवियों को ज़रूरत से इतनी ज्यादा तादाद में पैदा किया कि उन्हें महसूस हो गया कि उनकी अब ज़रूरत नहीं रह गई है। पूंजीपति, बौधिक क्षेत्र के मज़दूरों की थोक आपूर्ति बेतहाशा बढ़ाना चाहते थे जिससे उनमें तीव्र प्रतियोगिता पैदा हो जिससे उनकी मज़दूरी, मुझे माफ़ करें, वेतन कम किए जा सकें। ये ही वो तबक़ा था जिसमें से साम्राज्यवाद ने विश्व युद्ध के समर्थन लिए वैचारिक पहलवानों की भर्ती की। आज ये सभी सामाजिक परतें अपनी उन आशाओं को टूटते हुए देख रही हैं जो उन्होंने युद्ध से संजोई थीं। इनकी स्थिति बहुत ही बुरी तरह ख़राब हो चुकी है। ये बात उन्हें पूरी तरह तोड़ डाल रही है कि उनके अस्तित्व की वो सुरक्षा ही तहश-नहश हो चुकी है जो युद्ध से पहले मौजूद थी।

मेरा ऐसा निष्कर्ष सिर्फ़ जर्मनी के हालात पर ही आधारित नहीं हैं जहाँ बुर्जुआ बुद्धिजीवी मज़दूरों से भी कहीं ज्यादा कंगाली की हालात में हैं। नहीं, आप इटली की तरफ़ देखिए जिसकी मैं थोड़ी देर में चर्चा करुँगी, जहाँ अर्थव्यवस्था की पूरी बर्बादी लोगों को निर्णायक रूप से फासीवाद की ओर धकेल रही है। इससे अलग एक दूसरे यूरोपीय देश की बात करते हैं जो युद्ध से पूरी तरह बर्बाद होने से बच गया; इंग्लैंड। वहाँ आज प्रेस और सामाजिक जीवन में ‘नए ग़रीब’ वर्ग के बारे में सिर्फ़ इतना ही कहा जा रहा है कि तुम्हारा ऐसा हाल छोटे से ‘नए धनी’ वर्ग द्वारा लूटे गए बेहिसाब मुनाफ़े और विलासिता के कारण हुआ है। अमेरिका में समाज की एक बहुत बड़ी परत की कंगाली की परिणति वहाँ सशक्त किसान आन्दोलन के रूप में हुई। मध्य वर्ग की हालत हर

एक देश में निश्चित रूप से बहुत ही दयनीय हो चुकी है। कुछ देशों में तो हालात इतने गंभीर रूप से ख़राब हुए कि ये सामाजिक टटपूंजिया परतें पूरी तरह कुचल दी गई हैं और एकदम नष्ट होकर विलुप्त ही हो गई हैं।

इस सबका परिणाम है कि असंख्य लोग है जो आज जिंदा रहने, भोजन का जुगाड़ करने और समाज में किसी तरह टिके रहने की नई संभावनाएं तलाश रहे हैं। उनकी तादाद, उनमें निम्न और मध्यम ग्रेड की सरकारी नोकरी करने वालों और पब्लिक सेक्टर में कार्यरत कर्मचारियों के जुड़ जाने से बढ़ती ही जा रही है। ऐसा उन देशों में भी हो रहा है जो युद्ध जीत चुके हैं जहाँ पहले के अधिकारीयों और बाबुओं को आज ना काम है ना कोई व्यवसाय है। ऐसे विशिष्ट लोगों के रूप में फासीवाद को एक ऐसी सेना मिल गई है जो उसे एक राजशाही रंग प्रदान कर रही है। लेकिन हम फासीवाद की प्रकृति को अकेली इन परिघटनाओं के द्वारा उत्पन्न आर्थिक दबाव के प्रभाव के रूप से ही पूरी तरह नहीं जान सकते, क्योंकि सरकारों का वित्तीय संकट और उसका कम होता जाता रुतबा इसे बहुत ही ज्यादा बढ़ा देता है।

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[रिपोर्ट का अंतिम अनुछेद]

हर एक सर्वहारा को समझना होगा कि वो पूंजीवाद का या जो भी तुर्रम खां सत्ता हो उसका एक उजरती -गुलाम, हवा और पूंजीवाद की आंधी में उड़ जाने वाले खिलौना मात्र नहीं है। सर्वहारा को खुद को क्रांतिकारी वर्ग का एक ऐसा अंग समझना और महसूस करना चाहिए जो धनी वर्ग के पुराने राज्य को एक नए सोवियत राज्य में गढ़ डालेगा। जब हम हर एक मज़दूर में ऐसी क्रांतिकारी वर्ग चेतना जगा देंगे और वर्ग प्रतिबद्धता की चिंगारी प्रज्वलित कर देंगे तब ही हम फासीवाद को लड़ाई के मैदान में पूरी तरह उखाड़ फेंकने के लिए असली तैयारी कर पाएँगे। विश्व सर्वहारा के विरुद्ध विश्व पूंजीवाद का किसी विशिष्ट समय में कितना भी भयानक हमला क्यों ना हो, ये कितना भी विनाशकारी क्यों ना नज़र आए, सर्वहारा वर्ग लड़कर आखरी जीत हांसिल करने ही वाला है। फासीवाद के बावजूद, हम पूंजीवादी अर्थव्यवस्था, बुर्जुआजी की राज सत्ता को और उसके वर्ग के राज को तबाह होते स्पष्ट देख पा रहे हैं। बुर्जुआ समाज का बिखराव और उसकी फासीवादी सड़ांध के सभी लक्षण, सर्वहारा की जीत का पूरी ज़ोर से चीखकर ऐलान कर रहे हैं बशर्ते सर्वहारा अपनी लड़ाई अच्छी तरह समझते हुए और संयुक्त रूप से लड़े। और ये होकर रहेगा!!

मौजूदा परिस्थितियों में व्याप्त अराजकता से कहीं आगे, सर्वहारा की विशाल सेना खड़ी होकर चिंघाड़ रही है, “ये मैं कर के रहूँगा!, मेरे पास ताक़त है!, मेरे पास लड़ने और जीतने का हौसला मौजूद है!, आने वाला वक़्त मेरा है!”

जुलाई-अगस्त 2021 संयुक्त अंक से